
नौकरीपेशा लोगों के लिए ग्रेच्युटी सिर्फ एक बोनस नहीं, बल्कि रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा की मजबूती है। लेकिन एक छोटी सी चूक या नियमों की अनभिज्ञता लाखों रुपये फिसलवा सकती है। पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट 1972 के तहत यह लाभ मिलता है, जबकि नए लेबर कोड्स ने इसमें बदलाव लाए हैं, जिससे कर्मचारियों को जल्दी राहत मिलेगी। अक्सर लोग 5 साल की सेवा, नॉमिनेशन या कैलकुलेशन जैसी बारीकियों को नजरअंदाज कर अपनी मेहनत की कमाई गंवा देते हैं। आइए जानें ग्रेच्युटी क्या है और किन गलतियों से बचना जरूरी।
ग्रेच्युटी क्या है?
ग्रेच्युटी वह राशि है जो कंपनी लंबी सेवा के सम्मान में देती है- रिटायरमेंट, इस्तीफा या अनहोनी पर। 10 या अधिक कर्मचारियों वाली फर्म्स पर यह अनिवार्य है, सरकारी कर्मियों के अलग नियम हैं। पहले 5 साल लगातार सेवा जरूरी थी, लेकिन नवंबर 2025 से लागू नए लेबर कोड के तहत कुछ मामलों में 1 साल बाद भी पात्रता बन सकती है। मौत या विकलांगता पर यह शर्त माफ है।
गणना का फॉर्मूला सरल है: (अंतिम बेसिक सैलरी + डीए) × (सेवा के साल × 15/26)। 6 महीने से ज्यादा सेवा पर आधा साल पूरा गिना जाता है।
5 साल के नियम को हल्के में न लें
पहली बड़ी गलती: 5 साल के नियम को हल्के में लेना। 4 साल 11 महीने में नौकरी छोड़ना मतलब ग्रेच्युटी से हाथ धोना, भले कुल अनुभव ज्यादा हो। नए कोड से राहत मिलेगी, लेकिन अभी सतर्क रहें। दूसरी, नॉमिनेशन फॉर्म (फॉर्म F) में चूक। जॉइनिंग पर भरा यह फॉर्म अपडेट न रखें तो अनहोनी पर परिवार कोर्ट कचहरी के चक्कर काटेगा। नियमित चेक करें, खासकर शादी या बच्चे के जन्म पर।
कैलकुलेशन न समझना घातक
तीसरी भूल: कैलकुलेशन न समझना। लोग पूरी सैलरी पर ग्रेच्युटी मानते हैं, जबकि सिर्फ बेसिक+डीए गिना जाता है। उदाहरणस्वरूप, 50,000 बेसिक पर 30 साल सेवा से करीब 18 लाख बन सकता है, लेकिन गलत गणना से कंपनी कम दे दे तो स्वीकार कर लिया जाता है। खुद कैलकुलेटर चलाएँ। चौथी, टैक्स नियम अनदेखा करना। प्राइवेट सेक्टर में 20 लाख तक टैक्स-फ्री, ऊपर की राशि पर स्लैब अनुसार टैक्स। सरकारी में 16.5 लाख तक छूट।
निकाले जाने पर सावधानी बरतें
पाँचवीं: निकाले जाने पर लापरवाही। चोरी-धोखा साबित होने पर ग्रेच्युटी जब्त हो सकती है। छठी, कंपनी पॉलिसी और एक्ट में कन्फ्यूजन। कुछ फर्म्स बेहतर स्कीम देती हैं, लेकिन 10+ कर्मचारियों वाली एक्ट के दायरे में बंधी हैं। सातवीं, नौकरी बदलने पर क्लेम में देरी। 30 दिनों में फॉर्म जमा करें, देरी पर ब्याज मिले लेकिन प्रक्रिया जटिल हो जाती है।
नए नियम और सलाह
नए लेबर कोड से पेमेंट 30 दिनों में अनिवार्य, देरी पर 10% ब्याज। कैलकुलेशन बढ़ेगी, सीमा ऊपर जाएगी। सलाह: रिटायरमेंट से पहले HR से बात करें, नॉमिनेशन अपडेट रखें। ये छोटे कदम आपकी कमाई बचाएँगे। विशेषज्ञ कहते हैं, ग्रेच्युटी को SIP में लगाएँ ताकि महंगाई न खाए।









