
हम सभी अपने घरों में सोना और चांदी खरीदते हैं, लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि सोने की शुद्धता को हमेशा ‘कैरेट’ में क्यों मापा जाता है, जबकि चांदी को ज्यादातर ‘किलो’ या प्रतिशत में तौला और बेचा जाता है? यह दोनों कीमती धातुएं हैं, फिर भी इनकी खरीद-बिक्री के नियम और मापन की परंपराएं बिल्कुल अलग हैं।
अक्सर लोग इसमें भ्रमित हो जाते हैं, खासकर इनहेरिटेंस टैक्स (विरासत कर) के गणित को लेकर कन्फ्यूज्ड रहते हैं। इसके पीछे इतिहास, व्यापार के तरीके और इन धातुओं की अपनी प्रकृति का बड़ा हाथ है। आइए, इस दिलचस्प विषय पर गहराई से नजर डालते हैं, जो न केवल निवेशकों बल्कि हर आम आदमी के लिए उपयोगी है।
कैरेट: सोने की शुद्धता का वैश्विक पैमाना
सोना अपनी अद्भुत चमक और लचीलेपन के लिए जाना जाता है, लेकिन शुद्ध सोना (24 कैरेट) बेहद नरम होता है। इसे आभूषण बनाने के लिए तांबा, चांदी या जस्ता जैसी धातुएं मिलानी पड़ती हैं, वरना यह टूट-फूट सकता है। कैरेट प्रणाली इसी मिश्रण को 24 भागों में स्पष्ट करती है—24 कैरेट में 99.9% शुद्ध सोना, 22 कैरेट में 91.67% (22/24), जबकि 18 कैरेट में मात्र 75%। यह सिस्टम ज्वेलरी इंडस्ट्री में इंटरनेशनल मानक है, जो खरीदार को मिश्र धातु का सटीक अनुपात बता देता है। भारत जैसे देशों में, जहां शादियों और त्योहारों पर सोना प्रमुख होता है, यह प्रणाली धोखाधड़ी रोकने में मददगार साबित हुई है।
ऐतिहासिक रूप से, कैरेट शब्द अरबी ‘कirat’ से आया, जो कारतबी बीज के वजन पर आधारित था। मध्ययुगीन यूरोप में यह सोने की शुद्धता मापने का मानक बन गया। आज बीआईएस (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स) हॉलमार्किंग अनिवार्य करता है, जो कैरेट के साथ वजन भी प्रमाणित करता है। उदाहरणस्वरूप, 10 ग्राम 22 कैरेट सोने का शुद्ध सोना 9.167 ग्राम ही माना जाएगा। इनहेरिटेंस टैक्स में यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि कर केवल शुद्ध सोने पर लगता है, न कि मिश्रण पर।
चांदी का सफर: टंच से फाइननेस तक
दूसरी ओर, चांदी का मापन बिल्कुल अलग है। भारत में पारंपरिक रूप से ‘टंच’ प्रचलित है, जो सीधे प्रतिशत दर्शाता है- 99.9 टंच यानी 99.9% शुद्ध चांदी। आभूषणों के लिए 92.5 टंच या स्टर्लिंग सिल्वर आम है। चांदी सोने से अधिक कठोर और स्थिर होती है, इसलिए शुद्धता को प्रतिशत में बताना सरल रहा। आधुनिक समय में बीआईएस फाइननेस मार्किंग जैसे 999 (शुद्ध) या 925 का उपयोग होता है, जो वैश्विक स्तर पर मान्य है। यह सिस्टम ज्वेलरी, बर्तन, सिक्कों और औद्योगिक उपयोग (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स में) के लिए उपयुक्त है।
चांदी किलो में बिकने का मुख्य कारण इसका कम मूल्य और बड़े पैमाने का निवेश है। सोना जहां ग्रामों में करोड़ों का होता है, चांदी सस्ती होने से किलो या सिल्लियों में खरीदी जाती है। एशिया में किलो यूनिट प्रिय है, जबकि पश्चिम में ट्रॉय औंस (31.1 ग्राम) चलता है। लंदन बुलियन मार्केट एसोसिएशन (LBMA) के ‘गुड डिलीवरी’ बार 1000 ट्रॉय औंस (लगभग 31 किलो) के होते हैं, 999.9 शुद्धता वाले। ये वैश्विक स्पॉट प्राइस तय करते हैं। भारत में मुंबई का जौहरी बाजार या दिल्ली की चांदी मंडी में किलो दरें तय होती हैं।
ऐतिहासिक और व्यावहारिक कारणों का मेल
यह अंतर प्राचीन व्यापार से उपजा। सोना राजाओं-महाराजाओं का प्रतीक रहा, जहां शुद्धता सजावट के लिए सिद्ध करनी पड़ती थी। चांदी आमजन की धातु बनी- सिक्के, बर्तन और व्यापार में वजन प्रधान रहा। ब्रिटिश काल में स्टर्लिंग सिल्वर (92.5%) मानक बना। आज वैश्विक बाजारों में सोना ट्रॉय औंस में ट्रेड होता है लेकिन खुदरा में कैरेट हावी। चांदी 50% औद्योगिक उपयोग (सोलर पैनल, मेडिकल) में जाती है, जहां वजन मायने रखता है।
भारत में यह परंपरा सांस्कृतिक भी है। अक्षय तृतीया या धनतेरस पर सोना कैरेट में खरीदा जाता है, चांदी किलो में। करीब 800 टन वार्षिक चांदी आयात होती है, जबकि सोना 700 टन। इनहेरिटेंस टैक्स में चांदी का पूरा किलो मूल्यवान गिना जाता है, यदि शुद्धता प्रमाणित हो। हालिया ट्रेंड में सिल्वर ETF और गोल्ड ETF ने निवेश बदला, लेकिन खुदरा बाजार वही है।









