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Working Hours India: किस देश के लोग करते हैं सबसे ज्यादा काम? ऑफिस आवर्स की लिस्ट में जानें भारत का पायदान

भूटान (54.5 घंटे/सप्ताह) शीर्ष पर, सूडान व लेसोथो पीछे। भारत 45.8 घंटे औसत से 15वें स्थान पर, 51% कर्मचारी 49+ घंटे काम। पुरुष 49.8, महिलाएं 35.9 घंटे। अमेरिका (38), जापान (36.6) से ज्यादा, लेकिन ओवरवर्किंग चिंता। नीतिगत सुधार जरूरी।

By Pinki Negi

Working Hours India: किस देश के लोग करते हैं सबसे ज्यादा काम? ऑफिस आवर्स की लिस्ट में जानें भारत का पायदान

दुनिया भर में काम के घंटों की होड़ थमने का नाम नहीं ले रही। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के हालिया आंकड़ों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कई देशों में कर्मचारी वैश्विक औसत से कहीं ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। जहां भारत को हमेशा से मेहनती राष्ट्र कहा जाता रहा है, वहीं इस वैश्विक सूची में यह 15वें स्थान पर है। औसतन एक भारतीय कर्मचारी प्रति सप्ताह 45.8 घंटे काम करता है, जो विकसित देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है, लेकिन शीर्ष देशों से पीछे। यह आंकड़ा न केवल आर्थिक दबाव को दर्शाता है, बल्कि स्वास्थ्य, कार्य-जीवन संतुलन और सामाजिक असमानताओं की गंभीर चुनौतियों की ओर भी इशारा करता है।

वैश्विक काम के घंटों में बड़ा अंतर

ILO के नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर औसत काम के घंटे 40-42 के आसपास हैं, लेकिन कुछ विकासशील देश इससे बहुत आगे निकल चुके हैं। सबसे ऊपर भूटान का नाम चमक रहा है, जहां कर्मचारी हर हफ्ते औसतन 54.5 घंटे जुटे रहते हैं। यह आंकड़ा आर्थिक निर्भरता, सीमित संसाधनों और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भरता को प्रतिबिंबित करता है। भूटान जैसे छोटे पहाड़ी राष्ट्र में लंबे काम के घंटे मजबूरी ज्यादा हैं, क्योंकि वहां औद्योगिक विकास अभी प्रारंभिक चरण में है।

इसके ठीक बाद सूडान 50.8 घंटे के साथ दूसरे पायदान पर है, जहां राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी ने काम के बोझ को और बढ़ा दिया है। तीसरे नंबर पर लेसोथो 50.02 घंटे के साथ काबिज है, अफ्रीकी देश जहां खनन और कृषि क्षेत्रों में कठोर परिश्रम आम बात है। इन देशों में ज्यादा घंटे काम न केवल आर्थिक मजबूरी है, बल्कि सामाजिक संरचना भी इसे बढ़ावा देती है। उदाहरण के लिए, भूटान में 61 प्रतिशत कर्मचारी 49 घंटे से अधिक काम करते हैं, जो वैश्विक औसत 10-15 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है।

भारत की चिंताजनक स्थिति

भारत की स्थिति भी चिंताजनक है। 15वें स्थान पर होने के बावजूद, यहां 51 प्रतिशत कर्मचारी 49 घंटे से ज्यादा काम कर रहे हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। औसत 45.8 घंटे प्रति सप्ताह बताते हैं कि भारतीय कार्यबल विकासशील अर्थव्यवस्था के दबाव में है। आईटी, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में लंबे शिफ्ट आम हैं, खासकर निजी कंपनियों में। सरकार ने श्रम कानूनों में सुधार की कोशिश की है, जैसे चार दिन के कार्य सप्ताह की चर्चा, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव धीमा है।

पिछले साल ILO ने चेतावनी दी थी कि भारत जैसे देशों में ओवरवर्किंग से बर्नआउट, हृदय रोग और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। फिर भी, आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने के लिए कंपनियां लंबे घंटे थोप रही हैं।

विकसित देशों से भारत का फर्क

दिलचस्प बात यह है कि भारत विकसित देशों से कहीं आगे है। अमेरिका में औसत 38 घंटे, ब्रिटेन में 35.9 घंटे और यहां तक कि ‘कार्य संस्कृति’ के लिए मशहूर जापान में भी 36.6 घंटे ही काम होता है। इन देशों में मजबूत श्रम कानून, यूनियनें और कार्य-जीवन संतुलन नीतियां काम करती हैं। जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों में तो 35 घंटे ही मानक है, साथ ही छुट्टियों की भरमार। विकासशील बनाम विकसित का यह फर्क साफ दिखता है- जहां अमीर देश उत्पादकता पर जोर देते हैं, वहीं गरीब देश घंटों की गिनती करते हैं। भारत में भी यही समस्या है; प्रोडक्टिविटी कम होने से कंपनियां ज्यादा समय थोपती हैं।

लैंगिक असमानता की समस्या

भारत में लैंगिक अंतर इस समस्या को और जटिल बनाता है। पुरुष औसतन 49.8 घंटे काम करते हैं, जबकि महिलाएं मात्र 35.9 घंटे। इसका कारण कार्यबल भागीदारी दर है- महिलाओं की सिर्फ 25-30 प्रतिशत भागीदारी, घरेलू जिम्मेदारियां और असुरक्षित कामकाजी माहौल। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं खेती में अनगिनत घंटे लगाती हैं, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में यह दर्ज नहीं होता। शहरी इलाकों में आईटी और कॉर्पोरेट जॉब्स में महिलाएं बढ़ रही हैं, लेकिन लंबे घंटे उनके लिए चुनौती हैं।

नीति निर्माताओं के लिए चेतावनी

काम के घंटों की यह वैश्विक तस्वीर नीति निर्माताओं के लिए चेतावनी है। भारत सरकार को ILO मानकों को सख्ती से लागू करना होगा, प्रोडक्टिविटी बढ़ाने पर फोकस करना होगा और लैंगिक समानता सुनिश्चित करनी होगी। वरना, मेहनतकश राष्ट्र की यह पहचान स्वास्थ्य संकट में बदल जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक और ऑटोमेशन से घंटे कम हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए निवेश जरूरी है। फिलहाल, भूटान से लेकर भारत तक, दुनिया का कार्यबल थकान से जूझ रहा है।

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Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।