
बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। बीजेपी विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी को नेता चुना गया है और आधिकारिक तौर पर यह घोषणा हो चुकी है कि वे बिहार के अगले मुख्यमंत्री होंगे। इस फैसले ने 20 साल से चले आ रहे नीतीश कुमार‑केंद्रित राजनीतिक गणित को हिला दिया है और राजभवन से लेकर लोक भवन तक एक नया तानाबाना बुना जा रहा है।
सीएम हाउस से राजभवन तक की जर्नी
बुधवार सुबह से ही पटना में सियासी हलचल तेज थी। सीएम हाउस पर संजय झा, विजय चौधरी और ललन सिंह सुबह‑सुबह पहुंचे; करीब आधे घंटे की बैठक के बाद वहां से विजय चौधरी, सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार एक ही गाड़ी से निकले। फ्रंट सीट पर विजय चौधरी, पीछे की सीट पर सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार- इस दृश्य में खुद‑ब‑खुद एक संकेत था कि किस मोड़ पर बिहार की सत्ता चल रही है।
बीजेपी विधायक दल की बैठक और राजनीतिक संकेत
इसी दिन बीजेपी विधायक दल की बैठक में विजय सिन्हा ने सम्राट चौधरी के नाम का औपचारिक ऐलान किया। बैठक में प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी और पर्यवेक्षक के रूप में शिवराज सिंह चौहान भी मौजूद थे, जो बताता है कि यह फैसला सिर्फ राज्य स्तर की पहल नहीं, बल्कि दिल्ली की राजनीतिक गणित से भी जुड़ा है। इस दौरान दिलीप जायसवाल और मंगल पांडेय जैसे वरिष्ठ नेताओं ने उनके नाम का समर्थन करके बीजेपी के भीतर एकजुटता का इशारा दिया।
नीतीश कुमार का दूसरा छोटा कार्यकाल
इसी के साथ नीतीश कुमार ने अपने मुख्यमंत्रीपद के दूसरे छोटे कार्यकाल को लगभग इतिहास का हिस्सा बना दिया। मंगलवार को उन्होंने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया। 20 नवंबर 2025 को शपथ लेने वाले नीतीश कुमार इस बार सिर्फ 145 दिन ही कार्यकाल पूरा कर पाए, जिसे राजनीतिक विश्लेषक “संक्रमणकालीन सरकार” की तरह देख रहे हैं।
उनका यह दूसरा छोटा कार्यकाल भी 2000 के बाद उनकी राजनीतिक यादों को जीवित करता है, जब 3 मार्च 2000 को मुख्यमंत्री बनने के कुछ दिनों के भीतर ही 10 मार्च को इस्तीफा देना पड़ा था।
आखिरी कैबिनेट बैठक में भावुक नीतीश
नीतीश कुमार ने आखिरी कैबिनेट बैठक में भावुक किन्तु गरिमामय अंदाज अपनाते हुए कहा कि 2005 से लेकर आज तक जहां तक संभव हुआ, उन्होंने बिहार के लिए काम किया और अब भी वे नई सरकार को अपना मार्गदर्शन देने से पीछे नहीं हटेंगे। कई मंत्रियों ने इस अवसर पर इस कार्यकाल को “ऐतिहासिक” बताया, हालांकि राजनीतिक दलों के बीच शासन‑संतुलन और संघर्ष की गहरी लहरें इस शब्द को जटिल बना रही हैं।
सम्राट चौधरी की राजनीतिक यात्रा
सम्राट चौधरी के लिए यह लगभग तीन दशक की राजनीतिक जद्दो‑जहद का चरमोत्कर्ष है। आरजेडी, जेडीयू और फिर भाजपा- तीनों पार्टियों से गुजर चुके इस नेता को अब उसी पद की जिम्मेदारी मिल रही है जहां से वे एक समय दूर लगते थे। उनके नेतृत्व में बिहार की नई सरकार न केवल विकास और प्रशासनिक सुधार, बल्कि जातीय‑सामाजिक संतुलन, नौकरी और युवा नीतियों पर भी परखी जाएगी।
नई शुरुआत की राजनीतिक अटकलें
15 अप्रैल को लोक भवन, पटना में शपथ‑ग्रहण के बाद बिहार आधिकारिक तौर पर एक नए चेहरे के साथ आगे बढ़ जाएगा। सवाल यह है कि यह बदलाव केवल सत्ता‑परिवर्तन है या वास्तव में एक नई राजनीतिक विरासत की शुरुआत; इतिहास इसका जवाब आने वाले वर्षों में लिखेगा।









