
आज के डिजिटल युग में मोबाइल और लैपटॉप हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुके हैं। पढ़ाई, काम, मनोरंजन, खरीदारी हो या बातचीत- हर काम स्क्रीन से जुड़ गया है। वर्क फ्रॉम होम और ऑनलाइन एजुकेशन ने स्क्रीन टाइम को कई गुना बढ़ा दिया है। लेकिन यह सुविधा एक गंभीर स्वास्थ्य खतरे के रूप में उभर रही है। लगातार स्क्रीन देखने से न केवल आंखें थक रही हैं, बल्कि दिमाग पर भी बुरा असर पड़ रहा है। हालिया रिसर्च में सामने आया है कि घंटों डिजिटल डिवाइस इस्तेमाल करने से मानसिक थकान, एकाग्रता की कमी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की डायरेक्टर एंथ्रोपोलॉजी डॉ. एल.एच. घोटेकर बताती हैं, “लगातार स्क्रीन एक्सपोजर से दिमाग पर जानकारी का बोझ बढ़ता है। नीली रोशनी दिमाग को हमेशा एक्टिव रखती है, जिससे आराम नहीं मिल पाता।” स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की 2025 स्टडी के अनुसार, रोजाना 7 घंटे से ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले 73% लोग मानसिक थकान और चिड़चिड़ापन का शिकार हैं। तेजी से बदलती स्क्रीन कंटेंट दिमाग को ओवरलोड कर देती है, जिससे सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। नींद के पैटर्न बिगड़ने से मेलाटोनिन हार्मोन दब जाता है, याददाश्त कमजोर पड़ती है और निर्णय लेने की क्षमता घटती है।
किन्हें है ज्यादा खतरा?
बच्चों, टीनएजर्स और ऑफिस वर्कर्स इसकी चपेट में सबसे ज्यादा हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक, किशोरियों में ज्यादा स्क्रीन टाइम से अनिद्रा और डिप्रेशन का खतरा दोगुना हो गया है। इंदौर MGM मेडिकल कॉलेज के सर्वे में पाया गया कि 73% लोग ‘डिजिटल गिरफ्त’ में हैं, जहां फोन न मिलने पर नोमोफोबिया (घबराहट) होती है। लैंसेट चाइल्ड हेल्थ जर्नल (2024) की स्टडी कहती है कि 4 घंटे से ज्यादा स्क्रीन वाले किशोरों में चिंता के लक्षण 15% बढ़े हैं। एम्स दिल्ली की रिसर्च में बच्चों में ADHD जैसे लक्षण- ध्यान की कमी और हाइपरएक्टिविटी- देखे गए। यूनिसेफ रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया की तुलना और साइबरबुलिंग से भावनात्मक संतुलन बिगड़ रहा है।
स्पष्ट लक्षण जो चेतावनी देते हैं
स्क्रीन ओवरयूज के संकेत जल्दी पहचानें। बार-बार सिरदर्द, जल्दी थकान, फोकस न लगना आम हैं। छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन, याददाश्त कमजोर होना, काम में गलतियां बढ़ना- ये दिमाग के संकेत हैं। कुछ को बेचैनी, घबराहट या अनिद्रा सताती है। एक रिपोर्ट में कहा गया कि ब्राइट स्क्रीन से दिमाग सुस्त हो जाता है, खासकर बच्चों में। लंबे समय में यह न्यूरोडीजेनेरेशन और मोटापे का कारण बन सकता है।
बचाव के आसान उपाय
एक्सपर्ट्स संतुलन की सलाह देते हैं। स्क्रीन टाइम 2 घंटे प्रतिदिन तक सीमित रखें। हर 20-30 मिनट में 20-20-20 नियम अपनाएं: 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखें। सोने से 1 घंटे पहले स्क्रीन बंद, नीली रोशनी फिल्टर यूज करें। व्यायाम, बाहर घूमें, गहरी सांस लें और पानी पिएं। बच्चों पर पैरेंटल कंट्रोल लगाएं। रिपोर्ट की माने तो- डिजिटल डिटॉक्स, नोटिफिकेशन ऑफ, सोशल इंटरैक्शन बढ़ाएं। डॉ. कौष्तुभ बागुल कहते हैं, “डोपामाइन लत से बचें, वास्तविक रिश्तों को प्राथमिकता दें।”
डिजिटल दुनिया जरूरी है, लेकिन संतुलन ही कुंजी। समय रहते कदम उठाएं, वरना स्वास्थ्य चुनौती बढ़ेगी।









