
भारत की रसोई में दशकों से LPG यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस भरोसेमंद ईंधन रही है, लेकिन अब एक नया विकल्प चर्चा में है- DME यानी डाइमिथाइल ईथर। वैज्ञानिकों और ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक यह न सिर्फ LPG का संभावित विकल्प बन सकता है, बल्कि भारत की आयात निर्भरता घटाने और रसोई ईंधन को ज्यादा साफ बनाने में भी अहम भूमिका निभा सकता है.
DME क्या है
DME एक सिंथेटिक ईंधन है, जिसे LPG की तरह सिलेंडर में भरकर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह मेथनॉल, कोयला, बायोमास, कृषि अवशेष, कचरे और यहां तक कि औद्योगिक उत्सर्जन जैसे घरेलू संसाधनों से तैयार किया जा सकता है.
यही वजह है कि इसे “मेक इन इंडिया” फ्यूल के रूप में देखा जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार CSIR-NCL पुणे और अन्य वैज्ञानिक संस्थान इस दिशा में काम कर रहे हैं ताकि DME को घरेलू कुकिंग फ्यूल के रूप में व्यवहारिक बनाया जा सके.
LPG से कितना अलग
तकनीकी तौर पर DME का व्यवहार LPG से काफी मिलता-जुलता है, इसलिए इसे रसोई में अपनाना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है। कई रिपोर्टों में कहा गया है कि मौजूदा स्टोव, रेगुलेटर और सिलेंडर सिस्टम के साथ इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, यानी शुरुआती चरण में बड़े बदलाव की जरूरत नहीं पड़ेगी. इसी वजह से विशेषज्ञ इसे “drop-in” या “near drop-in” विकल्प के रूप में भी देख रहे हैं। हालांकि, पूर्ण प्रतिस्थापन से पहले ब्लेंडिंग, सुरक्षा मानक और आपूर्ति ढांचे पर और काम होना बाकी है.
साफ-सुथरी जलन
DME की सबसे बड़ी ताकत इसकी क्लीन-बर्निंग प्रकृति है। यह जलने पर बहुत कम कालिख, धुआं और प्रदूषक छोड़ता है, जिससे रसोई की हवा बेहतर रह सकती है और बर्तनों पर काली परत जमने की समस्या भी कम हो सकती है.
पर्यावरण के लिहाज से भी यह फायदेमंद माना जा रहा है, क्योंकि इसे waste-to-fuel या biomass-to-fuel मॉडल में विकसित किया जा सकता है. यानी यह सिर्फ एक cooking fuel नहीं, बल्कि broader clean energy transition का हिस्सा बन सकता है.
भारत के लिए महत्व
भारत अपनी LPG जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, जिससे कीमतों और आपूर्ति दोनों पर बाहरी दबाव बना रहता है. DME का घरेलू उत्पादन बढ़ा तो यह निर्भरता घट सकती है और विदेशी मुद्रा की बचत भी संभव है. कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि LPG में लगभग 8% DME blending से सालाना करीब ₹9,500 करोड़ तक की बचत का अनुमान है, हालांकि यह अभी प्रारंभिक आकलन है और बड़े पैमाने की व्यावहारिक सफलता पर निर्भर करेगा.
अपनाने की राह
अभी सबसे व्यावहारिक मॉडल DME को LPG के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने का माना जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक BIS ने लगभग 20% तक DME blending के लिए मानक तय किए हैं, जो इस तकनीक को नियामकीय स्तर पर आगे बढ़ाने का संकेत है. शुरुआत में यह मॉडल ज्यादा व्यवहारिक हो सकता है, क्योंकि इससे घरों को नए चूल्हे या नए सिलेंडर पर तुरंत शिफ्ट नहीं करना पड़ेगा. लेकिन बड़े पैमाने पर सफलता के लिए उत्पादन लागत, सप्लाई चेन, सुरक्षा परीक्षण और उपभोक्ता भरोसा – इन चारों मोर्चों पर काम जरूरी होगा.
चुनौतियां भी कम नहीं
DME को लेकर उत्साह जरूर है, लेकिन इसे LPG का सीधा और तुरंत विकल्प मान लेना जल्दबाजी होगी। इसकी ऊर्जा घनता LPG से कम बताई जाती है, इसलिए समान उपयोग के लिए मात्रा और सिस्टम-ट्यूनिंग पर ध्यान देना होगा. इसके अलावा, commercial scale पर उत्पादन, फीडस्टॉक की स्थिर उपलब्धता और खुदरा कीमत पर इसका असर अभी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है. इसलिए यह तकनीक promising जरूर है, लेकिन इसकी सफलता प्रयोगशाला से निकलकर लाखों घरों तक पहुंचने की क्षमता पर निर्भर करेगी.









