
भारतीय राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ की पुरानी कहावत एक बार फिर सुर्खियों में है। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख सांसद राघव चड्ढा, अशोक मित्तल और संदीप पाठक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में पार्टी को अलविदा कहते हुए भाजपा में शामिल होने का ऐलान कर दिया। उनका दावा है कि AAP के दो-तिहाई से अधिक सांसद उनके साथ हैं, जिससे यह सामूहिक विलय दल-बदल विरोधी कानून के अपवाद में आ सकता है। इस घटना ने न सिर्फ AAP को अस्तित्व का संकट दिया है, बल्कि 41 साल पुराने दल-बदल कानून की प्रासंगिकता पर भी बहस छेड़ दी है।
AAP के आंतरिक कलह का चरम बिंदु
राजनीति के जानकार इसे AAP के लंबे समय से चल रहे आंतरिक कलह का चरम बिंदु मान रहे हैं। राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में अरविंद केजरीवाल पर गंभीर आरोप लगाए, जिसमें पार्टी में तानाशाही, भ्रष्टाचार और कार्यकर्ताओं की अनदेखी जैसे मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने नाम गिनाते हुए कहा कि संदीप पाठक, राजिंदर गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी, अशोक मित्तल, स्वाति मालीवाल और हरभजन सिंह सहित सात सांसद उनके साथ हैं।
AAP नेता संजय सिंह ने भी इन नामों की पुष्टि करते हुए कहा कि ये सांसद भाजपा में शामिल हो रहे हैं। चड्ढा का स्पष्ट इशारा था कि यह विलय होगा, न कि व्यक्तिगत दल-बदल, इसलिए उनकी लोकसभा सदस्यता सुरक्षित रहेगी।
दल-बदल कानून का इतिहास और जन्म
दल-बदल कानून, सही रूप से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत 52वें संविधान संशोधन द्वारा 1 मार्च 1985 को लागू किया गया। इसका जन्म 1960-70 के दशक की अस्थिर राजनीति से हुआ, जब सांसद-विधायक खरीद-फरोख्त का शिकार हो रहे थे। हरियाणा के विधायक गया लाल ने 1967 में 15 दिनों में तीन बार दल बदला, जिससे ‘आया राम-गया राम’ प्रसिद्ध हुआ। तब सरकारें रातोंरात गिरती-बनतीं, जनादेश की अवहेलना होती। राजीव गांधी सरकार ने इस कानून से राजनीतिक स्थिरता लाने की कोशिश की।
कानून के सख्त प्रावधान और अपवाद
कानून के मुख्य प्रावधान सख्त हैं। कोई सांसद या विधायक स्वेच्छा से मूल पार्टी की सदस्यता छोड़कर दूसरी पार्टी जॉइन करे, तो अयोग्य घोषित। पार्टी व्हिप (निर्देश) के खिलाफ सदन में वोट देना या वोटिंग से अनुपस्थित रहना भी अयोग्यता का आधार। निर्दलीय सदस्य किसी दल में शामिल हो जाए, तो कुर्सी गंवाएगा। छह महीने बाद नामित सदस्य का दल जॉइन करना भी वर्जित।
हालांकि, अपवाद है: यदि मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य एक साथ दूसरी पार्टी में विलय करते हैं, तो कोई अयोग्यता नहीं। 91वें संशोधन (2003) ने ‘एक-तिहाई विलय’ की पुरानी छूट खत्म कर दी, ताकि छोटे गुटों का दुरुपयोग न हो। फैसला सदन के स्पीकर या अध्यक्ष का होता है, जो अंतिम माना जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के किहोटो होलोहान मामले में न्यायिक समीक्षा की गुंजाइश दी।
AAP मामले में ‘दो-तिहाई’ दावे की कसौटी
AAP मामले में चड्ढा का ‘दो-तिहाई’ दावा इसी अपवाद पर टिका है। यदि सात या अधिक सांसद (AAP के कुल सांसदों के 2/3) विलय साबित कर दें, तो लोकसभा स्पीकर की मंजूरी से उनकी सीटें बच सकती हैं। वरना व्यक्तिगत बगावत मानेगी, और उपचुनाव होगा। AAP ने तत्काल पलटवार किया, इन सांसदों को बागी करार देते हुए अयोग्यता की शिकायत की। पार्टी प्रवक्ता ने कहा, “यह विलय नहीं, सत्ता लिप्सा है। स्पीकर फैसला लेंगे।”
कानून की कमियां और सुधार की मांग
कानून की कमियां भी सामने आ रही हैं। यह असहमति को दबाता है, स्पीकर की पक्षपातपूर्ण भूमिका पर सवाल उठाता है। राघव चड्ढा ने ही 2022 में संशोधन विधेयक पेश किया था, जिसमें दलबदलुओं पर छह साल चुनाव प्रतिबंध, व्हिप सिर्फ अविश्वास प्रस्ताव पर सीमित और फैसला एक माह में प्रस्तावित था। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में सुधार की वकालत की, लेकिन संसद में ठप। विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना AAP जैसी युवा पार्टी के लिए विनाशकारी हो सकती है, जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उभरी थी।
राष्ट्रीय राजनीति पर संभावित प्रभाव
AAP का यह संकट राष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा दे सकता है। यदि विलय सफल रहा, तो विपक्ष कमजोर होगा; असफल रहा, तो उपचुनाव में भाजपा मजबूत। दल-बदल कानून की कसौटी पर यह परीक्षा है, जो लोकतंत्र की मजबूती पर सवाल खड़े कर रही। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है: क्या यह कानून अब अप्रासंगिक हो गया, या समय सुधार का है?





