
खाद्य पदार्थों की कीमतों में लगातार उछाल ने आम आदमी की जेब पर भारी बोझ डाल दिया है। सरसों का तेल, जो उत्तर भारत की रसोई का अभिन्न हिस्सा है, कई शहरों में 200 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच गया है, जबकि दालों के दामों में 10 प्रतिशत से अधिक की वार्षिक बढ़ोतरी ने सब्जी के तड़के को ही महंगा कर दिया। आज जारी ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में सरसों तेल की खुदरा कीमतें 170 से 209 रुपये तक पहुंच चुकी हैं, जो पिछले एक साल में 15-20 प्रतिशत की तेजी दर्शाती हैं।
कीमतों का ताजा अपडेट
यह उछाल केवल सरसों तेल तक सीमित नहीं है। ब्रांडेड पैक में सरसों तेल 180 से 209 रुपये प्रति लीटर बिक रहा है, जबकि खुला या मंडी का तेल 170 से 196 रुपये के दायरे में है। रिफाइंड सोया तेल 155-160 रुपये, सूरजमुखी तेल 178-183 रुपये और पाम ऑयल 142-150 रुपये प्रति लीटर पर उपलब्ध है।
दालों का हाल इससे भी बुरा है, अरहर (तुअर) दाल 122 से 140 रुपये, उड़द दाल 125-130 रुपये, मूंग दाल 110-120 रुपये, चना दाल 80-85 रुपये और मसूर दाल 95-105 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर मिल रही है। ये कीमतें शहर, ब्रांड और बाजार के अनुसार थोड़ी भिन्न हो सकती हैं, लेकिन कुल मिलाकर रसोई का मासिक खर्च 20-30 प्रतिशत बढ़ चुका है।
उपभोक्ताओं पर असर
इस महंगाई का असर खासकर मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है, जहां सरसों तेल सब्जी-परांठे का आधार है और दाल प्रोटीन का प्रमुख स्रोत। दिल्ली के सदर बाजार और लाजपत नगर जैसे थोक बाजारों में व्यापारियों का कहना है कि स्टॉक सीमित होने से कीमतें आसमान छू रही हैं। एक स्थानीय किराना दुकानदार ने बताया, “पिछले दो महीनों में सरसों तेल के थोक दाम 10 प्रतिशत चढ़े हैं, जबकि दालों की सप्लाई चेन में बाधा ने खुदरा भावों को 15 प्रतिशत तक ऊपर धकेल दिया।” जियोमार्ट और ब्लिंकिट जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भी यही ट्रेंड दिख रहा है, जहां डिलीवरी चार्ज के साथ कुल बिल और बढ़ जाता है।
कीमतें बढ़ने के कारण
कीमतें बढ़ने के पीछे कई कारक जिम्मेदार हैं। सबसे बड़ा कारण सप्लाई चेन में आई बाधाएं हैं। रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक व्यापार युद्धों का असर कच्चे खाद्य तेलों पर पड़ा है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर हुआ। भारत अपनी 60 प्रतिशत से अधिक खाना पकाने के तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोया, पाम और सूरजमुखी तेल के दामों में उतार-चढ़ाव भारतीय बाजार को झकझोर रहा है।
सरसों तेल के मामले में घरेलू उत्पादन में कमी ने आग में घी डाला है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कम पैदावार, अनियमित मानसून और जलवायु परिवर्तन ने फसल प्रभावित की है।
दालों की चिंताजनक स्थिति
दालों की स्थिति भी चिंताजनक है। थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के अनुसार, मार्च 2026 में दालों की महंगाई दर 10.73 प्रतिशत रही, जो खुदरा बाजार में और बढ़कर 12-15 प्रतिशत हो गई। अरहर और उड़द जैसे दालों का उत्पादन पिछले साल 5 प्रतिशत घटा, जबकि मांग में 7 प्रतिशत की तेजी आई। व्यापारियों की जमाखोरी और निर्यात बढ़ने से स्टॉक कम हो गया।
सरकार ने जरूरी वस्तुओं पर निर्यात शुल्क लगाया है, लेकिन जमीन पर राहत न के बराबर है। उपभोक्ता मामलों के मंत्री ने संसद में कहा कि प्राइस मॉनिटरिंग सिस्टम के तहत 300 से अधिक बाजारों पर नजर रखी जा रही है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि के उपाय जैसे उत्पादन बढ़ावा और आयात नीति में बदलाव जरूरी हैं।
पोषण और आर्थिक प्रभाव
इस महंगाई ने पोषण पर भी असर डाला है। प्रोटीन युक्त दालों के दाम बढ़ने से कई परिवार सस्ते विकल्पों की ओर मुड़ रहे हैं, जो स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है। दिल्ली के एक गृहिणी ने शिकायत की, “पहले 100 रुपये में दो किलो दाल आ जाती थी, अब वही राशि एक किलो भी मुश्किल से पूरी करती है। सब्जी में तेल कम करना पड़ रहा है।” आर्थिक विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो खुदरा महंगाई दर (CPI) 5 प्रतिशत के पार पहुंच सकती है, जो आरबीआई की नीति पर दबाव डालेगी।
आगे की राह
सरकार को तत्काल स्टॉक सीमित करने और बफर सप्लाई बढ़ाने की जरूरत है। किसानों को सरसों जैसी फसलों के लिए बेहतर एमएसपी और बीमा कवरेज देना होगा। उपभोक्ताओं को सलाह है कि स्थानीय मंडी या ऑनलाइन ऐप्स से कीमतें चेक करें और थोक खरीदारी करें। यह महंगाई का दौर कब खत्म होगा, यह समय बताएगा, लेकिन फिलहाल रसोई का बजट संकट में है।









