
नौकरी करने वालों के लिए ग्रेच्युटी हमेशा से एक बड़ा आर्थिक सुरक्षा कवच रही है। रिटायरमेंट, इस्तीफे या अचानक किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर मिलने वाला यह एकमुश्त भुगतान कर्मचारियों की लंबी सेवा का सम्मान होता है। लेकिन नए लेबर कोड के लागू होने के बाद इसकी पात्रता और गणना के नियमों में ऐसा बदलाव आया है, जिसने लाखों नौकरीपेशा लोगों की उम्मीदें जगा दी हैं।
पहले जहां ग्रेच्युटी पाने के लिए कम से कम 5 साल की लगातार नौकरी जरूरी थी, अब कुछ श्रेणी के कर्मचारियों को सिर्फ 1 साल की सेवा पूरी करने पर ही इसका लाभ मिल सकता है। मगर सवाल यह है कि क्या यह बदलाव सभी पर लागू होता है? और आपकी जेब में कितना फायदा पहुंचेगा? आइए, इसकी गहराई से पड़ताल करते हैं।
ग्रेच्युटी का कानूनी आधार और नए लेबर कोड
ग्रेच्युटी मूल रूप से पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत मिलती है, जो अब चार नए लेबर कोड्स- वेज कोड, इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, सोशल सिक्योरिटी कोड और ओशनिक वर्कर्स कोड- के दायरे में समाहित हो चुका है। सरकार ने इन कोड्स को 21 नवंबर 2025 से प्रभावी घोषित किया, हालांकि पूर्ण रूप से 1 अप्रैल 2026 से लागू माने जा रहे हैं। सबसे चर्चित बदलाव फिक्स्ड-टर्म एम्प्लॉयी (FTE) या कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के लिए है। पहले ये लोग अक्सर 5 साल का आंकड़ा पार नहीं कर पाते थे, क्योंकि उनके कॉन्ट्रैक्ट छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स पर आधारित होते थे।
अब अगर आपका कॉन्ट्रैक्ट 1 साल या इससे अधिक का है और आपने उसे पूरा कर लिया, तो आप प्रो-राटा आधार पर ग्रेच्युटी के हकदार हो जाते हैं। यानी आपकी काम की सटीक अवधि के अनुपात में भुगतान।
स्थायी कर्मचारियों के लिए पुराने नियम बरकरार
लेकिन स्थायी (परमानेंट) कर्मचारियों के लिए नियम जस का तस है। इन्हें अभी भी न्यूनतम 5 साल की निरंतर सेवा पूरी करनी होगी। ध्यान दें, ‘निरंतर सेवा’ का मतलब सिर्फ कैलेंडर ईयर नहीं- अगर किसी साल में 240 दिन (या खदानों/छह-दिन वाली नौकरियों में 190 दिन) काम किया हो, तो उसे पूरा साल माना जाता है।
उदाहरणस्वरूप, 4 साल 9 महीने की सेवा को 5 साल ही गिना जाएगा। मृत्यु या स्थायी अपंगता के केस में यह 5 साल की बाधा कभी लागू ही नहीं होती। इसलिए, अगर आप आईटी सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग या किसी बड़ी कंपनी में परमानेंट हैं, तो आपके लिए कोई जादुई बदलाव नहीं आया। हेडलाइंस में ‘1 साल में ग्रेच्युटी’ चमक रही हैं, लेकिन वास्तविकता कैटेगरी पर निर्भर है।
ग्रेच्युटी गणना में नया फॉर्मूला और वेतन की परिभाषा
अब बात गणना की। फॉर्मूला वही पुराना है: (लास्ट बेसिक सैलरी + डीए) × 15/26 × सेवा के वर्ष। लेकिन लेबर कोड ने ‘वेतन’ की परिभाषा बदल दी। पहले कंपनियां बेसिक को कम रखकर अलाउंस बढ़ा देती थीं, जिससे ग्रेच्युटी कम बैठती। अब वेतन में बेसिक, महंगाई भत्ता (डीए) और रिटेनिंग अलाउंस शामिल होंगे, और कुल CTC का कम से कम 50% इनका हिस्सा होना चाहिए।
नतीजा? बेसिक+डीए बढ़ेगा, ग्रेच्युटी की रकम भी। मान लीजिए आपकी मासिक सैलरी 80,000 रुपये है, बेसिक 35,000। पुराने ढंग से ग्रेच्युटी कम आती, लेकिन नए नियम से बेसिक+डीए को 50% CTC के बराबर adjust करना पड़ेगा, यानी कुल रकम बढ़ेगी। 10 साल की सर्विस पर लाखों का अंतर पड़ सकता है।
टैक्स नियम और जॉब मार्केट पर असर
टैक्स के लिहाज से निजी कर्मचारियों को 20 लाख तक की ग्रेच्युटी टैक्स-फ्री है, सरकारी कर्मचारियों को पूरी। इससे ज्यादा पर पुरानी टैक्स स्लैब लागू। यह बदलाव आज के जॉब मार्केट को ध्यान में रखकर आया है, जहां कॉन्ट्रैक्ट जॉब्स 70% तक पहुंच चुकी हैं। गिग वर्कर्स और प्लेटफॉर्म इकॉनमी (जैसे उबर, जोमैटो) को भी सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत धीरे-धीरे शामिल किया जा रहा है, जिससे भविष्य में इन्हें भी ग्रेच्युटी का रास्ता खुलेगा।
आगे क्या करें और इसका भविष्य
क्या करें? सबसे पहले अपना रोजगार प्रकार चेक करें- परमानेंट, FTE या कॉन्ट्रैक्ट? एचआर से पात्रता कन्फर्म करें, सैलरी स्ट्रक्चर समझें और जॉइनिंग डेट नोट करें। कंपनियों को अब पेमेंट प्लानिंग करनी पड़ेगी, क्योंकि कॉन्ट्रैक्टर्स को जल्दी भुगतान का बोझ बढ़ेगा। कुल मिलाकर, यह सुधार कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स की सुरक्षा बढ़ाएगा, लेकिन परमानेंट कर्मचारियों को इंतजार ही करना पड़ेगा। अगर आप प्रोजेक्ट-बेस्ड जॉब में हैं, तो यह आपके लिए गेम-चेंजर है। बाकी, सतर्क रहें- हेडलाइंस न पढ़ें, फाइनप्रिंट जरूर।









