
मार्च 2026 में भारत की रिटेल महंगाई (CPI) ने फिर से ऊपर की ओर झुकाव दिखाया है। सालाना आधार पर CPI दर बढ़कर 3.4% हो गई, जो फरवरी में 3.21% थी। यह आंकड़ा रिजर्व बैंक के 4% के मध्यम अवधि लक्ष्य (2–6% बैंड) के भीतर तो है, लेकिन लगातार 12वें महीने यह उभरा हुआ दबाव आम उपभोक्ता की जेब पर निश्चित तौर पर असर डाल रहा है। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में महंगाई दर 3.63% रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.11% दर्ज की गई, जिससे साफ झलकता है कि देश के लाखों किसान और गांवों के परिवारों पर भी दबाव ज्यादा दिख रहा है।
नए CPI फ्रेमवर्क और खाद्य‑ऊर्जा का निशाना
तनाव बढ़ाने वाला पहलू यह है कि ये आंकड़े नए, संशोधित CPI फ्रेमवर्क के तहत जारी हुए हैं, जिसमें अब 2024 बेस ईयर बनाया गया है। इसके तहत खाद्य और पेय पदार्थों का वजन घटकर 36.75% तक रह गया है, जबकि पहले यह 45.9% था। इसके बावजूद खाद्य समूह अभी भी महंगाई की सबसे बड़ी चालक शक्ति बना हुआ है, खासकर ऊर्जा, गैर‑खाद्य और फ्यूल से जुड़े खर्चों ने दबाव और बढ़ा दिया है।
मिडिल ईस्ट तनाव और ऊर्जा बाजार पर दबाव
मिडिल ईस्ट में बढ़ते राजनयिक और सैन्य तनाव ने इस बार महंगाई की कहानी में एक नया पैराग्राफ जोड़ दिया है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष और अमेरिका की तरफ से ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी लगाए जाने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का माहौल बना हुआ है। इसी वजह से ईंधन, खासकर तेल और गैस से जुड़ी कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखी गई। हॉर्मुज जैसे रणनीतिक जलमार्गों पर दबाव बढ़ने से ईंधन कीमतों पर निरंतर डर बना हुआ है, जिसका असर सीधे तौर पर उपभोक्ता बिल, लॉजिस्टिक्स और अंततः रसोई पर पड़ रहा है।
RBI की चिंता और भरोसा दोनों
ऐसे में रिजर्व बैंक ने चिंता तो जताई है, लेकिन भरोसा भी बनाए रखा है। अप्रैल की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने साफ कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था पहले से ज्यादा मजबूत और सदमे झेलने में सक्षम है, लेकिन वैश्विक तनाव और आपूर्ति‑शॉक से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
इसी संदर्भ में RBI ने FY27 के लिए खुदरा महंगाई का अनुमान 4.6% रखा है, जिसमें पहली तिमाही में 4.0%, दूसरी में 4.4%, तीसरी में 5.2% और चौथी में फिर से 4.7% जैसा तरीका अपनाया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि आने वाले महीनों में महंगाई पिक अपार बढ़ सकती है, खासकर जब ऊर्जा और आपूर्ति‑शृंखला से जुड़ी चुनौतियां बनी रहेंगी।
आम आदमी की रसोई और रोजमर्रा की चिंता
इस पूरी तस्वीर में आम आदमी की रसोई पर सीधा असर यह है कि रोजमर्रा की चीजें महंगी हो रही हैं, खासकर जो ऊर्जा, गैस और परिवहन से जुड़ी हैं। एलपीजी गैस, डीजल‑पेट्रोल और बिजली जैसे खर्चे बढ़ने से परिवारों को रसोई बजट में कटौती करनी पड़ रही है, जबकि दूसरी तरफ टमाटर और कुछ सब्जियों की कीमतों में उछाल से दाम और बढ़ रहे हैं।
इस बीच प्याज‑आलू और कुछ दालों की कीमतों में गिरावट ने राहत जरूर दी है, लेकिन ऊर्जा और गैर‑खाद्य खर्चों का भार इस राहत को कम या बीच‑बीच में खत्म कर दे रहा है। फलस्वरूप आम उपभोक्ता को अब सिर्फ कीमतें देखनी नहीं, बल्कि अपनी मासिक योजना, बचत और खरीदारी की आदतों को भी समय‑समय पर फिर से संभालना पड़ रहा है।





