
पिछले कुछ महीनों से स्मार्टफोन खरीदना आम यूज़र के लिए काफी मुश्किल हो गया है। नए लॉन्च होने वाले फोन अब पिछली जनरेशन के मुकाबले 15 हज़ार रुपये तक ज़्यादा दाम पर बेचे जा रहे हैं, जबकि 2–3 महीने पहले आए मॉडलों की कीमतों में 2,000–3,500 रुपये तक की बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। अब सिर्फ बजट फोन ही नहीं, बल्कि मिड‑रेंज और प्रीमियम सेगमेंट तक में लगातार महंगाई देखने को मिल रही है। इस दौर में ग्राहक सीधे तौर पर दोहरी मार झेल रहे है- नए फोन ज़्यादा महंगे और पुराने लॉन्च हुए फोन भी धीरे‑धीरे महंगे होते जा रहे हैं।
लॉन्च के बाद भी बढ़ रहे दाम
एक समय था जब स्मार्टफोन की कीमतें लॉन्च के बाद ही नीचे गिरती थीं, लेकिन अब उल्टा ट्रेंड बन रहा है। ओनप्लस, सैमसंग, वीवो और नथिंग जैसी कंपनियां अपने कुछ मॉडल्स की “लॉन्च प्राइस” के कुछ ही हफ्तों बाद दुबारा रिवाइज कर रही हैं। उदाहरण के लिए, OnePlus 15R को दिसंबर 2025 में 47,999 रुपये में लॉन्च किया गया था, जो अब कंपनी के ऑफिशियल स्टोर पर 50,499 रुपये में लिस्टेड है।
ठीक उसी तरह OnePlus Pad Go 2 की कीमत 26,999 से बढ़कर 27,999 रुपये हो गई है, जबकि वीवो ने फरवरी 2026 में लॉन्च हुए Vivo V70 की कीमत 45,999 से बढ़ाकर 49,999 रुपये कर दी है। सैमसंग भी Galaxy M36 5G, M06, F06 और M17 5G जैसे मॉडल्स के दाम बढ़ा चुकी है, जिससे आम यूज़र को लग रहा है कि ब्रांड बस अपनी लागत बढ़ने के बहाने मार्किन बढ़ा रहे हैं।
मेमोरी चिप्स की कमी: असली जड़
इस पूरी कीमत बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह मेमोरी चिप्स की कमी और उनकी बढ़ती कीमतें मानी जा रही हैं। वैश्विक स्तर पर बड़ी मेमोरी‑मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां अब ज़्यादा ध्यान AI डेटा सेंटर्स के लिए चिप्स बनाने पर लगा रही हैं, क्योंकि बिज़नेसमैन और क्लाउड कंपनियां अब ज़्यादा पैसा खर्च करने को तैयार हैं। इसकी वजह से स्मार्टफोन, लैपटॉप और स्मार्ट टीवी जैसे उपभोक्ता उत्पादों के लिए चिप्स की कमी बढ़ गई है, जिससे उनकी कीमतें आसमान की ओर बढ़ गई हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 तक मेमोरी चिप की कमी से स्मार्टफोन और लैपटॉप जैसे गैजेट्स की कीमतों में 10–20% तक और इज़ाफा हो सकता है, जबकि मार्केट रिसर्च फर्म IDC के अनुसार इस साल स्मार्टफोन की कीमतों में लगभग 14% तक बढ़ोतरी का अनुमान है।
लागत, सप्लाई चैन और AI धुन
मेमोरी चिप्स की कमी से ज़्यादा यह भी चिंता बढ़ा रही है कि चिपसेट, OLED स्क्रीन, कैमरा सेंसर और अन्य कॉम्पोनेन्ट्स की लागत बढ़ी है। भारतीय रुपये की कमजोरी ने भी इस बढ़ोतरी को बढ़ा दिया है, क्योंकि ज़्यादातर हार्डवेयर विदेश से आयात होता है। इसके अलावा वैश्विक सप्लाई चैन पर दबाव, ऊर्जा की लागत बढ़ना और वैश्विक ज्योपॉलिटिकल तनाव ने इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग पर अतिरिक्त दबाव बनाया है।
इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती डिमांड ने नए फोनों में ज़्यादा RAM, बड़े स्टोरेज और तेज प्रोसेसर जोड़ना अनिवार्य बना दिया है, जो लागत और बढ़ाता है। ब्रांड अब अपने फोन को “AI‑फर्स्ट” डिवाइस बताकर ज़्यादा मार्जिन वाली कीमतें रखने का बहाना बना रहे हैं, चाहे ज़्यादातर यूज़र इन फीचर्स को रोज़मर्रा के उपयोग में बहुत आगे तक न इस्तेमाल करें।
ग्राहकों पर क्या असर पड़ रहा है?
कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे ज़्यादा असर बजट और मिड‑रेंज खरीदार वर्ग पर पड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 15,000 रुपये तक के स्मार्टफोन सेगमेंट में कंपनियों ने 15–30% तक कीमतें बढ़ा दी हैं, जिससे आम खरीदार को बजट बढ़ाना पड़ रहा है या पुराने फोन को ज़्यादा समय तक चलाना पड़ रहा है। इससे भारत में स्मार्टफोन की बिक्री में भी पिछले छह सालों में पहली बार गिरावट देखी गई है, जो दिखाती है कि उपभोक्ता अब “ज़बरदस्ती अपग्रेड” के लिए तैयार नहीं हैं। कई यूज़र अब बैटरी या डिस्प्ले बदलकर पुराना फोन चला रहे हैं या ऑफिशियल रीफर्बिश्ड/सेकंड‑हैंड फोनों की तरफ रुख कर रहे हैं।
कंपनियों की रणनीति और आने वाला दौर
कंपनियां इस दौर में दो तरह की रणनीति चला रही हैं। एक तरफ वे बजट फोनों की कीमतें ज़्यादा फीसदी से बढ़ाकर अपने लॉयल्टी ग्रुप को ऊपरी रेंज में ढकेलने की कोशिश कर रही हैं, ताकि यूज़र एक बार बड़े ब्रांड, बेहतर बैटरी लाइफ और बड़े डिस्प्ले वाले फोन में अपग्रेड हो जाएं। दूसरी तरफ वे यह भी उम्मीद कर रही हैं कि अब ज़्यादा महंगे फोन होने से ग्राहक एक डिवाइस को 3–4 साल तक इस्तेमाल करें, जिससे ब्रांड को लॉयल्टी और सर्विस/एक्सेसरीज़ से मुनाफा बढ़ाने का मौका मिले।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगले कम से कम 1–2 साल तक बाजार में ऐसी ही स्थिति बनी रहेगी; मेमोरी चिप्स की सप्लाई नॉर्मल होने तक राहत की उम्मीद कम ही लग रही है।
खरीदार के लिए सबक
इस दौर में खरीदार को सबसे ज़्यादा शुरुआती ऑफर पर ध्यान नहीं, बल्कि लॉन्च तारीख और कीमत इतिहास पर ज़्यादा नज़र रखनी चाहिए। अगर किसी फोन की कीमत लॉन्च के 2–3 महीने बाद भी उतनी ही है या थोड़ी बढ़ी है, तो इसे खरीदना ज़्यादा सेफ माना जा सकता है।









