
केंद्र सरकार ने गुरुवार को लोकसभा में संसद के विशेष सत्र के दौरान तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश कर दिए, जो भारतीय लोकतंत्र के ढांचे को बदलने की क्षमता रखते हैं। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने संविधान (131वां संशोधन) बिल, 2026 के रूप में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पुनः प्रस्तुत किया, जबकि गृह मंत्री अमित शाह ने डीलिमिटेशन बिल, 2026 और संघ राज्य क्षेत्र कानून (संशोधन) बिल, 2026 सदन में रखे।
इनसे लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी और महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण मिलेगा, लेकिन 2011 की जनगणना आधारित तत्काल डीलिमिटेशन के प्रस्ताव ने विपक्ष को भड़का दिया है। विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया तुरंत आ गई। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने सदन में हंगामा किया, आरोप लगाते हुए कि “सरकार संविधान को हाईजैक कर रही है।”
महिला आरक्षण बिल का लंबा सफर
उन्होंने तर्क दिया कि महिला आरक्षण को डीलिमिटेशन से जोड़ना देरी का बहाना है और मौजूदा सीटों पर तुरंत लागू किया जा सकता है। संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू और अमित शाह ने स्पष्ट किया कि बिल अभी पेशी के चरण में हैं, बहस बाकी है। विशेष सत्र 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाला है, जहां 17 अप्रैल को लोकसभा में मतदान और 18 को राज्यसभा में चर्चा की उम्मीद है। महिला आरक्षण बिल का सफर लंबा रहा है।
डीलिमिटेशन का महत्व और इतिहास
1996 में एच.डी. देवेगौड़ा सरकार से शुरू होकर 2010 में मनमोहन सिंह के दौर में राज्यसभा से पास होने तक यह कई बार लटका। मोदी सरकार ने 2023 में इसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम नाम से पास कराया, लेकिन क्रियान्वयन डीलिमिटेशन और जनगणना से बंधा। अब बड़ा बदलाव यह है कि नई जनगणना का इंतजार किए बिना 2011 के आंकड़ों पर डीलिमिटेशन होगा।
डीलिमिटेशन कमीशन गठित होकर सीटों की सीमाएं तय करेगा, ताकि हर निर्वाचन क्षेत्र में जनसंख्या बराबर रहे। आखिरी डीलिमिटेशन 2002 में (2001 जनगणना आधारित) हुआ था, तब से आबादी असंतुलित हो गई है।
दोनों बिलों का गहरा संबंध
डीलिमिटेशन और महिला आरक्षण का गहरा लिंक है। बिना नए परिसीमन के आरक्षित सीटें तय करना असंभव, क्योंकि यह तय होगा कि कौन सी सीटें महिलाओं के लिए रोटेट होंगी। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, 850 सीटों में 33% यानी करीब 280 सीटें महिलाओं को मिलेंगी, जिसमें एससी/एसटी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण भी होगा। इससे 2029 चुनावों से लागू हो सकता है।
दक्षिणी राज्यों की चिंताएं और सरकारी आश्वासन
लेकिन दक्षिणी राज्य जैसे तमिलनाडु, तेलंगाना चिंतित हैं- उत्तर भारत (यूपी, बिहार) की तेज आबादी से उनकी सीटें कम हो सकती हैं। सरकार आश्वासन दे रही है कि मौजूदा अनुपात बरकरार रहेगा, कुल सीटें 50% बढ़ेंगी लेकिन कोई राज्य नुकसान में नहीं। विपक्ष पारदर्शिता पर सवाल उठा रहा है- 2011 के पुराने आंकड़े क्यों? क्या यह राजनीतिक इंजीनियरिंग है? पूर्व CEC एसवाई कुरैशी जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि लिंकिंग जरूरी थी, वरना विवाद बढ़ता।
बिल पास करने की प्रक्रिया
बिल पास करने के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए, प्लस आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी। राष्ट्रपति की सहमति के बाद कमीशन काम शुरू करेगा। यह कदम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करेगा, लेकिन संघीय संतुलन और समय पर सवाल बरकरार हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे नीतियां महिला-केंद्रित होंगी- शिक्षा, स्वास्थ्य पर फोकस बढ़ेगा। क्या यह लोकतंत्र का विस्तार बनेगा या क्षेत्रीय असंतुलन? संसद की बहस इसका फैसला करेगी।









