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भूलकर भी न खरीदें इलेक्ट्रिक कार, अगर आप में हैं ये 3 कमियां! लेने से पहले जान लें ये कड़वा सच

इलेक्ट्रिक कारें हर किसी के लिए समझदारी भरा सौदा नहीं हैं। जो लोग हफ्ते में केवल एक–दो बार या रोज 10–20 किमी चलाते हैं, किराए के घर या बिना डेडिकेटेड पार्किंग में रहते हैं, या अक्सर गांव और दूर-दराज की यात्राएं करते हैं, उनके लिए EV महंगी, असुविधाजनक और रिस्की साबित हो सकती है; ऐसे यूज़र्स के लिए पेट्रोल या हाइब्रिड कारें ज्यादा प्रैक्टिकल विकल्प हैं।

By Pinki Negi

भूलकर भी न खरीदें इलेक्ट्रिक कार, अगर आप में हैं ये 3 कमियां! लेने से पहले जान लें ये कड़वा सच

भारत में इलेक्ट्रिक कारें अब स्टेटस सिंबल और “फ्यूचर-रेडी” टैग का हिस्सा बन चुकी हैं। कम रनिंग कॉस्ट, हाई-टेक फीचर्स और प्रदूषण कम करने के वादों के बीच लोग तेजी से EV की ओर आकर्षित हो रहे हैं। लेकिन इसके पीछे जो कड़वी हकीकत छिपी है, वह यह है कि हर व्यक्ति के लिए EV खरीदना फाइनेंशियल या प्रैक्टिकल तौर पर समझदारी नहीं है। एक्सपर्ट और मार्केट डेटा साफ इशारा करते हैं कि कुछ खास तरह के यूज़र्स के लिए इलेक्ट्रिक कार लेना अभी के समय में सीधा घाटे का सौदा साबित हो सकता है।​

1. जिनकी डेली रनिंग कम है

इलेक्ट्रिक कारें आमतौर पर अपने सेगमेंट की पेट्रोल कारों से काफी महंगी होती हैं। अगर कोई व्यक्ति हफ्ते में सिर्फ एक-दो बार कार निकालता है या रोजाना उसकी यात्रा 10-20 किलोमीटर तक ही सीमित है, तो EV की हाई इनिशियल कॉस्ट रिकवर करना लगभग नामुमकिन हो जाता है।​ आप जितना ज्यादा किलोमीटर चलेंगे, उतना ही प्रति किलोमीटर कम खर्च का फायदा EV आपको लौटा पाएगी। लेकिन कम चलाने वालों के केस में होता उलटा है-​

  • पेट्रोल कार की ऑन-रोड कीमत कम होती है, EMI और इंटरेस्ट भी कम बनते हैं।
  • EV की बैटरी समय के साथ पुरानी होती है, चाहे आप उसे कम चलाएं या ज्यादा, और बाद में इसकी रिप्लेसमेंट बहुत महंगी पड़ सकती है।​
  • फाइनेंशियल हिसाब से देखें तो ऐसे यूज़र्स के लिए सस्ती पेट्रोल या हाइब्रिड कार लेना ज्यादा तार्किक है, क्योंकि ईंधन पर होने वाली थोड़ी-बहुत बचत, एक्स्ट्रा खरीद कीमत को जस्टिफाई नहीं कर पाती।​

यानी अगर आपकी डेली रनिंग बहुत कम है, तो EV आपके लिए “पैसों की बचत” नहीं बल्कि “कॅपिटल ब्लॉक” करने वाला प्रोडक्ट बन जाती है।

2. घर पर चार्जिंग की जगह नहीं

इलेक्ट्रिक कार का असली फायदा तब दिखता है जब आपके पास घर या ऑफिस में डेडिकेटेड चार्जिंग पॉइंट हो। भारत के बड़े शहरों में ज्यादातर लोग अपार्टमेंट, किराये के घर या ऐसी सोसाइटी में रहते हैं जहां तय पार्किंग या प्राइवेट चार्जिंग पॉइंट की सुविधा नहीं होती।

ऐसे में picture कुछ यूं बनती है:

  • हर बार पब्लिक फास्ट चार्जर तक जाना पड़ेगा, जो न केवल महंगा पड़ता है बल्कि समय भी निगल जाता है।​
  • आपको अपनी डेली रूटीन को चार्जिंग स्लॉट के हिसाब से एडजस्ट करना पड़ेगा – ऑफिस से लौटते वक्त या वीकेंड पर घंटों सिर्फ चार्जिंग के लिए इंतजार करना पड़े तो EV आराम नहीं, झुंझलाहट बन जाती है।
  • कई सोसाइटियों में चार्जिंग सेटअप लगाने के लिए RWA या मकान मालिक से अनुमति लेना अपने आप में लंबी और राजनीतिक प्रक्रिया बन जाती है, जो EV ओनर के लिए मानसिक तनाव भी बढ़ाती है।​

किराये के घर में रहने वालों के लिए समस्या और गहरी हो जाती है। मकान बदलते ही पूरा चार्जिंग सेटअप फिर से लगाने का खर्च और झंझट सामने आता है, जिसे देखते हुए बहुत से कंज्यूमर EV खरीदने से पहले ही पीछे हट जाते हैं।

3. जो अक्सर गांव या दूर-दराज के इलाकों में जाते हैं

EV के साथ सबसे बड़ा साइकोलॉजिकल प्रेशर होता है “रेंज एंग्जाइटी”- कहीं रास्ते में बैटरी खत्म न हो जाए। शहरों में तो धीरे-धीरे चार्जिंग नेटवर्क बेहतर हो रहा है, लेकिन नेशनल हाईवे, गांव और दुर्गम इलाकों की बात करें तो तस्वीर अभी भी संतोषजनक नहीं है।​

अगर आपका काम ऐसा है कि आपको अचानक लंबी दूरी की यात्रा पर निकलना पड़ता है, या आप रेगुलर बेस पर गांव, छोटे कस्बों या हिल एरिया में जाते हैं, तो EV आपके लिए फिलहाल रिस्की निवेश है।

  • हाईवे पर चार्जिंग स्टेशन आपस में 100-150 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर भी हो सकते हैं, और वहां भी कभी लाइन, कभी आउट ऑफ सर्विस या स्लो चार्जिंग जैसी दिक्कतें मिल सकती हैं।​
  • छोटी रेंज वाली बजट EV कारों में रियल-लाइफ रेंज अक्सर कंपनी क्लेम से कम निकलती है, खासकर गर्मी में AC के साथ या फुल लोड में।
  • अगर बीच रास्ते में बैटरी लो हो जाए तो टॉइंग, होटल में रुकर चार्जिंग, और समय की बर्बादी – ये सब मिलकर ट्रिप का पूरा इकॉनॉमिक्स बिगाड़ देते हैं।

4. जिन्हें तेज़ रीसेल और कम रिस्क चाहिए

EV मार्केट अभी डेवलपमेंट फेज में है, टेक्नोलॉजी लगातार बदल रही है। नतीजा यह कि 5-7 साल पुरानी इलेक्ट्रिक कार खरीदने से सेकेंड-हैंड खरीदार हिचकते हैं, क्योंकि सबसे बड़ा सवाल बैटरी की बची हुई लाइफ और उसके रिप्लेसमेंट कॉस्ट को लेकर खड़ा हो जाता है।​

रिपोर्ट्स और ऑटो एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इलेक्ट्रिक कारों की रीसेल वैल्यू अभी भी समान सेगमेंट की पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों के मुकाबले कमजोर है। बैटरी पैक कई बार कार की कुल कीमत के 40-50 फीसदी तक का हिस्सा होता है, और संभावित खरीदारों को इसी भारी खर्च का डर EV से दूर कर देता है।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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