
ईरान–इजरायल युद्ध के दौरान होर्मुज़ स्ट्रेट पर जारी तनाव ने भारत की रसोई तक अपनी मार पहुंचा दी है। इस जलडमरूमध्य से देश की लगभग 90% LPG आयात की आपूर्ति गुज़रती है और जब यह रास्ता बंद या असुरक्षित की घोषणा की गई, तो कई हफ्तों में LPG सिलेंडर की आपूर्ति धीमी हो गई। इससे शहर-शहर, गली-गली में लाइनें लगीं, ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम भारी दबाव में आ गया और बहुत से लोग बिना गैस के महीनों की उम्मीद में रहे।
सरकारी अधिकारियों का अनुमान है कि LPG सप्लाई को पूरी तरह सामान्य करने में “3-4 साल” का समय भी लग सकता है, जिसने आम उपभोक्ता की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला।
LPG शॉर्टेज से उभरा नया रुझान
इसी असुरक्षा के बीच लोगों ने घर में बिजली से चलने वाले चूल्हों की तरफ रुख करना शुरू कर दिया। इंडक्शन और इंफ्रारेड कुकटॉप अचानक बाज़ार में हिट हो गए- दुकानों के स्टॉक खाली हो गए, औनलाइन प्लेटफॉर्म पर आर्डर समय सीमा बढ़ाने को मजबूर हुए। यह रुझान साफ़ दिखाता है कि लोग “LPG–पर‑निर्भरता कम करने” और बिजली को बतौर वैकल्पिक इंधन अपनाने की ओर धीरे‑धीरे बढ़ रहे हैं।
इंडक्शन चूल्हा: कैसे काम करता है?
इंडक्शन चूल्हा एक बिजली से चलने वाला ऐसा उपकरण है जिसके नीचे तांबे या एल्युमिनियम की कॉइल लगी होती है। जब आप इसे ऑन करते हैं, तो इसके ऊपर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड बनता है, जो सिर्फ लोहे या फेरोमैग्नेटिक बर्तन को सीधे गर्म करता है; ग्लास सतह खुद ज़्यादा नहीं गर्म होती। इसी तकनीक की वजह से खाना बहुत तेज़ी से पकता है, पानी जल्दी उबलता है और ऊर्जा की खपत भी कम रहती है।
इंडक्शन को ज़्यादार ऊर्जा‑कुशल (लगभग 85–90% तक) माना जाता है, क्योंकि गर्मी सीधे बर्तन में उत्पन्न होती है और चारों तरफ बिखरने का नुकसान नगण्य होता है। इसके साथ ही इसे यूज़ करना सेफ भी माना जाता है, क्योंकि जब बर्तन नीचे से हट जाता है, तो गर्मी तुरंत बंद हो जाती है और टॉप ठंडा होने में काफी जल्दी होता है। रखरखाव भी आसान है- सिर्फ एक साफ कपड़े से मिट्टी–धूल मिटा देने से चूल्हा फिर से चमकने लगता है।
हालांकि इसकी एक शर्त होती है: बर्तन इंडक्शन‑फ्रेंडली होने चाहिए, यानी आधार लोहे या स्टेनलेस स्टील का मैग्नेट कैच‑करने वाला होना चाहिए। ऐल्युमिनियम, तांबा या ग्लास बर्तन इस पर सही तरह से काम नहीं करते, जिससे कई घरों को नए बर्तन खरीदने पड़ते हैं।
इंफ्रारेड चूल्हा: गर्मी की “रेडिएंट” तकनीक
इंफ्रारेड चूल्हा भी बिजली पर भरोसा करता है, लेकिन इसकी तकनीक अलग होती है। यह आमतौर पर सिरेमिक ग्लास का बना हुआ होता है, जिसके नीचे एक हाई‑पावर हीटिंग एलिमेंट- जैसे हीटिंग कॉइल या हैलोजन‑स्टाइल लैंप- लगा होता है। जब इसे ऑन किया जाता है, तो यह लगातार इंफ्रारेड रेडिएशन छोड़ता है, जो सीधे ऊपर रखे बर्तन की तली को गर्म कर देता है।
इस प्रणाली की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस पर लगभग हर प्रकार के बर्तन का इस्तेमाल किया जा सकता है- फ्लैट आधार वाले मिट्टी के, एल्युमिनियम, स्टेनलेस स्टील या तांबे के बर्तन सब चल जाते हैं। इसकी वजह से इंफ्रारेड चूल्हा अक्सर बजट‑फ्रेंडली ऑप्शन माना जाता है, जिसमें “बर्तन‑परिवर्तन” की दिक्कत कम होती है। हालांकि इसकी गर्मी चलने में थोड़ा अंतराल होता है- यह गर्म होने में थोड़ा देर से पहुंचता है और बंद होने के बाद भी ग्लास सतह लंबे समय तक गर्म रहती है, जिससे जलने का रिस्क बढ़ जाता है।
ऊर्जा‑दक्षता के मामले में इंफ्रारेड चूल्हा लगभग 65-70% तक ऊर्जा का उपयोग कर पाता है, यानी बिजली का एक हिस्सा गर्मी के रूप में चारों तरफ बिखर जाता है। इसकी वजह से यह लगभग उतनी ही मात्रा में खाना बनाने पर इंडक्शन से थोड़ा ज़्यादा बिजली खाता है।
बिजली खपत: इंडक्शन vs इंफ्रारेड
यही बात सबसे ज़्यादा पैसे बचाने की चर्चा को गरम करती है। एक 2000 वॉट क्षमता वाला इंफ्रारेड चूल्हा अगर लगातार एक घंटे तक चले, तो वह लगभग 2 यूनिट बिजली खपत करता है। इसी तरह, एक 2000 वॉट वाला इंडक्शन चूल्हा उसी समय में लगभग 1.5 यूनिट तक बिजली ही उपयोग करता है, यानी 25% तक कम खपत।
अगर आप 8 रुपये प्रति यूनिट के टैरिफ के हिसाब से कैलकुलेट करें, तो एक घंटे के उपयोग में इंफ्रारेड चूल्हा 16 रुपये की बिजली खाता है, जबकि इंडक्शन लगभग 12 रुपये तक सीमित रहता है। दैनिक रूप से अगर आप रोटी, दाल, चाय–कॉफी जैसा ज़्यादा पकाना करते हैं, तो महीने भर में यह अंतर कई सौ रुपये तक पहुंच सकता है।
LPG किल्लत में कौन बेहतर विकल्प?
LPG की अनिश्चित सप्लाई और बढ़ती कीमतों के बीच अगर आप लंबे समय में खर्च कम करने और रसोई की ऊर्जा निर्भरता घटाकर आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं, तो विशेषज्ञों की मानें तो इंडक्शन चूल्हा ज़्यादा स्मार्ट चॉइस है। यह न सिर्फ तेज़ी से गर्म होता है बल्कि बिजली की खपत भी कम रखता है, जिससे आप LPG की उपयोग‑आवृत्ति कम कर सकते हैं।









