
उत्तर प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड बिजली मीटरों को लेकर उपभोक्ताओं का आक्रोश चरम पर पहुंच गया था। बिजली बिलों में अचानक भारी इजाफा, मीटरों की खराब क्वालिटी और बिना सहमति के बदलाव जैसी शिकायतों के बीच योगी आदित्यनाथ सरकार ने बड़ा फैसला ले लिया है। प्रदेश भर में पुराने मीटरों को स्मार्ट प्रीपेड मीटरों से बदलने की प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगा दी गई है। अब तकनीकी समिति की रिपोर्ट आने तक पुराने मीटरों से ही बिजली बिल जारी होंगे।
यह निर्णय उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के अध्यक्ष डॉ. आशीष गोयल के निर्देश पर सभी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को भेजे गए पत्र के जरिए लागू किया गया है।
रोक का ऐलान और समिति गठन
इस रोक का ऐलान 18 अप्रैल को किया गया, जब मुख्यमंत्री ने ऊर्जा विभाग की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में उपभोक्ताओं की शिकायतों को गंभीरता से लिया। 12 अप्रैल को ही एक उच्चस्तरीय तकनीकी समिति का गठन किया गया था, जो स्मार्ट मीटरों की सटीकता, बिलिंग सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता, प्रीपेड सिस्टम की व्यवहार्यता और मीटरों की गुणवत्ता पर विस्तृत जांच करेगी। समिति की रिपोर्ट आने तक न तो जबरन और न ही स्वैच्छिक रूप से कोई पुराना मीटर बदला जाएगा।
हालांकि, नए बिजली कनेक्शन पर स्मार्ट प्रीपेड मीटर ही अनिवार्य रहेंगे। UPPCL के अनुसार, राज्य में अब तक 78 लाख स्मार्ट मीटर (जिनमें 70.50 लाख प्रीपेड) स्थापित हो चुके हैं, लेकिन व्यापक विरोध के कारण योजना पूरी तरह पटरी से उतर चुकी थी।
स्मार्ट मीटर योजना का उद्देश्य
स्मार्ट मीटर योजना केंद्र सरकार की रिवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम (RDSS) के तहत 27 हजार करोड़ रुपये की लागत से चल रही थी। इसका उद्देश्य 3.5 करोड़ पुराने मीटरों को बदलकर बिजली चोरी रोकना, बिलिंग पारदर्शी बनाना और उपभोक्ताओं को रीयल-टाइम खपत की जानकारी देना था। योजना में उपभोक्ताओं से कोई शुल्क नहीं लिया जाना था, लेकिन जमीनी स्तर पर समस्याएं उभर आईं। कई जिलों जैसे प्रयागराज, लखनऊ, नोएडा और मेरठ में उपभोक्ताओं ने शिकायत की कि मीटर बदलने के बाद बिल 2-3 गुना बढ़ गए।
एक चर्चित मामले में उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन ने गलत बिलिंग के कारण एक उपभोक्ता को 46 लाख रुपये का बिल थमा दिया था, जो बाद में घटाकर मात्र 330 रुपये रह गया। यूपी में भी इसी तरह की गड़बड़ियां सामने आईं, जहां मीटरों ने सही खपत न दर्ज कर तेजी से ‘जीरो बैलेंस’ दिखा दिया, जिससे बिजली कटौती हो गई।
उपभोक्ताओं की शिकायतें और विरोध
उपभोक्ता संगठनों और विपक्ष ने आरोप लगाया कि मीटर बिना सूचना या सहमति के बदले जा रहे थे। खासकर ग्रामीण इलाकों में तकनीकी जागरूकता की कमी से लोग प्रीपेड सिस्टम समझ ही नहीं पा रहे थे। मीटरों की खराब क्वालिटी पर सवाल उठे, क्योंकि कई मामलों में वे जल्दी खराब हो जाते या गलत रीडिंग देते। इससे न केवल उपभोक्ताओं में असंतोष फैला, बल्कि सड़कों पर विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए। सरकार ने पहले 5 अप्रैल को प्रीपेड मीटरों की अनिवार्यता समाप्त करने का संकेत दिया था, लेकिन अब पूर्ण रोक से उपभोक्ताओं में राहत की लहर है।
भविष्य की संभावनाएं
यह फैसला यूपी की बिजली व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। स्मार्ट मीटरों के फायदे जैसे तत्काल भुगतान, चोरी रोकथाम और कुशल वितरण को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन बिना पर्याप्त तैयारी के इसे थोपना उल्टा पड़ा। तकनीकी समिति की रिपोर्ट से स्पष्ट होगा कि क्या मीटरों में दोष है या सॉफ्टवेयर में खामी। तब तक लाखों परिवारों को पुराने मीटरों की सादगी से राहत मिलेगी। ऊर्जा मंत्री एके शर्मा ने कहा, “उपभोक्ता हित सबसे ऊपर है। जांच पूरी होने पर पारदर्शी निर्णय लेंगे।” यह कदम न केवल वर्तमान विवाद शांत करेगा, बल्कि भविष्य की योजनाओं के लिए सबक भी बनेगा।









