
अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध का असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहा। यह चुपचाप भारतीय घरों में दाखिल हो चुका है, किराने के बिलों से लेकर रसोई तक महंगाई की चिंगारी फैला रहा है। 15 दिनों में कच्चे तेल की कीमतें 40% उछलकर 73 से 103 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गईं, जो ब्रेंट क्रूड को 112 डॉलर तक ले जा सकती हैं। भारत जैसे 85% तेल आयातक देश पर इसका बोझ सीधा पड़ रहा है।
रोजमर्रा वस्तुओं पर चढ़े दाम
युद्ध से पॉलीथिलीन और पॉलिमर की लागत 40-50% बढ़ी है, जो दूध पैकेट, शैंपू बोतल, पानी की बोतल से लेकर पैकेजिंग तक हर चीज बनाती हैं। क्रिसिल के अनुसार, FMCG की 25-35% लागत तेल उत्पादों से जुड़ी है, जिसमें पैकेजिंग 15% जोड़ती है। साबुन, डिटर्जेंट जैसे उत्पाद महंगे हो चुके हैं। मुंबई में थेपला पैक की कीमत 50 से 75 रुपये हो गई, क्योंकि विक्रेता गैस महंगाई का हवाला दे रहे हैं।
रसोई पर गैस संकट का प्रहार
सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रखे हैं (50 दिन का स्टॉक उपलब्ध), लेकिन LPG कीमतें बढ़ा दीं। कच्चे तेल से LPG बनता है, इसलिए चाय-समोसे से लेकर स्थानीय खान-पान महंगा। खरीफ सीजन (जून) के लिए खतरा मंडरा रहा, क्योंकि यूरिया-DAP के कच्चे माल (अमोनिया $450 से $750/टन) महंगे हो गए। भारत GCC पर निर्भर, स्टॉक सिर्फ आधे सीजन का। किसानों की लागत हर चरण में चढ़ेगी, खाद्य महंगाई लंबे समय तक रहेगी।
रुपये की कमजोरी ने दोगुना बोझ
डॉलर के मुकाबले रुपया 95 तक गिर सकता है, आयात बिल भारी। हर 1 डॉलर/बैरल बढ़ोतरी से पेट्रोल 0.55 और डीजल 0.52 रुपये/लीटर महंगा। 100 डॉलर पार होने पर खुदरा दाम बढ़ेंगे, परिवहन-लॉजिस्टिक्स प्रभावित। फ्लाइट टिकट, इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे। कम आय वाले परिवार सबसे ज्यादा चपेटे में, क्योंकि खर्च का बड़ा हिस्सा भोजन पर।
प्रभावित सेक्टर: चेन रिएक्शन
एनर्जी, उर्वरक, पेट्रोकेमिकल, विमानन, पेंट्स, सिरेमिक्स, टायर, ऑटो, मेटल उद्योग प्रभावित। खेती के डीजल-खाद खर्च से फसल महंगी, ट्रांसपोर्ट से हर वस्तु। विशेषज्ञ चेताते हैं: यह ‘दबी’ महंगाई है, जो बजट फाड़ देगी। सरकार वैकल्पिक स्रोत सक्रिय कर रही, लेकिन लंबे युद्ध में महंगाई अनियंत्रित हो सकती। उपभोक्ता ईंधन बचत करें।









