
नए लेबर कोड के लागू होने से कर्मचारियों के लिए छुट्टियों और लीव एनकैशमेंट की दुनिया में बड़ा बदलाव हुआ है। अब छुट्टियां “लैप्स” होने का डर काफी हद तक खत्म हो चुका है, क्योंकि कर्मचारी हर साल अपनी बची हुई छुट्टियों को सीधे पैसे में बदल सकते हैं। इसके पीछे नए Occupational Safety, Health and Working Conditions (OSH) Code के तहत आए नियमों और आयकर विभाग की टैक्स‑छूट की बढ़ी हुई सीमा का सीधा फायदा कर्मचारियों को मिल रहा है।
हर साल कैश, रिटायरमेंट का इंतज़ार नहीं
इससे पहले लीव एनकैशमेंट मुख्यतः तब होता था जब कर्मचारी नौकरी छोड़ता था या रिटायर होता था। लेकिन नए लेबर कोड 2026 के तहत स्थिति बदल गई है। अब अधिकान्श कंपनियां कर्मचारियों को हर साल के अंत में बची हुई अर्जित छुट्टियों को कैश में बदलने की सुविधा दे सकती हैं। इससे कर्मचारी रिटायरमेंट या राजीनामा तक इंतज़ार नहीं करेंगे, बल्कि हर साल थोड़ा‑थोड़ा अतिरिक्त कैशफ्लो पा सकते हैं, जो उनकी फाइनेंशियल प्लानिंग में उपयोगी साबित होता है।
30 दिन की सीमा और “अतिरिक्त छुट्टियां कैश में”
नए नियमों में एक बड़ा बदलाव यह है कि कर्मचारी अगले साल के लिए अधिकतम 30 दिन की छुट्टियां ही कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं। इससे ज़्यादा जो भी छुट्टियां इकट्ठी हो चुकी हैं, उनका भुगतान कंपनी को साल के अंत में पहले से तय की गई फॉर्मूले के हिसाब से कर्मचारी को देना होगा। यानी अब बची हुई छुट्टियां सीधे कैश का फॉर्म बन जाती हैं, न कि बेकार जाने वाली एक नॉर्मल लीव बैलेंस।
इसके साथ ही नए नियमों में कर्मचारियों के खिलाफ “मैनेजमेंट का हक” भी सीमित किया गया है। अगर कर्मचारी ने छुट्टी मांगी और मैनेजमेंट ने काम के दबाव या अन्य वैध कारणों से डिनाई कर दी, तो उन छुट्टियों को 30 दिन की सीमा में नहीं गिना जाएगा। ऐसी छुट्टियां बिना किसी लिमिट के आगे जुड़ती रहेंगी और कर्मचारी के अकाउंट में सुरक्षित रहेंगी, जिससे उसे न्यायपूर्ण इंज्योयमेंट और फाइनेंसियल बेनिफिट दोनों मिलते हैं।
छुट्टी की पात्रता अब महज 6 महीने में
पहले एक साल में कम से कम 240 दिन काम करने के बाद ही कर्मचारी अर्जित छुट्टियों का हकदार होता था, जो बहुत से नए या शॉर्ट‑टर्म कर्मचारियों के लिए काफी कठिन था। नए लेबर कोड में इसे घटाकर 180 दिन कर दिया गया है, यानी कर्मचारी सिर्फ 6 महीने काम करने के बाद ही छुट्टी लेने और उसे आगे बचाने का हकदार हो जाएगा। यह बदलाव विशेष रूप से उन युवा और फ्रेश एंट्री‑लेवल कर्मचारियों के लिए बड़ा राहत कदम है, जो पहले लगातार काम करते हुए भी छुट्टी का फायदा नहीं उठा पाते थे।
नए लेबर कोड के लागू होने से कर्मचारियों के लिए छुट्टियों और लीव एनकैशमेंट की दुनिया में बड़ा बदलाव हुआ है। अब छुट्टियां “लैप्स” होने का डर काफी हद तक खत्म हो चुका है, क्योंकि कर्मचारी हर साल अपनी बची हुई छुट्टियों को सीधे पैसे में बदल सकते हैं। इसके पीछे नए Occupational Safety, Health and Working Conditions (OSH) Code के तहत आए नियमों और आयकर विभाग की टैक्स‑छूट की बढ़ी हुई सीमा का सीधा फायदा कर्मचारियों को मिल रहा है।
हर साल कैश, रिटायरमेंट का इंतज़ार नहीं
इससे पहले लीव एनकैशमेंट मुख्यतः तब होता था जब कर्मचारी नौकरी छोड़ता था या रिटायर होता था। लेकिन नए लेबर कोड 2026 के तहत स्थिति बदल गई है। अब अधिकान्श कंपनियां कर्मचारियों को हर साल के अंत में बची हुई अर्जित छुट्टियों को कैश में बदलने की सुविधा दे सकती हैं। इससे कर्मचारी रिटायरमेंट या राजीनामा तक इंतज़ार नहीं करेंगे, बल्कि हर साल थोड़ा‑थोड़ा अतिरिक्त कैशफ्लो पा सकते हैं, जो उनकी फाइनेंशियल प्लानिंग में उपयोगी साबित होता है।
30 दिन की सीमा और “अतिरिक्त छुट्टियां कैश में”
नए नियमों में एक बड़ा बदलाव यह है कि कर्मचारी अगले साल के लिए अधिकतम 30 दिन की छुट्टियां ही कैरी फॉरवर्ड कर सकते हैं। इससे ज़्यादा जो भी छुट्टियां इकट्ठी हो चुकी हैं, उनका भुगतान कंपनी को साल के अंत में पहले से तय की गई फॉर्मूले के हिसाब से कर्मचारी को देना होगा। यानी अब बची हुई छुट्टियां सीधे कैश का फॉर्म बन जाती हैं, न कि बेकार जाने वाली एक नॉर्मल लीव बैलेंस।
इसके साथ ही नए नियमों में कर्मचारियों के खिलाफ “मैनेजमेंट का हक” भी सीमित किया गया है। अगर कर्मचारी ने छुट्टी मांगी और मैनेजमेंट ने काम के दबाव या अन्य वैध कारणों से डिनाई कर दी, तो उन छुट्टियों को 30 दिन की सीमा में नहीं गिना जाएगा। ऐसी छुट्टियां बिना किसी लिमिट के आगे जुड़ती रहेंगी और कर्मचारी के अकाउंट में सुरक्षित रहेंगी, जिससे उसे न्यायपूर्ण इंज्योयमेंट और फाइनेंसियल बेनिफिट दोनों मिलते हैं।
छुट्टी की पात्रता अब महज 6 महीने में
पहले एक साल में कम से कम 240 दिन काम करने के बाद ही कर्मचारी अर्जित छुट्टियों का हकदार होता था, जो बहुत से नए या शॉर्ट‑टर्म कर्मचारियों के लिए काफी कठिन था। नए लेबर कोड में इसे घटाकर 180 दिन कर दिया गया है, यानी कर्मचारी सिर्फ 6 महीने काम करने के बाद ही छुट्टी लेने और उसे आगे बचाने का हकदार हो जाएगा। यह बदलाव विशेष रूप से उन युवा और फ्रेश एंट्री‑लेवल कर्मचारियों के लिए बड़ा राहत कदम है, जो पहले लगातार काम करते हुए भी छुट्टी का फायदा नहीं उठा पाते थे।
₹25 लाख तक टैक्स‑फ्री छूट
इनकम टैक्स के मामले में भी सरकार ने बड़ी राहत दी है। बजट 2024‑25 के बाद, प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए लीव एनकैशमेंट पर टैक्स‑छूट की सीमा को ₹3 लाख से बढ़ाकर ₹25 लाख कर दिया गया है। यानी अगर किसी कर्मचारी को रिटायरमेंट या राजीनामा पर लीव एनकैशमेंट से कुल ₹25 लाख तक मिलते हैं, तो यह रकम पूरी तरह टैक्स‑फ्री रहेगी; इससे ज़्यादा रकम पर ही आमदनी कर लगेगा।
सरकारी कर्मचारियों का विशेष फायदा
वहीं, केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों को और ज़्यादा राहत मिलती है। उनके लिए रिटायरमेंट पर मिलने वाला लीव एनकैशमेंट पूरी तरह टैक्स‑मुक्त रहता है; यानी उनकी यह रकम पर सीधा‑सीधा कोई टैक्स नहीं लगता। हालांकि, अगर कर्मचारी नौकरी के दौरान ही छुट्टियों को कैश में बदलता है, तो वह रकम “Income from Salary” के तहत आती है और पूरी तरह टैक्सेबल होती है। ऐसे में कर्मचारी को अपनी फाइनेंशियल और टैक्स प्लानिंग को बेहतर तरीके से सेट करने की ज़रूरत है।
लीव एनकैशमेंट की गणना कैसे होगी?
आमतौर पर लीव एनकैशमेंट की गणना आखिरी Basic Salary और Dearness Allowance (DA) के आधार पर की जाती है। एक सामान्य फॉर्मूला यह है:
Leave Encashment = (Basic Salary + DA) ÷ 30 × Number of Unused Leave Days
इस तरह हर कर्मचारी अपने बचे हुए दिनों से अप्रॉक्सिमेट रकम निकाल सकता है, हालांकि हर संस्था की अपनी पॉलिसी (PF, Gratuity, या अन्य नियम) हो सकती है, इसलिए अपनी HR‑पॉलिसी ज़रूर चेक करना ज़रूरी है।
नए लेबर कोड के साथ यह बदलाव न सिर्फ कर्मचारियों को फाइनेंशियल राहत दे रहा है, बल्कि उनके ऊपर “छुट्टी लेने का स्ट्रेस” और उसकी लैप्स होने की टेंशन भी काफी हद तक दूर कर रहा है।









