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सोशल मीडिया पर सरकार का बड़ा फैसला: बच्चों के लिए बैन नहीं, पर अब बदल जाएंगे सारे नियम

भारत सरकार बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण बैन नहीं, बल्कि उम्र के हिसाब से सख्त और चरणबद्ध नियम लाने की तैयारी में है। नए कानून के तहत 8–18 वर्ष तक तीन कैटेगरी बनेंगी, टाइम-लिमिट, नाइट-लॉगइन रोक और पैरेंटल कंसेंट को टेक्निकली अनिवार्य किया जा सकता है, ताकि डिजिटल एडिक्शन और मानसिक स्वास्थ्य के जोखिम कम हों।

By Pinki Negi

सोशल मीडिया पर सरकार का बड़ा फैसला: बच्चों के लिए बैन नहीं, पर अब बदल जाएंगे सारे नियम

डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा पर गर्म बहस के बीच केंद्र सरकार ने साफ संकेत दिया है कि वह 18 वर्ष से कम उम्र के किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय सरकार एक नुआंस्ड यानी बारीक और ग्रेडेड (श्रेणीबद्ध) अप्रोच पर काम कर रही है, जिसमें अलग-अलग उम्र के बच्चों पर अलग स्तर की पाबंदियां लागू होंगी। शीर्ष सरकारी सूत्रों के अनुसार, विचार यह है कि आज के बच्चे तकनीकी रूप से ज्यादा जागरूक हैं, इसलिए उन्हें पूरी तरह काटने की बजाय सुरक्षित, सीमित और जिम्मेदार एक्सेस देना ज्यादा व्यावहारिक माना जा रहा है।

इसी दिशा में एक नया केंद्रीय कानून तैयार किया जा रहा है, जिसे संसद के आगामी मानसून सत्र में पेश किए जाने की संभावना जताई जा रही है। सरकार के भीतर यह समझ बनी है कि अगर नियमों को अत्यधिक दमनकारी बना दिया गया तो बच्चे वैकल्पिक और अनियंत्रित प्लेटफॉर्म की तरफ शिफ्ट हो सकते हैं, जिससे जोखिम और बढ़ जाएगा। इसलिए नीति का फोकस “बैन” से हटकर “रेगुलेशन, मॉनिटरिंग और पैरेंटल इनवॉल्वमेंट” पर शिफ्ट होता दिख रहा है।

8-18 वर्ष: तीन कैटेगरी, तीन तरह के नियम

प्रस्तावित मॉडल के तहत बच्चों को broadly तीन आयु वर्गों में बांटने की तैयारी है, ताकि हर उम्र के लिए अलग डिजिटल आज़ादी और सुरक्षा मानक तय किए जा सकें।

  • 8 से 12 वर्ष: इस श्रेणी के लिए सबसे ज्यादा प्रतिबंधात्मक नियम होने की संभावना है। मतलब या तो सोशल मीडिया पर सीधा एक्सेस न मिले, या सिर्फ अत्यधिक फिल्टर्ड, शैक्षिक और परिवार-नियंत्रित कंटेंट तक ही पहुंच सीमित रहे।
  • 12 से 16 वर्ष: यहां मध्यम स्तर की निगरानी और सीमाएं लागू करने की सोच है, जिसमें बच्चों को सीमित समय के लिए सोशल मीडिया पर रहने की अनुमति हो, लेकिन सख्त पैरेंटल कंसेंट, कंटेंट फिल्टर और रिपोर्टिंग मैकेनिज्म के साथ।
  • 16 से 18 वर्ष: इस कैटेगरी को अपेक्षाकृत ज्यादा स्वतंत्रता दी जा सकती है, लेकिन इसके साथ सुरक्षा मानक, डेटा प्रोटेक्शन और हानिकारक कंटेंट से बचाव के लिए स्पष्ट गाइडलाइन भी अनिवार्य होंगी।

यह पूरा ढांचा चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के मॉडल से प्रेरित दिखता है, जहां ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया पर समय-आधारित और उम्र-आधारित कड़े नियम पहले से लागू हैं। उद्देश्य यह है कि बच्चे डिजिटल दुनिया के पूरी तरह बाहर न हों, बल्कि एक नियंत्रित, सुरक्षित और उम्र के मुताबिक तैयार किए गए डिजिटल इकोसिस्टम में रहें।

टाइम लिमिट, नाइट बैन और पैरेंटल कंसेंट

सोशल मीडिया रेगुलेशन पर आईटी मंत्रालय के भीतर जो चर्चाएं चल रही हैं, उनमें “टाइम-बेस्ड लिमिट” सबसे महत्वपूर्ण टूल के रूप में सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक तीन बड़े प्रावधानों पर मंथन हो रहा है:

  • दिन के समय में अधिकतम उपयोग समय: जैसे, 24 घंटे में सोशल मीडिया के लिए केवल एक घंटे की सीमा तय करना, ताकि डिजिटल एडिक्शन पर लगाम लगे और बच्चे पढ़ाई, खेल-कूद और ऑफलाइन इंटरेक्शन के लिए समय निकाल सकें।
  • शाम और रात में लॉग-इन पर रोक: रात में सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध से नींद, मानसिक स्वास्थ्य और साइबर बुलिंग जैसे जोखिमों को कम करने की कोशिश होगी, क्योंकि ज्यादातर संवेदनशील इंटरैक्शन देर रात होते हैं।
  • पैरेंटल कंसेंट को तकनीकी रूप से लिंक करना: किसी भी प्लेटफॉर्म पर बच्चे की एंट्री के लिए माता-पिता की डिजिटल सहमति ज़रूरी होगी, जिसे ओटीपी, केवाईसी, या किसी सुरक्षित वेरिफिकेशन सिस्टम से जोड़ा जा सकता है। इससे फर्जी उम्र बताकर अकाउंट बनाने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी।

राज्यों का अलग सुर और एक समान केंद्रीय कानून

राज्य स्तर पर भी चर्चाएं तेज हैं, लेकिन तस्वीर एकसमान नहीं है। आंध्र प्रदेश ने 13 वर्ष से कम और कर्नाटक ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का प्रस्ताव रखा है, ताकि मोबाइल और सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभावों पर अंकुश लगाया जा सके। टेक कंपनियां इस “फेडरेटेड मॉडल” से खासा चिंतित हैं, क्योंकि अलग-अलग राज्यों में अलग उम्र सीमा और अलग नियम लागू होने पर टेक्निकल और रेगुलेटरी अनुपालन बेहद जटिल हो जाएगा। कंपनियों का तर्क है कि ऐसे में बच्चे कड़े नियम वाले राज्यों से निकल कर ढीले नियम वाले ऐप या प्लेटफॉर्म की तरफ भागेंगे, जिससे सुरक्षा का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाएगा।

यही कारण है कि केंद्र सरकार अब एक समान, पूरे देश में लागू होने वाला केंद्रीय कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। मेटा (फेसबुक, इंस्टाग्राम) जैसी बड़ी कंपनियों ने संकेत दिया है कि वे सख्त नियमों का पालन करने को तैयार हैं, बशर्ते वे सभी ऐप्स और वेबसाइट्स पर समान रूप से लागू हों। उद्योग की यह चिंता भी है कि अगर केवल मुख्यधारा प्लेटफॉर्म पर ज्यादा सख्ती होगी और “ग्रे जोन” वाले ऐप्स पर निगरानी कमजोर रही, तो किशोर असुरक्षित और अनियंत्रित इकोसिस्टम की तरफ धकेले जा सकते हैं।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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