
आज के दौर में टैक्स बचाने के चक्कर में कई लोग पत्नी के नाम पर पैसे या संपत्ति ट्रांसफर करने की सोचते हैं, यह मानते हुए कि इससे उनकी टैक्स देनदारी कम हो जाएगी। लेकिन इनकम टैक्स विभाग के सख्त नियम इसकी राह में बड़ा रोड़ा अटकाते हैं। आयकर अधिनियम की धारा 64 के तहत ‘क्लबिंग ऑफ इनकम‘ का प्रावधान ऐसा ही एक जाल है, जो टैक्स चोरी की कोशिशों को विफल कर देता है।
ऊपर दी गई जानकारी के अनुसार, पति द्वारा बिना पर्याप्त प्रतिफल के पत्नी को दिए गए पैसे या संपत्ति से होने वाली किसी भी कमाई को सीधे पति की आय में जोड़ दिया जाता है, जिससे टैक्स बचाने का सपना चूर-चूर हो जाता है।
क्लबिंग ऑफ इनकम का जाल
यह नियम खासतौर पर तब लागू होता है जब पति अपनी कमाई का कुछ हिस्सा पत्नी के अकाउंट में भेजता है और वह महिला निवेश जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट, म्यूचुअल फंड, शेयर बाजार या प्रॉपर्टी में लगा देती है। मान लीजिए, आप 10 लाख रुपये पत्नी को ट्रांसफर करते हैं और वह इसे FD में जमा कर देती है, जहां 7 प्रतिशत सालाना ब्याज मिलता है। तो 70,000 रुपये का यह ब्याज आपकी व्यक्तिगत आय में क्लब हो जाएगा और उसी टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगेगा जो आपकी कुल कमाई पर लागू होता है।
इसी तरह, अगर प्रॉपर्टी गिफ्ट की जाती है, तो गिफ्ट के समय कोई टैक्स नहीं लगता, लेकिन किराए की आमदनी या बिक्री से होने वाले लाभ पर टैक्स पति को ही चुकाना पड़ता है। केवल साधारण घरेलू खर्च या सेविंग्स अकाउंट का मामूली ब्याज इससे मुक्त रहता है, लेकिन निवेश से होने वाली कोई भी आय बच नहीं पाती।
पति-पत्नी रिश्ते पर विशेष नजर
क्लबिंग का यह नियम पति-पत्नी के रिश्ते को विशेष रूप से निशाना बनाता है, क्योंकि टैक्स अधिकारी इसे टैक्स से बचने की साजिश मानते हैं। अगर पत्नी नौकरीपेशा है या अपनी स्किल से कमाती है, जैसे फ्रीलांसिंग या टेक्निकल काम, तो कुछ मामलों में क्लबिंग से छूट मिल सकती है। लेकिन नए इनकम टैक्स बिल 2025 के तहत भी सख्त शर्तें हैं, जहां पत्नी की स्वतंत्र कमाई को ही मान्यता दी जाती है। गलत तरीके से ट्रांसफर पकड़े जाने पर न सिर्फ अतिरिक्त टैक्स, बल्कि ब्याज और भारी जुर्माना भी लग सकता है, यहां तक कि कानूनी कार्रवाई तक की नौबत आ सकती है।
लोन के रूप में ट्रांसफर: वैध विकल्प?
हालांकि, लोन के रूप में पैसा देने का तरीका एक वैध विकल्प हो सकता है। अगर पति पत्नी को ब्याज के साथ लोन देता है और लिखित एग्रीमेंट, रिटर्न फाइलिंग और बैंक स्टेटमेंट जैसे प्रमाण रखता है, तो क्लबिंग से बचा जा सकता है। उदाहरणस्वरूप, बाजार दर से ब्याज वसूलना और समय-समय पर किस्तें लेना साबित करेगा कि यह गिफ्ट नहीं, बल्कि वास्तविक उधार है। लेकिन अगर ब्याज न लिया जाए या दस्तावेज न हों, तो टैक्स विभाग इसे गिफ्ट ही मान लेगा। इसी तरह, शादी से पहले दिए गए गिफ्ट पर क्लबिंग लागू नहीं होती, जो एक अपवाद है।
घरेलू खर्च: सुरक्षित लेकिन सीमित
घरेलू खर्च के लिए ट्रांसफर आमतौर पर सुरक्षित माने जाते हैं। दैनिक जरूरतों जैसे राशन, बच्चों की फीस या घर का खर्च पूरा करने के पैसे पर टैक्स का कोई बोझ नहीं पड़ता। समस्या तब शुरू होती है जब यह पैसा निवेश में चला जाता है और कमाई पैदा करता है। ऐसे में टैक्स अधिकारी पूछताछ कर सकते हैं कि स्रोत क्या है और क्लबिंग लागू कर देंगे।
स्मार्ट प्लानिंग से टैक्स बचत
फिर भी, निराशा की कोई बात नहीं। सही प्लानिंग से पति-पत्नी मिलकर टैक्स काफी हद तक बचा सकते हैं। दोनों के नाम पर अलग-अलग संयुक्त निवेश जैसे शेयर या म्यूचुअल फंड में किया जाए, तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन की छूट (1.25 लाख रुपये तक) दोनों को मिल सकती है। हेल्थ इंश्योरेंस या होम लोन पर डिडक्शन (सेक्शन 80D और 24b) दोगुना हो जाता है, अगर दोनों अलग-अलग क्लेम करें।
बच्चों की पढ़ाई या ट्यूशन फीस पर सेक्शन 80C का लाभ दोनों ले सकते हैं। नौकरी करने वाली पत्नी के लिए लीव ट्रैवल अलाउंस (LTA) का दावा दोगुना फायदा देता है। इसके अलावा, दोनों मिलकर PPF, ELSS या NPS जैसे टैक्स-सेविंग स्कीम में निवेश करें, तो 1.5 लाख रुपये तक की डिडक्शन आसानी से हासिल हो जाती है।
विशेषज्ञ सलाह: CA से परामर्श जरूरी
टैक्स विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी रणनीतियों के लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह जरूरी है, क्योंकि हर परिवार की स्थिति अलग होती है। गलत कदम न सिर्फ टैक्स बढ़ा सकता है, बल्कि विश्वासघात का आरोप भी लग सकता है। कुल मिलाकर, पत्नी के नाम ट्रांसफर टैक्स बचाने का जुगाड़ नहीं, बल्कि जाल है। स्मार्ट और कानूनी तरीकों से ही स्थायी फायदा मिलेगा।









