
दुनियाभर की टेक दुनिया में एक बार फिर छंटनी की सियासी थर रही है। दो दिग्गज कंपनियां- Meta Platforms और Microsoft – अपने खर्चों को कम करने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर भारी निवेश को संतुलित करने के नाम पर बड़े फैसले ले रही हैं, जिससे करीब 23,000 कर्मचारियों की नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।
दोनों कंपनियां यह साफता से दिखा रही हैं कि अब टेक बिज़नेस का फोकस “कम लागत, ज्यादा दक्षता” और “AI‑आधारित ऑटोमेशन” की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसका परिणाम सीधे कर्मचारियों की सुरक्षा और नौकरी‑स्थिरता पर पड़ रहा है।
Meta: 8,000 नौकरियों पर गरज
फेसबुक और इंस्टाग्राम की पैरेंट कंपनी Meta ने अपने कर्मचारियों को एक इंटरनल नोट के ज़रिए बताया कि कंपनी अपनी वर्कफोर्स का करीब 10 प्रतिशत, यानी लगभग 8,000 कर्मचारियों की छंटनी करेगी। यह पहला दौर 20 मई 2026 से शुरू होने की उम्मीद है, लेकिन कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक अगले महीनों में कुल प्रभावित कर्मचारियों की संख्या 16,000 तक जा सकती है।
इसके अलावा कंपनी ने यह भी साफ किया है कि करीब 6,000 खाली पदों को भी अब नहीं भरा जाएगा, जिससे वास्तविक रूप से कर्मचारियों की कुल संख्या और भी कम होगी। Meta का तर्क है कि यह कदम कंपनी को ज़्यादा फोकस्ड, फ्लेक्सिबल और AI‑फ्रेंडली बनाने के लिए उठाया जा रहा है, ताकि वह विज्ञापन राजस्व में उतार‑चढ़ाव और मेटावर्स पर चल रहे भारी निवेश के बीच भी अपने बैलेंस शीट पर कंट्रोल बनाए रख सके।
इधर, इस छंटनी के पीछे एक और बड़ी वजह यह भी है कि Meta, जैसी बड़ी सोशल‑मीडिया कंपनी, अब एआई‑बेस्ड कंटेंट रिकमेंडेशन, एड‑टार्गेटिंग, ऑटोमेटेड मॉडरेशन और नए प्रोडक्ट्स जैसे “AI असिस्टेंट” पर भारी पैसा लगा रही है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन टूल्स के चलते कई रिपीटेटिव टास्क जैसे डेटा लेबलिंग, बेसिक कंटेंट मॉडरेशन और कुछ एड‑ऑपरेशन अब मशीनों के हिस्से में जा रहे हैं, जिससे मानव‑संसाधन पर दबाव बढ़ रहा है।
Microsoft: 8,750 कर्मचारियों को वॉलंटरी बायआउट
दूसरी तरफ Microsoft ने एक अलग रास्ता चुना है: बड़े पैमाने पर वॉलंटरी बायआउट प्रोग्राम। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी ने अपने अमेरिकी कर्मचारियों के लिए ऐसा ऑफर शुरू किया है, जिससे लगभग 7 प्रतिशत, यानी 8,750 कर्मचारी इस योजना के तहत नौकरी छोड़ सकते हैं। सूत्रों के अनुसार यह Microsoft के इतिहास में इस तरह का सबसे बड़ा बायआउट‑स्टाइल कदम माना जा रहा है।
हालांकि ऑफर स्वैच्छिक है, लेकिन कंपनी का लक्ष्य साफ है: बढ़ते AI और क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर के खर्चों को नियंत्रित करना। Microsoft ने दुनियाभर में नए डेटा सेंटर बनाने की योजना बनाई है, साथ ही जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में बड़े AI‑इन्वेस्टमेंट का ऐलान किया है, जिससे सालाना बिलियन डॉलर की अतिरिक्त लागत जुड़ रही है। इसी बीच कंपनी अपने ट्रेडिशनल टीमों, लेगेसी प्रोडक्ट‑लाइन और कुछ सपोर्ट यूनिट्स पर नकेल कस रही है, जिससे बायआउट या छंटनी के ज़रिए वह लागत कल्ट कर रही है।
AI‑रेस और लागत‑कट का दबाव
दोनों कंपनियों के इन फैसलों के पीछे सबसे बड़ी वजह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दौड़ है। टेक इंडस्ट्री अब ऐसे दौर में खड़ी है जब बड़ी कंपनियां AI‑मॉडल्स, डेटा सेंटर, चिप्स और सॉफ्टवेयर‑प्लेटफॉर्म पर बिलियन डॉलर साल खर्च कर रही हैं, लेकिन इसकी तुरंत वापसी अभी बड़े पैमाने पर दिख नहीं रही। इसी दबाव के बीच बोर्ड और निवेशक चाहते हैं कि वही पैसा ज़्यादा दक्ष और स्केलेबल वर्कफोर्स पर लगे, न कि बड़े और “स्लो” ऑर्गनाइज़ेशन स्ट्रक्चर पर।
इसी तर्क से न सिर्फ Meta और Microsoft बल्कि अमेज़न, गूगल, और अन्य टेक जगत कंपनियां एक‑एक कर अपने वर्कफोर्स को टाइट कर रही हैं। कई फर्में रिपीटेटिव या लो‑वैल्यू काम को एआई टूल्स से ऑटोमेट कर रही हैं, जिससे वही टीम अब ज़्यादा प्रोडक्टिव हो रही है, लेकिन नौकरियों की संख्या घट रही है। एक्सपर्ट्स का डर यह है कि आने वाले एक‑दो साल में यह ट्रेंड और तेज़ हो सकता है, खासकर बीपीओ, कस्टमर सपोर्ट, डेटा एंट्री और कुछ डेवलपर रोल्स में।
भारतीय टेक वर्कर्स पर क्या असर?
भारतीय टेक सेक्टर‑विशेषकर बड़ी इंडियन आईटी फर्म्स और प्रोडक्ट‑कंपनियां भी इस ग्लोबल ट्रेंड पर नज़र बनाए हुए हैं। हाल के महीनों में घरेलू स्टार्टअप्स ने भी एआई और लागत‑कट के नाम पर छंटनी की है, ताकि वे नए टेक इन्वेस्टमेंट के लिए खुद को रीशैप कर सकें।
इसका मतलब यह है कि भारत में भी आने वाला समय उन लोगों के लिए खतरनाक हो सकता है जो सिर्फ पुराने, रिपीटेटिव रोल्स में अटके रहते हैं। उधर, जो लोग AI टूल्स के साथ-साथ प्रोग्रामिंग, डेटा साइंस, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी और प्रोडक्ट‑मैनेजमेंट जैसे उच्च‑वैल्यू स्किल्स पर काम कर रहे हैं, उनके लिए यह दौर एक तरह से नए अवसर का भी है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब टेक जॉब मार्केट में स्किल‑अपग्रेड ही वह कोर फैक्टर है, जिस पर नौकरी‑सुरक्षा और भविष्य निर्भर करेगा।





