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New Labour Codes: सैलरी, पीएफ और काम के घंटों पर आया नया नियम! नौकरीपेशा लोग कंफ्यूज न हों, आसान भाषा में समझें अपनी जेब पर असर

नए लेबर कोड से अब नौकरीपेशा की टेक‑होम सैलरी शुरुआत में कुछ कम भी हो सकती है, लेकिन PF, ग्रेच्युटी और ओवरटाइम के नियम मजबूत हो रहे हैं। सप्ताह में 48 घंटे की लिमिट, 1 साल में ग्रेच्युटी, नाइट शिफ्ट और गिग वर्कर्स को सुरक्षा देश की वर्किंग कल्चर बदल रही है। नौकरी छोड़ने पर 48 घंटे में फुल सेटलमेंट और डिजिटल शिकायत सिस्टम से कर्मचारी को अधिक अधिकार मिलेंगे।

By Pinki Negi

New Labour Codes: सैलरी, पीएफ और काम के घंटों पर आया नया नियम! नौकरीपेशा लोग कंफ्यूज न हों, आसान भाषा में समझें अपनी जेब पर असर

अगर आप किसी ऑफिस, फैक्ट्री, डिलीवरी ऐप या छोटी यूनिट में नौकरी करते हैं या करने वाले हैं, तो देश में लागू हुए नए लेबर कोड आपकी जेब, जॉब‑सिक्योरिटी और दिनचर्या से जुड़े हर पहलू को बदलने वाले हैं। केंद्र सरकार ने 2019–2020 के दौरान पारित चार श्रम संहिताओं को अप्रैल 2026 से व्यावहारिक तौर पर अमल में लाना शुरू कर दिया है, जिससे पहले के 29 अलग‑अलग श्रम कानूनों की जगह अब एक ही “सिंगल फ्रेमवर्क” लागू होगा। ये बदलाव सिर्फ कागजी शब्दनामे नहीं हैं, बल्कि सैलरी स्ट्रक्चर, PF, ग्रेच्युटी, ओवरटाइम, काम के घंटे और शिकायत समिति जैसे नियमों को भी बदल देंगे।

पुराने सिस्टम की गड़बड़ी क्या थी?

पहले हर सेक्टर के लिहाज से अलग‑अलग श्रम कानून होने की वजह से हालात बेहद जटिल थे। अलग राज्यों में अलग मिनिमम वेज, अलग PF और अलग ग्रेच्युटी नियम थे, जिससे न नौकरीपेशा खुद घर पर बैठकर अपने अधिकार समझ पाते थे और न ही छोटे‑बड़े नियोक्ता नियम जल्दी समझते थे। विवाद और शिकायत समाधान की प्रक्रिया भी इतनी लंबी और डॉक्यूमेंट‑आधारित थी कि कई बार कर्मचारी अपना अधिकार छोड़ देते थे। इसी उलझन को दूर करने के लिए सरकार ने अब चार नए लेबर कोड बनाए: वेज कोड (मजदूरी संहिता), इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और OSH (व्यावसायिक सुरक्षा व कामकाज की शर्तें) कोड।

सैलरी और बेसिक स्ट्रक्चर में क्या बदलाव?

नए वेज कोड का सबसे बड़ा प्रभाव सैलरी स्ट्रक्चर पर है। अब बेसिक सैलरी और डीए मिलाकर कुल वेतन का कम‑से‑कम 50% होना अनिवार्य किया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि कंपनियाँ जितना बेसिक सस्ते में रखकर बाकी रकम अलाउंस और स्पेशल पे के नाम पर देती थीं, अब उस तरह का “ट्रिक” आसानी से नहीं चलेगा। बेसिक में बढ़ौतरी के साथ PF और ग्रेच्युटी की कैलकुलेशन बढ़ेगी, लेकिन दूसरी तरफ कर्मचारियों के टेक‑होम सैलरी में हल्की कटौती भी हो सकती है, क्योंकि PF और अन्य ग्रुप‑इंश्योरेंस जैसे बेनेफिट्स अब ज़्यादा पैसे पर बैठेंगे।

एक ओर यह नियम लंबे समय में रिटायरमेंट फंड तो बढ़ाएगा, दूसरी ओर नौकरीपेशा अभी शुरुआती दौर में थोड़ी असुविधा भी महसूस कर सकते हैं, खासकर जहाँ अलाउंस ज़्यादा और बेसिक कम रहा करता हो।

PF, पेंशन और ग्रेच्युटी पर असर

सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत अब न केवल रेगुलर FTE और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की सुरक्षा बढ़ रही है, बल्कि गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स जैसे iPhone‑डिलीवरी, Swiggy‑Zomato या अन्य ऐप‑बेस्ड वर्कर्स को भी पहली बार सिस्टम में शामिल किया जा रहा है। अब इन वर्कर्स को PF, बीमा और अन्य सोशल‑सिक्योरिटी फ्रेमवर्क का अधिकार मिलने की संभावना है; कंपनियों को भी उनकी आय में से 1–2% तक कंट्रीब्यूशन देना पड़ सकता है।

साथ ही नए कोड में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी तरह के नियोजन के बाद लगातार 1 साल तक नौकरी करने वाले कर्मचारी को ग्रेच्युटी का अधिकार मिलेगा, जबकि पहले यह अक्सर 5 साल की शर्त पर आधारित होता था।

काम के घंटे, ओवरटाइम और नाइट शिफ्ट

काम के घंटों को लेकर नए नियम भी काफी स्पष्ट बनाए गए हैं। हफ्ते में अधिकतम 48 कामकाजी घंटे तय किए गए हैं, और इसे दो तरह से लागू किया जा सकता है: या तो दिन में 8 घंटे × 6 दिन, या फिर दिन में 12 घंटे काम करके 4 दिन काम और 3 दिन की छुट्टी। ऐसे में अगर कंपनी 8 घंटे से ज़्यादा काम करवाएगी तो उसे ओवरटाइम के लिए दुगनी दर पर वेतन देना होगा, जो पहले कई जगह नियम लागू नहीं होने से अक्सर अनदेखा हो जाता था।

इसी तरह नाइट शिफ्ट अब महिला कर्मचारियों के लिए भी कानूनन मान्य मानी जाती है, हालाँकि उनकी सुरक्षा, ट्रांसपोर्ट और ग्रुप वर्क जैसी शर्तें नियोक्ता को पहले से तय करनी होंगी।

छुट्टियाँ, शिकायत सिस्टम और नौकरी छोड़ने पर भुगतान

छुट्टियों और शिकायतों के मामले में भी नए कोड ने एक मजबूत फ्रेमवर्क बनाया है। अब जॉब छोड़ते समय कंपनी पर यह अनिवार्य है कि वह पूरा फुल‑एंड‑फाइनल सेटलमेंट (सैलरी, PF, ग्रेच्युटी, बोनस आदि) 48 घंटे के भीतर भुगतान करे। इससे नौकरीपेशा को लंबे समय तक पैसे के लिए भटकने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। साथ ही, यह दायित्व भी तय है कि हर प्रतिष्ठान में शिकायत समिति बने और विवाद ट्रिब्यूनल के ज़रिए 3 साल के भीतर निपटाए जाएँ, जिससे शिकायतों का समाधान तेज़ और ट्रांसपेरेंट होगा।

क्या ये नियम वाकई कर्मचारियों के लिए फायदेमंद हैं?

नए लेबर कोड की तारीफ और आलोचना दोनों एक साथ चल रही है। एक तरफ यह सच है कि सैलरी स्ट्रक्चर, PF, ग्रेच्युटी और ओवरटाइम के नियम अब ज़्यादा स्पष्ट और सुरक्षित हैं, तो दूसरी तरफ छोटी और घरेलू यूनिट्स और छोटे HR टीमों पर कंप्लायंस का बोझ भी बढ़ रहा है। फिर भी, नौकरीपेशा के लिहाज से यह बदलाव अच्छा समझा जाता है, क्योंकि न्यूनतम वेतन, टाइमिंग‑आधारित वेज और डिजिटल शिकायत सिस्टम जैसे प्रावधानों से उनका बैलेंस शक्ति नियोक्ता की तुलना में थोड़ा बढ़ने जैसा लग रहा है। अगर आप कर्मचारी हैं, कॉन्ट्रैक्ट जॉब में हैं, महिला हैं या गिग वर्कर हैं, तो इन नियमों को घर बैठकर समझना ज़रूरी हो गया है।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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