
मिडिल ईस्ट में ईरान और इजराइल के बीच चल रहा संघर्ष अब सिर्फ “सैन्य खबर” नहीं रह गया है; यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कनों पर सीधा दबाव बना चुका है। युद्ध जैसी अनिश्चितता ने न केवल कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ोतरी की ओर धकेला है, बल्कि शेयर बाजारों में भी भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। यही वक्त वह भी है जब निवेशक सुरक्षा ढूंढने के लिए सीधे सोने की तरफ भाग रहे हैं, जिसे बुरे वक्त में “असली खजाना” और सबसे भरोसेमंद संपत्ति माना जाता है।
युद्ध, तेल और भारी गिरावट
ईरान-इजराइल विवाद गहराने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। ब्रेंट और WTI दोनों ही बेंचमार्क क्रूड में 8 से 10% तक उछाल आ चुका है, जिसका असर सीधा भारत जैसे आयातक देशों पर पड़ रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा चलता है, तो तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर भी जा सकती हैं, जिसका बोझ आखिरकार पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट और महंगाई पर दिखेगा।
इसी बीच समुद्री रास्तों पर भी असर दिख रहा है। लाल सागर, हॉर्मुज़ स्ट्रेट जैसे रणनीतिक रूटों पर जोखिम बढ़ने से शिपिंग कंपनियां रास्ते बदल रही हैं, जिससे लॉजिस्टिक कॉस्ट बढ़ रहा है और सप्लाई चेन बाधित हो रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में देरी और उथल‑पुथल बढ़ रही है, जिसका असर सीधे शेयर बाजारों पर पड़ रहा है।
शेयर बाजार में हाहाकार
जब भी वैश्विक तनाव बढ़ता है, निवेशक जमापूंजी खोने के डर से स्टॉक मार्केट से पैसा निकालने लगते हैं। इस बार भी यही हो रहा है: यूरोप, एशिया और अमेरिका के प्रमुख शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, जिससे इंडेक्स तेजी से नीचे उतर गए हैं। ऐसे वक्त में एक ही एसेट निवेशकों के चेहरे पर मुस्कान लौटा पा रहा है- वह है सोना (Gold)।
विश्लेषक बताते हैं कि युद्ध या मंदी की आशंका के बाद निवेशक अपनी रिस्क लेने की इच्छा कम कर देते हैं, जिसका असर शेयर और बॉन्ड दोनों पर पड़ता है। इस अनिश्चितता के बीच सोना उस एक संपत्ति की तरह काम करता है, जिसमें बिना कंपनी, बिना डिफॉल्ट और बिना राजनीतिक वादे के भी भरोसा जताया जा सकता है।
कागजी मुद्रा नहीं, सोना है असली खजाना
दुनिया के वित्तीय इतिहास में यह बात बार‑बार साबित हुई है कि कोई भी कागजी मुद्रा शाश्वत नहीं है। 19वीं सदी में ब्रिटिश पाउंड (GBP) दुनिया का मुख्य व्यापारिक मुद्रा था, लेकिन दो विश्व युद्धों ने ब्रिटिश साम्राज्य की कमर तोड़ दी। युद्ध के खर्च उठाने के लिए ब्रिटेन ने नोट छापे और कर्ज लिया, जिससे पाउंड की क्रय शक्ति तेजी से गिरी और आज यह वही नहीं रह गया जो 200 साल पहले था।
इसके ठीक उलट स्विस फ्रैंक (Swiss Franc) लंबे दौर से सबसे भरोसेमंद “सेफ हेवन” मुद्रा माना जाता है। स्विट्जरलैंड की सेंट्रल बैंक ने हमेशा अपनी मुद्रा को सोने के भंडार के साथ कुछ हद तक बांधकर रखा है, जिससे आर्थिक संकट के समय भी यह अपेक्षाकृत स्थिर रहता है। यही कारण है कि युद्ध या मंदी के दौर में निवेशक कागजी मुद्राएं छोड़कर सोने समर्थित संपत्ति और स्विस फ्रैंक जैसी मुद्राओं की तरफ झुकते हैं।
युद्ध और मंदी में सोने की विनाशक भूमिका
इतिहास यह भी दिखाता है कि युद्ध और मंदी ने हमेशा मुद्राओं को कमजोर कर दिया है। पहले और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान तथा बाद में अनेक देशों की मुद्राओं के अवमूल्यन का लंबा सिलसिला चला। सरकारों ने हथियार, खर्च और लागत पूरी करने के लिए अंधाधुंध नोट छापे, जिससे पैसे की आपूर्ति बढ़ी, महंगाई भड़की और कागजी नोट वैल्यू हीन होते‑होते रह गए।
1929 की “ग्रेट डिप्रेशन” हो या 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट, हर बड़ी मंदी के बाद उन मुद्राओं की कीमत सबसे ज्यादा गिरी जो अपने पास पर्याप्त सोने का भंडार नहीं रखती थीं। इसके विपरीत वे अर्थव्यवस्थाएं, जिनके पास ठोस गोल्ड रिजर्व था, अपनी खरीद शक्ति और बाहरी विश्वसनीयता को बेहतर तरीके से बनाए रख पाईं। इसीलिए बुरे वक्त में निवेशक सोने को न केवल “सुरक्षा कवच” बल्कि वैश्विक विश्वास का प्रतीक मानते हैं।
भारत और स्विट्जरलैंड
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन आरबीआई के लिए सोने का भंडार और बढ़ाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। वर्तमान में भारत के पास लगभग 880 टन सोने का भंडार है, जो पूरी दुनिया में अच्छा आंकड़ा है, लेकिन देश की आबादी और आकार के सापेक्ष यह अभी भी छोटा माना जाता है। भारत का बड़ा व्यापार घाटा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की निर्भरता रुपये की अस्थिरता का एक बड़ा कारण है, जिसे बढ़ता गोल्ड रिजर्व ही कुछ हद तक संतुलित कर सकता है।
स्विट्जरलैंड इसका उलट उदाहरण है, जहां सेंट्रल बैंक ने हमेशा सोने को अपनी मुद्रा की “स्ट्रेटेजिक एसेट” माना है। यही वजह है कि स्विस फ्रैंक को दुनिया की सबसे भरोसेमंद सुरक्षित मुद्रा माना जाता है और युद्ध या मंदी के दौर में इसमें भारी रिस्क वैल्यू नहीं देखी जाती।









