
बहुत से लोगों को गलतफहमी है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उन पर काटा गया TDS और उससे बनने वाला रिफंड सब कुछ “खत्म” हो जाता है। लेकिन आयकर कानून के मुताबिक ऐसा नहीं है। अगर व्यक्ति की कुल आय पर जो टैक्स देय है, उससे TDS ज़्यादा कटा है, तो वह अंतर करदाता या उसके कानूनी वारिस को रिफंड के रूप में मिलना चाहिए। यानी माता‑पिता की मौत के बाद भी उनके बच्चों को उनका TDS रिफंड मिल सकता है, बस उसके लिए कुछ कानूनी कदम भरने होते हैं।
आयकर विभाग ने इस पूरी स्थिति के लिए अलग से नियम बनाए हैं, जिसके तहत मृत व्यक्ति के नाम पर खुली फाइल, भविष्य में आने वाले रिफंड और उसके बाद की वित्तीय दायित्वों की जिम्मेदारी उनके कानूनी वारिस पर आ जाती है। इसी चैप्टर में आइए जानते हैं कि माता‑पिता की मृत्यु के बाद बच्चों को उनका TDS रिफंड कैसे मिलता है और इसके लिए क्या‑क्या करना पड़ता है।
मृत व्यक्ति का TDS रिफंड कैसे मिलता है?
आमतौर पर जब किसी व्यक्ति की सेवानिवृत्ति, बैंक FD ब्याज, Maturity या अन्य आय पर TDS लगता है, तो उसका रिकॉर्ड आयकर विभाग के डेटाबेस में उसके PAN के नाम से चलता है। मृत्यु के बाद यह रिकॉर्ड गायब नहीं होता; बस इसका निपटान करने का अधिकार उसके कानूनी वारिस (जैसे बेटे‑बेटी, पति/पत्नी, या अन्य विरासत में आने वाले रिश्तेदार) को दे दिया जाता है।
इनकम टैक्स रिफंड के मामले में सबसे ज़रूरी बात यह है कि रिफंड खुद‑ब‑खुद आपके खाते में नहीं आता। इसके लिए मृतक के नाम पर आयकर रिटर्न (ITR) फाइल करना ज़रूरी होता है, और वह भी उचित और सही तरीके से। अगर कोई भी व्यक्ति या उसका परिवार मौत के बाद ITR नहीं भरता, तो रिफंड प्रोसेस नहीं चलती और वह राशि “अविदित/अभागवान” माने जाने जैसी स्थिति में खड़ी रह सकती है, जिसे बाद में निकालना और भी मुश्किल बन जाता है।
दूसरी ओर, अगर मृतक के बच्चे या कानूनी उत्तराधिकारी उनके नाम पर आयकर विभाग के पोर्टल पर रजिस्टर होकर आयकर रिटर्न भरते हैं, तो विभाग उसके आधार पर रिफंड जारी करने का प्रोसेस शुरू कर देता है। यही वजह है कि आजकल ज़्यादातर एक्सपर्ट और टैक्स एडवाइजर मृत व्यक्ति के परिवार को सलाह देते हैं कि निधन के जल्द से जल्द कानूनी वारिस आयकर विभाग में उसके नाम पर रजिस्टर करें और उपयुक्त वित्तीय वर्ष का रिटर्न दाखिल करें।
रजिस्टरेशन: खुद को “प्रतिनिधि करदाता” के रूप में दर्ज करना
आयकर विभाग के नियमों के अनुसार, जब कोई करदाता मर जाता है, तो उसके निपटान का काम उसके कानूनी वारिस के सिर पर आ जाता है। ऐसे वरिष्ठ को “Representative Assessee” या “प्रतिनिधि करदाता” कहा जाता है। यही व्यक्ति विभाग के साथ संवाद करता है, रिटर्न फाइल करता है और रिफंड आदि के लिए आवेदन कर सकता है।
अगर आप अपने माता‑पिता की मृत्यु के बाद उनका TDS रिफंड क्लेम करना चाहते हैं, तो सबसे पहला कदम यही होता है कि आप खुद को इनकम टैक्स ई‑फाइलिंग पोर्टल पर “Deceased Legal Heir” के रूप में रजिस्टर करें। इसके लिए प्रोसेस आमतौर पर इस तरह से होता है:
- सबसे पहले income tax e‑filing पोर्टल (https://www.incometax.gov.in) पर अपने पर्सनल अकाउंट से लॉगिन करें।
- ऊपर दिए गए मेन्यू में “Authorised Partners” या “Authorized Signatory / Representative” जैसा सेक्शन चुनें।
- वहाँ से “Register as Representative” पर क्लिक करें।
- Category में “Deceased Legal Heir” या इसी तरह का विकल्प चुनें (विभिन्न वर्षों में इंटरफ़ेस थोड़ा बदल सकता है, लेकिन बेसिक ऑप्शन वही रहता है)।
इसके बाद आपको कुछ ज़रूरी दस्तावेज अपलोड करने पड़ते हैं, जैसे: मृत्यु प्रमाण पत्र (death certificate), मृतक का PAN कार्ड, आपका PAN कार्ड, Legal Heir Certificate या अन्य वसीयत/सरकारी प्रमाण पत्र जो दिखाता हो कि आप वास्तविक वारिस हैं, और आवश्यकता अनुसार बैंक खाता विवरण। इन डॉक्यूमेंट्स को दाखिल करने के बाद आप आवेदन फॉर्म सबमिट करते हैं।
आमतौर पर कुछ दिनों (कभी‑कभी 2–7 कार्यदिवस) के भीतर आयकर विभाग आपका रजिस्ट्रेशन अप्रूव कर देता है और आपको उस परिवर्तन की सूचना ई‑मेल और SMS के जरिए भेज दी जाती है। इसके बाद आप उसी पोर्टल पर लॉगिन करके “Representative Assessee” के रूप में मृतक के नाम पर आयकर रिटर्न फाइल करने के योग्य हो जाते हैं।
मृत व्यक्ति की ओर से ITR कैसे फाइल करें?
रजिस्ट्रेशन मंजूर होने के बाद आपका दूसरा बड़ा कदम होता है: मृतक की ओर से आयकर रिटर्न फाइल करना। यह रिटर्न उस वित्तीय वर्ष के लिए फाइल किया जाता है जिसमें मृत्यु हुई, और आमतौर पर इसमें 1 अप्रैल से लेकर मृत्यु की तारीख तक की आय को दर्शाया जाता है। इसे गलत तरीके से नहीं भरना चाहिए, क्योंकि गलत रिटर्न भरने से नोटिस या ऑडिट जैसी स्थिति भी बन सकती है।
अगर आपके माता‑पिता की मृत्यु जून 2025 में हुई है, तो आप F.Y. 2025‑26 के लिए रिटर्न फाइल करेंगे, लेकिन आय केवल 1 अप्रैल से लेकर 5 जून (जैसी तारीख) तक की लिखेंगे। इसमें शामिल हो सकते हैं:
- बैंक या अन्य वित्तीय संस्थानों से मिला ब्याज
- पेंशन, अगर मिल रही थी
- हाउस रेंट आय (अगर कोई प्रॉपर्टी थी और किराया मिल रहा था)
- अन्य छोटी‑मोटी आय जो PAN के नाम से रिकॉर्ड में है
इन सभी आय को आप ITR में खुलकर दिखाएँ, और TDS शेड्यूल में उस वित्तीय वर्ष के दौरान कटा हुआ सारा TDS दर्ज करें। यह आमतौर पर आपके Form 26AS या TDS certificate से आता है।









