
‘मरीज अस्पताल में भर्ती था, सो रहा था, तभी चूहे ने उसकी उंगलियां कुतर दीं। कभी पैर की, कभी हाथ की।’ ऐसी खबरें आपने खूब सुनी होंगी। पर कभी सोचा है, जब चूहा उंगलियां कुतर रहा था तो मरीज को इसका पता कैसे नहीं चला? इसकी एक प्रमुख वजह हो सकती है- नसों का सुन्न हो जाना, यानी उनकी सेंसिटिविटीखत्म हो जाना। लेकिन नसें अचानक से सुन्न नहीं होतीं। पहले नसें कमजोर पड़ती हैं। इस दौरान शरीर आपको कई इशारे देता है। अगर इन इशारों को समय रहते समझ लिया जाए, तो नसों को बचाया जा सकता है।
जानकारी के लिए हमने स्थानीय न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. आत्मप्रीत सिंह से चर्चा की, जिन्होंने नसों की कमजोरी के कारण, लक्षण, इलाज और बचाव पर विस्तार से रोशनी डाली।
नसें कमजोर क्यों हो जाती हैं?
डॉ. सिंह के अनुसार, कुछ बीमारियां सीधे नसों पर असर डालती हैं, जबकि कुछ लोगों की नसों की बनावट ऐसी होती है कि वे इन बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। हमारे शरीर में दो तरह की नसें होती हैं- सेंसरी नर्व्स (जो शरीर से संवेदनाएं दिमाग तक पहुंचाती हैं) और मोटर नर्व्स (जो दिमाग के आदेशों को मांसपेशियों तक पहुंचाकर चल-फिरने में मदद करती हैं)।
नसों के नुकसान का सबसे आम कारण डायबिटीज है। अगर शुगर कंट्रोल में न हो, तो यह खून की छोटी नलियों को नुकसान पहुंचाती है, जिससे नसें भी डैमेज हो जाती हैं। विटामिन्स की कमी (खासकर B12, C, D) भी हमारे देश में नसों की कमजोरी का एक बड़ा कारण है। कुछ बीमारियां, जैसे गुलियन-बैरे सिंड्रोम, अचानक हो जाती हैं, जिसमें इम्यून सिस्टम गलती से एंटीबॉडीज बनाकर नसों पर हमला कर देता है, Resulting in अचानक हाथ-पैरों में कमजोरी और सांस लेने में तकलीफ।
3 मुख्य चेतावनी संकेत
डॉ. सिंह ने नसों की कमजोरी के तीन सबसे महत्वपूर्ण लक्षणों की पहचान कराई:
- लगातार सुन्नपन या संवेदना खोना: शरीर के किसी हिस्से (खासकर हाथ-पैर) में अचानक या लगातार सुन्नपन, जैसे जमीन का ठंडा-गर्म अनुभव न होना। यह सेंसरी नर्व्स के डैमेज होने का सीधा संकेत है।
- झनझनाहट, चींटियां चलने जैसा एहसास या करंट लगना: हाथ-पैरों में झुनझुनी, चुभन, चींटियों के चलने जैसा महसूस होना या अचानक करंट जैसा दर्द (खासकर जब स्पाइन में डिस्क स्लिप होकर नस पर दबाव डालती है)।
- मांसपेशियों में कमजोरी और बैलेंस बिगड़ना: चलते समय जमीन का महसूस न होना, पैरों में भारीपन, हाथ-पैरों का कंपकंपाना या अनियंत्रित होना। इससे व्यक्ति का बैलेंस बिगड़ जाता है और गिरने का खतरा बढ़ जाता है।
क्या कमजोर नसें ठीक की जा सकती हैं?
हाँ, समय पर इलाज से कमजोर नसें ठीक की जा सकती हैं, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि नसें कमजोर क्यों हो रही हैं।
- अगर कारण डायबिटीज है, तो शुगर को कंट्रोल में लाने से नसों को हुआ नुकसान कुछ हद तक या पूरी तरह ठीक हो सकता है।
- अगर विटामिन की कमी है, तो सप्लीमेंट्स से रिकवरी संभव है।
- गुलियन-बैरे सिंड्रोम जैसी बीमारियों में, अगर लक्षण शुरू होते ही 2-3 दिन के अंदर इलाज मिल जाए, तो लगभग पूरी रिकवरी हो सकती है।
- अगर नस पर डिस्क का ज्यादा दबाव है, तो कुछ मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि, अगर नसों को जबरदस्त नुकसान हो चुका है, तो रिकवरी धीमी हो सकती है और कभी-कभी पूरी तरह ठीक नहीं भी हो पाती।
नसें कमजोर न हों, इसके लिए करें ये 5 काम
डॉ. सिंह ने नसों को शांत रखने के लिए सरल लेकिन प्रभावी उपाय बताए:
- शुगर और BP कंट्रोल में रखें: यह नसों को डैमेज होने से बचाने का सबसे जरूरी कदम है।
- विटामिन्स की कमी न होने दें: अपनी डाइट में विटामिन B12, C, D और ऑमेगा-3 युक्त खाद्य (हरी सब्जियां, नट्स, फल, अंडे) शामिल करें।
- रोज 45 मिनट टहलें: यह खून के प्रवाह को बेहतर बनाता है और नसों को नुकसान पहुंचने का चांस लगभग खत्म कर देता है।
- बुरी आदतों से बचें: धूम्रपान और अत्यधिक शराब का सेवन नसों को सीधे नुकसान पहुंचाता है।
- लंबे समय तक एक ही पोजीशन में न बैठें: नियमित रूप से खिंचाव करें और अपनी पोजीशन बदलते रहें।
अगर आपको या आपके किसी परिचित को उपरोक्त लक्षणों में से कोई भी लगातार 2-3 दिन तक बना रहे, तो इलाज में देरी न करें। समय पर न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करना स्थायी नुकसान से बचा सकता है। याद रखें, नसों की कमजोरी अचानक नहीं होती; शरीर पहले चेतावनी संकेत देता है, बस हमें उन्हें पहचानना होता है।









