
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुका है। नौकरियों से लेकर पढ़ाई, हेल्थकेयर और रोजमर्रा के कामों तक इसका दखल तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन एक चौंकाने वाले ट्रेंड ने सबका ध्यान खींचा है- जेन Z, यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी सबसे टेक-सेवी पीढ़ी, जो AI टूल्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करती है, वही इससे सबसे ज्यादा असहज और डरी हुई भी नजर आ रही है।
हालिया सर्वे बताते हैं कि जहां विशेषज्ञ AI के उज्ज्वल भविष्य की बात करते हैं, वहीं युवा नौकरी छिनने, प्राइवेसी लीक और नैतिक जोखिमों से सतरे हुए हैं। स्टैनफोर्ड की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि केवल 10% युवा ही AI से उत्साहित हैं, बाकी चिंता में डूबे हैं।
विरोधाभास की शुरुआत
यह विरोधाभास हैरान करता है। गैलप पोल के मुताबिक, 80% जेन Z AI इस्तेमाल करते हैं, लेकिन 48% मानते हैं कि इसके खतरे फायदों से ज्यादा हैं- यह आंकड़ा 2025 के 37% से दोगुना हो गया । युवा रोज चैटजीपीटी जैसे टूल्स से काम निपटाते हैं, लेकिन मन में ‘एआई शेम’ का बोझ ढोते हैं। वॉकमी सर्वे में 89% जेन Z ने कबूल किया कि वे AI यूज छिपाते हैं, क्योंकि ट्रेनिंग की कमी से लगता है कि वे बिना टूल के अक्षम हैं।
62% मीटिंग्स में AI ज्ञान का ढोंग करते हैं, जबकि सिर्फ 6.8% को सही गाइडेंस मिली। भारत में भी यही हाल – रैंडस्टाड सर्वे में 51% युवा मानते हैं कि AI बिजनेस बढ़ाएगा, लेकिन 95% एम्प्लॉयर्स के उलट वे ऑटोमेशन से भयभीत हैं।
नौकरियों पर सबसे बड़ा डर
नौकरियों पर असर सबसे बड़ा डर है। हार्वर्ड यूथ पोल में 59% युवाओं ने कहा कि AI उनकी जॉब्स पर खतरा है। स्टैनफोर्ड रिसर्च दिखाती है कि AI वाले सेक्टर्स में 22-25 साल वालों के लिए नौकरियां 13% घटीं । 64% लोग मानते हैं कि AI से जॉब्स कम होंगी, जबकि 73% एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यह काम आसान बनाएगा। लेकिन युवाओं में सिर्फ 23% सहमत हैं।
FOBO (फियर ऑफ बिकमिंग ऑब्सोलिट) इतना गहरा है कि 44% जेन Z कर्मचारी AI रोलआउट को जानबूझकर सबोटाज करते हैं – डेटा गलत डालना या टूल्स से मना करना जैसी चालाकियां । अर्थव्यवस्था पर भी मतभेद – 69% विशेषज्ञ AI को बूस्टर मानते हैं, लेकिन सिर्फ 21% आम लोग।
प्राइवेसी और अन्य चिंताएं
प्राइवेसी और बायस की चिंता भी कम नहीं। सिस्को स्टडी में 69% ने कानूनी जोखिम बताए, 68% गोपनीयता लीक से डरते हैं । भारत के युवा AI को ‘मिडनाइट थेरेपिस्ट’ बनाते हैं- 57% तनाव में चैटबॉट्स से बात करते हैं, 88% स्कूली बच्चे चिंता में AI की शरण लेते हैं। लेकिन 67% सोशल आइसोलेशन और 58% डेटा मिसयूज से सतरे हैं। गैलप रिपोर्ट में 31% जेन Z AI से गुस्से में हैं, एक्साइटमेंट 36% से घटकर 22% रह गया। 49% को लगता है कि AI सोचने की क्षमता कमजोर करेगा।
सरकारी नियंत्रण पर संदेह
सरकारी नियंत्रण पर भरोसा भी कम- सिर्फ 31% मानते हैं कि सरकार AI संभाल पाएगी, सिंगापुर जैसे अपवाद जहां 81% भरोसा है । विशेषज्ञों का उत्साह (56% सकारात्मक बदलाव की उम्मीद) आम लोगों के डर से उलट है। हेल्थकेयर में 84% एक्सपर्ट्स आशावादी, लेकिन सिर्फ 44% युवा।
समाधान की राह
जेन Z टेक-सेवी है, लेकिन बिना सपोर्ट के अनिश्चित। ट्रेनिंग, पारदर्शिता और जॉब रीस्किलिंग से यह डर कम हो सकता है। वरना, AI का विरोध बढ़ेगा, जो भविष्य के लिए खतरा है।









