
गोवा सरकार ने किरायेदारों के पुलिस सत्यापन को अब सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि सख्त कानूनी अनिवार्यता बना दिया है। नए नियम साफ संदेश देते हैं – अगर मकान मालिक ने किरायेदार का रिकॉर्ड ठीक से नहीं रखा और पुलिस को जानकारी नहीं दी, तो उसे जेल और जुर्माना दोनों झेलने पड़ सकते हैं।
क्या बदला है: नया कानून और नियम
दिसंबर 2024 से गोवा (किरायेदारों का सत्यापन) अधिनियम, 2024 लागू है, जिसका उद्देश्य उन सभी घरों और लॉजिंग सुविधाओं में रहने वाले लोगों को रेगुलेट करना है जो किराए पर तो दिए जाते हैं, लेकिन गोवा पर्यटन व्यापार पंजीकरण अधिनियम, 1982 के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं। यानी होम‑स्टे, लेफ्ट‑आउट रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी, छोटे लॉजिंग हाउस, जहां बिना किसी औपचारिक रजिस्ट्रेशन के लोग रह रहे हैं, अब सीधे इस कानून के दायरे में आ जाते हैं। यह अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि हर ऐसे परिसर के मालिक के लिए किरायेदारों का रिकॉर्ड रखना और उनका सत्यापन कराना अनिवार्य होगा, ताकि राज्य में सुरक्षा, कानून‑व्यवस्था और सार्वजनिक शांति को मजबूत किया जा सके।
अब 2026 में गोवा सरकार ने इस अधिनियम को लागू करने के लिए गोवा (किरायेदारों का सत्यापन) नियम, 2026 को मंजूरी दे दी है। इन नियमों ने पहली बार विस्तार से यह तय कर दिया है कि मकान मालिक को किरायेदारों की पहचान कैसे जांचनी है, क्या‑क्या रिकॉर्ड रखना है और कितने समय के भीतर पुलिस को जानकारी देनी है। नियमों के अनुसार, मकान मालिक अगर इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं करता, तो उस पर छह महीने तक की जेल और 10,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान होगा।
मकान मालिक के लिए नई कानूनी जिम्मेदारियां
नए नियमों के तहत मकान मालिक को सबसे पहले किरायेदार की पहचान का सत्यापन करना होगा। इसके लिए उसे किरायेदार से वोटर आईडी, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट या अन्य निर्धारित फोटो आईडी जैसे दस्तावेज लेने और उन्हें ध्यान से जांचने की जिम्मेदारी दी गई है। दस्तावेज सिर्फ देख भर लेना काफी नहीं होगा, मकान मालिक को उनकी फोटोकॉपी लेकर अपने पास रखना और आगे की प्रक्रिया में इन्हें संलग्न करना जरूरी होगा।
दूसरी बड़ी जिम्मेदारी है रिकॉर्ड‑कीपिंग। नियम साफ कहते हैं कि मकान मालिक को अपने परिसर में रहने वाले हर किरायेदार का विवरण एक रजिस्टर या किताब में रखना होगा – इसमें नाम, पता, मोबाइल नंबर, पहचान पत्र का विवरण, रहने की अवधि, किराये की शर्तें जैसी जानकारी शामिल होगी। यह रजिस्टर सिर्फ औपचारिकता नहीं है; भविष्य में किसी भी जांच या निरीक्षण के समय यही सबसे बड़ा सबूत होगा कि मकान मालिक ने कानून का पालन किया।
पाँच दिन की समय सीमा और डिजिटल विकल्प
गोवा (किरायेदारों का सत्यापन) नियम, 2026 में सबसे अहम प्रावधान समय सीमा का है। मकान मालिक को किरायेदार के प्रवेश के बाद पांच दिनों के भीतर संबंधित पुलिस थाने में किरायेदार का पूरा विवरण जमा करना होगा। यह विवरण एक नियत फॉर्म में दिया जाएगा, जिसके साथ जांचे गए पहचान दस्तावेजों की फोटोकॉपी भी लगानी होगी। अगर मकान मालिक चाहें, तो यह जानकारी थाने में खुद जाकर भौतिक रूप से जमा कर सकते हैं, या फिर डिजिटल माध्यम से भेज सकते हैं- जैसे सरकार द्वारा निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल या डिजिटल प्लेटफॉर्म।
डिजिटल सबमिशन के मामले में सरकार ने शुल्क का प्रावधान भी रखा है। यानी अगर मालिक ऑनलाइन माध्यम से डेटा जमा करता है, तो उसे निर्धारित फीस देनी होगी। आवेदन जमा होने के बाद पुलिस स्टेशन की तरफ से मकान मालिक को रसीद दी जाएगी, जो भविष्य के लिए प्रूफ का काम करेगी कि उसने निर्धारित समय में जानकारी दे दी थी। यही रसीद बाद में किसी भी विवाद या जांच में मकान मालिक की सुरक्षा ढाल बन सकती है।
जांच, निरीक्षण और पुलिस की भूमिका
नियमों के तहत गोवा पुलिस पर भी बड़ी जिम्मेदारी डाली गई है। किरायेदार सत्यापन प्रक्रिया के तहत किए गए निरीक्षणों का पूरा रिकॉर्ड रखना पुलिस की ड्यूटी होगी, ताकि किसी भी घटना या संदिग्ध गतिविधि की जांच में तुरंत पता लगाया जा सके कि कौन, कब और किस परिसर में रह चुका है।
निरीक्षण के अधिकार के लिए नियमों में साफ कहा गया है कि हेड कांस्टेबल से कम रैंक का कोई पुलिस अधिकारी, जिसके अधिकार क्षेत्र में वह इलाका आता है, या कोई अन्य अधिकारी जिसे सरकार ने आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना के जरिए अधिकृत किया हो, वह कभी भी मकान मालिक द्वारा बनाए गए रिकॉर्ड की जांच कर सकता है। यानी रजिस्टर और दस्तावेज सिर्फ अलमारी में रखने के लिए नहीं, बल्कि किसी भी समय सत्यापन के लिए तैयार रखने होंगे।
छह महीने की जेल और 10,000 रुपये जुर्माना
अगर मकान मालिक किरायेदारों के रिकॉर्ड नहीं रखते, पहचान दस्तावेजों की जांच नहीं करते या पांच दिन के भीतर पुलिस थाने में जानकारी जमा करने में नाकाम रहते हैं, तो यह कानून का उल्लंघन माना जाएगा। ऐसे मामले में नए नियमों के तहत उन्हें छह महीने तक की जेल की सजा और 10,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। यह सजा अधिकतम सीमा है, यानी केस‑टू‑केस आधार पर अधिकारी जुर्माने की रकम और कार्रवाई तय कर सकते हैं, लेकिन संदेश साफ है- किरायेदार सत्यापन को हल्के में लेना अब महंगा पड़ेगा।









