
डिजिटलाइजेशन का जमाना है। अब जीवन का हर छोटा‑बड़ा काम एक मोबाइल और एक बटन दबाने के इंतजाम में तब्दील हो गया है। खाना, शॉपिंग, बिल, टैक्स- हर चीज का भुगतान अब UPI के जरिए होने लगा है। सब्जीवाला हो या सुपरमार्केट, छोटा किराना स्टोर हो या बड़ा बिल, यूजर्स ने UPI को अपनाया है न केवल सुविधा के लिए, बल्कि इसलिए कि यह पूरी तरह फ्री है। लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी दिन UPI पर ही ट्रांजैक्शन फीस लगा दी जाए, तो इस डिजिटल इकोसिस्टम पर क्या असर पड़ेगा?
सर्वे का चौंकाने वाला आंकड़ा
एक हालिया सर्वे में खुलासा हुआ है कि अगर UPI पर फीस लग जाती है, तो भारत में लगभग 75 प्रतिशत यूजर्स इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना बंद कर देंगे। यह आंकड़ा न केवल यूजर्स की उम्मीदों को बताता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि डिजिटल इंडिया की यह सबसे बड़ी उपलब्धि अब एक “सार्वजनिक सुविधा” की तरह देखी जा रही है, जिस पर यूजर्स फीस देने को तैयार नहीं हैं। LocalCircles ने जो सर्वे किया, उसमें पाया गया कि सिर्फ 25 प्रतिशत यूजर्स ही फीस के साथ भी UPI इस्तेमाल करना जारी रखेंगे। यानी बड़ा बहुमत फीस लगते ही कैश या दूसरे ऑप्शन्स की तरफ लौट जाएगा।
इस सर्वे से दूसरा महत्वपूर्ण सुराग मिलता है: फीस के प्रति विरोध 2025 के मुकाबले बढ़ा है। तब लगभग 73 प्रतिशत लोगों ने ट्रांजैक्शन फीस का विरोध किया था, अब यह आंकड़ा और ऊपर चढ़कर 75 प्रतिशत के करीब पहुंच गया है। इसका मतलब यह है कि UPI के जरिए दिन में लगभग एक अरब ट्रांजैक्शन के लक्ष्य के पास पहुंच रहे प्रणाली के लिए यह एक खतरे का संकेत भी है।
MDR लगाने की डिमांड: फिनटेक और निवेशकों का दबाव
इस बीच, फिनटेक सेक्टर में लंबे समय से एक बहस चल रही है: अगर UPI इतना ज्यादा उपयोगिता बन गया है, तो इस पर “जीरो MDR” की पॉलिसी लंबे वक्त तक चलाना फाइनेंशियली टिकाऊ है? पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) ने बड़े मर्चेंट्स के लिए 0.3 प्रतिशत MDR लगाने का सुझाव दिया है। यह फीस किसी छोटे दुकानदार या आम यूजर पर नहीं डाली जाए, बल्कि बड़े कॉरपोरेट और ऑनलाइन मर्चेंट्स पर उतारी जाए, ताकि यूजर्स को सीधा फर्क न पड़े।
PCI का तर्क यह भी है कि UPI के जरिए हर रोज हो रहे करोड़ों ट्रांजैक्शन को सिक्योर रखने, फ्रॉड प्रेवेंशन, और नए टेक्नोलॉजी अपडेट के लिए भारी खर्च आता है। बिना MDR या किसी व्यावसायिक मॉडल के यह खर्च लंबे समय तक बैंकों, NPCI और इंफ्रा कंपनियों पर थोपना आसान नहीं है। गूगल, PhonePe, Paytm जैसी कंपनियां भी यूपीआई ट्रांजैक्शन से सीधे तौर पर कोई कमाई नहीं करतीं- उनकी आमदनी इनसेंटिव, ऐड, और दूसरे बिज़नस मॉडल से आती है। निवेशकों का दबाव यह बना हुआ है कि ये फिनटेक अब भीगते‑बहते बिज़नेस की तरह न चलते रहें, बल्कि MDR या दूसरे शुल्क मॉडल के जरिए प्रॉफिटबल रास्ते खोजें।
सरकार का रूख: फ्री UPI बनाए रखने की प्रतिबद्धता
इस बहस के बीच, सरकार ने साफ‑साफ घोषणा की है कि फिलहाल यूपीआई पर कोई ट्रांजैक्शन फीस नहीं लगाई जा रही है और वह इसे एक आम लोगों के लिए “सस्ता और उपलब्ध” पेमेंट टूल बनाए रखने की प्रतिबद्ध है। 2020 से यूपीआई और RuPay डेबिट कार्ड पर जीरो MDR की नीति लागू है, जिससे छोटे‑मोटे लेनदेन में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा मिला है। बजट 2026‑27 में सरकार ने UPI और RuPay डेबिट कार्ड को फ्री बनाए रखने के लिए 2000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का प्रावधान भी किया है, ताकि लंबे समय तक यह इंफ्रास्ट्रक्चर बैंकों पर ही न टले।
सरकार का फोकस यह है कि जितना ज्यादा लोग UPI का इस्तेमाल करेंगे, उतना ही डिजिटल इकोनॉमी आगे बढ़ेगी। इसीलिए वह यूपीआई को “कैशलेस इंडिया” की नींव के रूप में देख रही है, न कि किसी ऐसे प्रोडक्ट के रूप में जिससे तुरंत और सीधे ज्यादा पैसा बटोरना हो। फिर भी रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय की तरफ से संकेत मिलते हैं कि भविष्य में सिस्टम को फाइनेंशियल रूप से टिकाऊ बनाने के लिए कुछ बदलाव जरूर हो सकते हैं, लेकिन वह ऐसे होंगे जो आम उपभोक्ता को सीधे भारी पड़ें।
आगे की राह: फीस पर संतुलन बनाना जरूरी
यूपीआई ने डिजिटल पेमेंट को इतना आम बना दिया है कि आज यूजर्स इसे “फ्री राइट” मानने लगे हैं; इसलिए 70-75 प्रतिशत यूजर्स फीस का विरोध कर रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ फिनटेक और निवेशक भी यह कह रहे हैं कि बिना किसी रेवेन्यू मॉडल के यह इंफ्रास्ट्रक्चर लंबे समय तक चलना मुश्किल है। आगे की राह शायद इस तरह की निकलेगी कि फीस या MDR, अगर लागू भी होती है, तो वह बड़े मर्चेंट्स, बिज़नेस बैचों या विशेष श्रेणियों तक ही सीमित रहे, न कि आम उपभोक्ता तक। इस संतुलन को बनाए रखना ही भविष्य में डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की असली जंग होगी।









