
उत्तर प्रदेश और हरियाणा में हाल की न्यूनतम वेतन वृद्धि एक तरफ मजदूरों की बड़ी जीत लगती है, लेकिन इसके साथ EPFO कवरेज को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं। वर्कर्स के प्रोटेस्ट के बाद दोनों राज्यों की सरकारों ने बेसिक मिनिमम वेज बढ़ाया है, जिससे कई कर्मचारियों की सैलरी 15,000 रुपये की उस सीमा को पार कर गई है, जो अभी अनिवार्य PF कवरेज की “काट‑ऑफ लाइन” मानी जाती है।
कैसे बढ़ा वेतन, और यहीं से शुरू हुई दिक्कत
उत्तर प्रदेश के इंडस्ट्रियल जिलों गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर में 1 अप्रैल से न्यूनतम वेतन में लगभग 21 फीसदी तक बढ़ोतरी की गई है। अब यहां सेमी‑स्किल्ड वर्कर्स की न्यूनतम सैलरी 15,059 रुपये और स्किल्ड वर्कर्स की सैलरी 16,868 रुपये महीने तक पहुँच गई है। हरियाणा ने इससे भी बड़ा कदम उठाते हुए न्यूनतम वेतन में 35 फीसदी तक इजाफा किया है; यहाँ अनस्किल्ड मजदूरों के लिए बेसिक मिनिमम वेज 15,220 रुपये, जबकि अर्ध‑कुशल और कुशल श्रमिकों के लिए यह क्रमशः 16,780 और 18,500 रुपये प्रति माह तय किया गया है।
इसी के साथ समस्या यह खड़ी होती है कि EPFO नियमों के मुताबिक अनिवार्य PF सदस्यता उन कर्मचारियों के लिए है जिनका जॉइनिंग के समय बेसिक वेतन (बेसिक + DA) 15,000 रुपये महीने तक होता है। यह सीमा 2014 से बदल नहीं पाई है, जबकि शहरी इलाकों में शुरुआती लेवल की सैलरी भी अब अक्सर इस स्तर को पार कर जाती है।
EPFO कवरेज अनिवार्य से “वॉलंटरी” की ओर?
अभी की स्थिति में, 15,000 रुपये तक की बेसिक सैलरी वाले कर्मचारियों के लिए EPF में शामिल होना अनिवार्य है, लेकिन जो इससे ऊपर कमाते हैं, वे तकनीकी रूप से “एक्सक्लूडेड” कैटेगरी में आ जाते हैं- यानी उनके लिए EPF कवरेज कंपनी और कर्मचारी की मर्जी पर निर्भर हो सकता है। नए नोटिफिकेशन के बाद गाजियाबाद, नोएडा और हरियाणा के कई इलाकों में बड़ी संख्या में वर्कर्स की न्यूनतम सैलरी इस सीमा से ऊपर जा चुकी है, इसलिए कंपनियों को अब कानूनन इन्हें अनिवार्य रूप से PF में शामिल करना ज़रूरी नहीं रह जाता।
यही वह बिंदु है जहाँ मजदूर संगठनों और लेबर इकॉनॉमिस्ट चिंता जता रहे हैं। उनका तर्क है कि जिन लोगों को सबसे ज़्यादा सोशल सिक्योरिटी की जरूरत है, वही लोग नियमों के गैप की वजह से कवरेज से बाहर होते जा रहे हैं।
वेज सीलिंग 25,000 तक बढ़ाने की तैयारी?
केंद्र सरकार कुछ समय से इस बात पर विचार कर रही है कि EPFO की वेतन सीमा को 15,000 से बढ़ाकर 25,000 रुपये महीने कर दिया जाए, ताकि ज़्यादा कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से PF नेट में लाया जा सके। उद्योग जगत के विरोध और कॉस्ट बढ़ने की दलीलों के कारण इस पर अब तक ठोस निर्णय नहीं हो पाया, लेकिन हरियाणा और यूपी के हालिया फैसलों के बाद सरकारी हलकों में इस प्रस्ताव पर दोबारा तेजी आने की संभावना जताई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट भी वेतन सीमा में संशोधन पर केंद्र से समय‑बद्ध निर्णय लेने को कह चुका है, जिससे दबाव और बढ़ा है।
लेबर इकॉनॉमिस्ट का मानना है कि कई राज्यों में मिनिमम वेज पहले ही 15,000 से 20,000 रुपये के बीच पहुँच चुकी है, जबकि दिल्ली और केरल जैसे राज्यों में कुछ कैटगरी में यह 22,000 रुपये के आसपास है। ऐसे में पुरानी सीलिंग को बरकरार रखना निचले पायदान के कर्मचारियों को सोशल सिक्योरिटी से वंचित करने जैसा होगा।
किसे फायदा, किसको खतरा?
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री अमित बसोले सहित कई विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा सिस्टम हाईर इनकम वर्कर्स को ज़्यादा फेवर करता है, जबकि कम सैलरी वाले वर्कर्स अक्सर बाहर छूट जाते हैं या कंपनियाँ नियमों को दरकिनार कर देती हैं। हरियाणा में वेतन बढ़ने के बाद आशंका है कि कुछ कंपनियाँ “अनिवार्य PF” वाले स्टेटस से बचने के लिए फॉर्मल रजिस्ट्रेशन या कॉन्ट्रैक्ट स्ट्रक्चर में खेल कर सकती हैं।
लेबर इकॉनॉमिस्ट के आर श्याम सुंदर जैसे विशेषज्ञों की चिंता यह भी है कि मिनिमम वेज कानून का नॉन‑कंप्लायंस पहले से ही बड़ा मुद्दा है; कई कॉन्ट्रैक्टर्स और कंपनियाँ कागज़ पर कुछ, असल में कुछ और वेतन देती हैं। ऐसे माहौल में PF जैसी अनिवार्य बचत योजना गरीब और निचले मध्यम वर्ग के कर्मचारियों के लिए रिटायरमेंट और इमरजेंसी दोनों की सुरक्षा देती है। EPF के तहत कर्मचारी अपनी बेसिक सैलरी का 12% योगदान करता है और नियोक्ता भी इतना ही देता है, जिसमें से 8.33% कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) में जाता है और PF में जमा रकम पर सरकार निर्धारित दर से ब्याज भी मिलता है।
तस्वीर साफ है: न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी अपने आप में सकारात्मक कदम है, लेकिन जब तक EPFO की वेज सीलिंग को नए हकीकत के मुताबिक ऊपर नहीं किया जाता, तब तक लाखों वर्कर्स “बेहतर सैलरी लेकिन कमजोर सोशल सिक्योरिटी” के बीच फँसे रहेंगे।









