
सोचिए, आपके सामने एक विशाल झील फैली हुई है, लेकिन उसका पानी न सफेद, न नीला, न हरा – बल्कि चमकीला गुलाबी! ऐसा नजारा देखकर दिमाग में सबसे पहले ये ख्याल आएगा कि शायद किसी ने रंग मिला दिया हो या कोई केमिकल डाला हो। लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा रोचक और प्राकृतिक है। दुनिया में ऐसी झीलें मौजूद हैं, जिनका रंग सालों से गुलाबी बना रहता है। इनमें सबसे प्रसिद्ध है ऑस्ट्रेलिया की लेक हिलियर, जो प्रकृति के इस अनोखे खेल को समझाने का सबसे जीवंत उदाहरण है। आधुनिक विज्ञान ने इसके पीछे के राज को उजागर किया है, जो सूक्ष्म जीवों की दुनिया से जुड़ा है।
लेक हिलियर का विवरण और खोज
लेक हिलियर पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तट पर मिडल आइलैंड में बसी है। यह करीब 600 मीटर लंबी और 250 मीटर चौड़ी है, चारों तरफ सफेद नमकीन परत और नीलगिरी के पेड़ों से घिरी हुई। 1802 में ब्रिटिश नाविक मैथ्यू फ्लिंडर्स ने इसकी खोज की थी। उन्होंने समुद्र के नीले पानी के बीच इस गुलाबी चमक को देखा और दुनिया को इसके बारे में बताया। सालों तक इसका रहस्य अज्ञात रहा, लेकिन 2015 के एक्स्ट्रीम माइक्रोबायोम प्रोजेक्ट में वैज्ञानिकों ने पानी के नमूनों का विश्लेषण किया।
मेटाजेनोमिक सीक्वेंसिंग से पता चला कि यहां 10 से ज्यादा प्रकार के बैक्टीरिया और शैवाल रहते हैं। मुख्य भूमिका निभाते हैं डूनालिएला सालिना नामक शैवाल और हैलोबैक्टेरियम सालिनारम जैसे बैक्टीरिया। ये कठोर हालात- ज्यादा नमक, तेज धूप और कम ऑक्सीजन – में जीवित रहने के लिए कैरोटीनॉइड्स नामक लाल-गुलाबी पिगमेंट बनाते हैं। ये पिगमेंट कोशिकाओं को UV किरणों से बचाते हैं और पानी को बबलगम जैसा गुलाबी रंग दे देते हैं।
गुलाबी रंग का वैज्ञानिक रहस्य
गर्मियों में वाष्पीकरण से नमक की मात्रा बढ़ने पर ये जीव और सक्रिय हो जाते हैं, जिससे रंग गहरा हो जाता है। दिन में सूरज की रोशनी पड़ने पर चमक बढ़ जाती है, जबकि रात में रंग फीका पड़ सकता है। एक गिलास में पानी निकाल लें, तो भी गुलाबी रंग बरकरार रहता है- ये कोई जादू नहीं, बल्कि माइक्रोबायोम का कमाल है। बैक्टीरिया, शैवाल और वायरस का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र यहां संतुलित रहता है।
अगर मानवीय हस्तक्षेप हो, तो ये जीव प्रभावित हो सकते हैं। भारत में भी महाराष्ट्र की लोनार झील कभी-कभी गुलाबी हो जाती है, जो उल्कापिंड से बनी है, लेकिन हिलियर का रंग स्थायी है। दुनिया में सेनेगल की लेक रेटबा, स्पेन की टॉरेविएजा और ऑस्ट्रेलिया की हट लैगून जैसी अन्य झीलें भी इसी सिद्धांत पर काम करती हैं।
क्या है सुरक्षित उपयोग?
क्या इस पानी को पीया या तैरा जा सकता है? अच्छी खबर ये है कि ये जहरीला नहीं है। नमक की मात्रा डेड सी जितनी ज्यादा है, इसलिए पीना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं। तैरना संभव है, लेकिन मिडल आइलैंड संरक्षित क्षेत्र है। यहां कोई सड़क या पैदल मार्ग नहीं – सिर्फ हेलीकॉप्टर या सीनिक फ्लाइट से देखा जा सकता है। प्रशासन ने तैराकी पर रोक लगा रखी है, ताकि नाजुक पारिस्थितिकी बनी रहे। संपर्क से नमक की परत या माइक्रोब प्रभावित हो सकती है। पर्यटक वायुमंडल से इस चमत्कार को निहारते हैं, जो इसे और रहस्यमयी बनाता है।
संरक्षण का महत्व
प्रकृति का ये नजारा हमें याद दिलाता है कि पृथ्वी पर अभी भी अनसुलझे रहस्य बाकी हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से नमक का संतुलन बिगड़ सकता है, जो रंग को प्रभावित करेगा। लेक हिलियर जैसी झीलें जैव विविधता का खजाना हैं और संरक्षण की मिसाल। अगली बार जब कोई गुलाबी तस्वीर देखें, तो सोचें – ये छोटे जीवों की मेहनत का नतीजा है।









