
भारत के करोड़ों स्मार्टफोन यूजर्स के लिए बुरी खबर आ सकती है। केंद्र सरकार मोबाइल डेटा उपयोग पर प्रति जीबी आधारित नया ‘डेटा यूसेज टैक्स’ लगाने की दिशा में सोच रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हाल ही में हुई एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई। फिलहाल मोबाइल रिचार्ज पर 18% जीएसटी लगता है, लेकिन यह नया टैक्स उसके ऊपर अतिरिक्त बोझ साबित हो सकता है, जिससे आम आदमी का इंटरनेट बिल महंगा हो जाएगा।
सरकार का कहना है कि यह कदम न केवल राजस्व बढ़ाने का है, बल्कि डिजिटल आदतों को सुधारने का भी। वित्त वर्ष 2025 में भारत की कुल मोबाइल डेटा खपत 229 अरब जीबी के आसपास रही। यदि प्रति जीबी महज 1 रुपये का टैक्स लगाया जाए, तो सरकार को सालाना 22,900 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। इस राशि को 5G/6G नेटवर्क विस्तार, ग्रामीण इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल इंडिया परियोजनाओं में लगाया जा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बोझ उपभोक्ताओं पर डालना उचित है?
स्क्रीन टाइम पर लगाम लगाने का सरकारी प्रयास
प्रस्ताव के पीछे एक प्रमुख उद्देश्य युवाओं और बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम काबू करना है। सरकार का तर्क है कि अनावश्यक सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग और ‘डिजिटल स्मोकिंग’ जैसी लत को कम करने के लिए डेटा पर टैक्स प्रभावी होगा। दूरसंचार विभाग (DoT) को सितंबर 2026 तक इसकी तकनीकी व्यवहार्यता, आर्थिक प्रभाव और लागू करने के तरीकों पर विस्तृत रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया है। यदि लागू हुआ, तो टेलीकॉम कंपनियां यूजर्स के डेटा कंजम्पशन को ट्रैक कर टैक्स वसूलेंगी, जो नेट न्यूट्रलिटी के सिद्धांतों को चुनौती दे सकता है।
एक्सपर्ट्स इसे जोखिम भरा बता रहे हैं। TRAI के पूर्व प्रधान सलाहकार सत्या एन. गुप्ता ने चेतावनी दी है कि डेटा टैक्स लागू करना न सिर्फ जटिल है, बल्कि डिजिटल इनोवेशन को ठप कर सकता है। भारत जैसे विकासशील डिजिटल इकोनॉमी में यह स्टार्टअप्स, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन शिक्षा को नुकसान पहुंचाएगा। तंजानिया, युगांडा जैसे देशों में इसी तरह के टैक्स विवादास्पद साबित हुए, जहां यूजर बगावत कर चुके हैं।
जेब पर क्या पड़ेगा असर?
मान लीजिए आपका मासिक डेटा उपयोग 60 जीबी (2 जीबी/दिन) है। 1 रुपये/जीबी टैक्स से बिल में 60 रुपये अतिरिक्त जुड़ेंगे। 90 जीबी उपयोग वाले के लिए यह 90 रुपये मासिक बोझ बनेगा। लो-इनकम परिवार, छात्र और ग्रामीण यूजर्स सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, जहां सस्ता डेटा डिजिटल क्रांति का आधार रहा है। टेक इंडस्ट्री में हलचल मच गई है; टेलीकॉम कंपनियां पहले ही महंगे स्पेक्ट्रम और लाइसेंस फीस से जूझ रही हैं।
आगे की राह
DoT की रिपोर्ट के बाद ही फैसला होगा। यदि लागू हुआ, तो slab-वाइज टैक्स (जैसे हाई-यूजर्स पर ज्यादा) या छूट (एजुकेशनल डेटा पर) जैसे बदलाव संभव हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा 18% जीएसटी ही काफी है; नया टैक्स डिजिटल इंडिया की भावना के खिलाफ जाएगा। फिलहाल यह प्रस्ताविक चरण में है – उपभोक्ता संगठन विरोध की तैयारी कर रहे हैं। क्या सरकार राजस्व और डिजिटल स्वास्थ्य के बीच संतुलन बना पाएगी? समय बताएगा।









