
क्या आपने कभी कल्पना की है कि एक शहर में लाखों कोचिंग स्टूडेंट्स, भारी वाहनों की भीड़ और फिर भी कोई रेड लाइट न हो? राजस्थान का कोटा ऐसा ही चमत्कारिक शहर बन चुका है। चंबल नदी के किनारे बसा यह शहर, जो कोचिंग हब के नाम से मशहूर है, अब दुनिया का दूसरा ट्रैफिक सिग्नल-फ्री शहर है- पहला है भूटान की राजधानी थिम्पू। यहां गोल चक्कर, फ्लाईओवर, अंडरपास और चौड़ी सड़कों ने ट्रैफिक को इतना सुगम बना दिया है कि जाम लगना नामुमकिन सा हो गया।
यह मॉडल न सिर्फ कोटा के निवासियों की जिंदगी आसान कर रहा है, बल्कि पूरे देश के लिए एक नया उदाहरण पेश कर रहा है। आइए, इस ट्रैफिक क्रांति की गहराई में उतरें।
जाम से सिग्नल-फ्री तक का सफर
कोटा कभी ट्रैफिक जाम का शिकार था। हर चौराहे पर रेड लाइट से घंटों फंसना आम बात थी। लेकिन कोटा डेवलपमेंट अथॉरिटी (यूआईटी) ने 700 करोड़ रुपये की महायोजना बनाई। सड़कों को चौड़ा किया, छोटे-छोटे डायवर्जन बनाए और रूट्स ऐसे डिजाइन किए कि सिग्नल की जरूरत ही न पड़े।
2022 तक शहर के मुख्य 15 किलोमीटर रास्ते पूरी तरह सिग्नल-मुक्त हो गए। प्रमुख प्रोजेक्ट्स में शामिल हैं- सिटी मॉल फ्लाईओवर (650 मीटर, 47 करोड़), गोबरिया बावड़ी अंडरपास (30 करोड़), कोटड़ी चौराहा एलिवेटेड रोड (5 करोड़), अंटाघर, एरोड्रम और कोटडी फ्लाईओवर। कुल 24 से ज्यादा फ्लाईओवर-अंडरपास बने। रिंग रोड ने शहर के बाहर ट्रैफिक डायवर्ट किया। पूर्व मंत्री शांति धारीवाल के विजन ने थिम्पू मॉडल को अपनाया। मैपिंग के बाद चौराहों पर ग्रेड-सेपरेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर यानी ऊपरी-नीचे के रास्ते बनाए गए। अब वाहन बिना रुके बहते रहते हैं।
ट्रैफिक कैसे चलता है बिना सिग्नल के?
कोटा का सिस्टम ‘फ्लो-बेस्ड’ है। गोल चक्कर (राउंडअबाउट) हर जगह हैं, जहां गाड़ियां पूरी तरह न रुककर दिशा बदल लेती हैं। ड्राइवर आदी हो चुके हैं- हॉर्न कम, रैश ड्राइविंग न के बराबर। पीक आवर्स में ट्रैफिक पुलिस मुख्य स्पॉट्स पर सहयोग करती है, लेकिन ज्यादातर समय स्व-नियमित प्रवाह।
साइनबोर्ड, लेन मार्किंग और वन-वे सिस्टम स्पष्ट हैं। पैदल यात्रियों के लिए स्वयंसेवक और पुलिस। परिणाम? दुर्घटनाएं घटीं, यात्रा समय 30-40% कम हुआ। उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने ट्वीट कर सराहना की- “क्या पूरे शहर में लागू हो सकता है?”
| प्रमुख फ्लाईओवर/अंडरपास | लागत (करोड़ रुपये) | लाभ |
|---|---|---|
| सिटी मॉल फ्लाईओवर | 47 | रेलवे स्टेशन से मुख्य मार्ग सुगम |
| गोबरिया बावड़ी अंडरपास | 30 | भारी ट्रैफिक डायवर्जन |
| कोटड़ी एलिवेटेड रोड | 5 | चौराहा जाम मुक्ति |
| अंटाघर/एरोड्रम | विविध | कोचिंग एरिया कनेक्टिविटी |
कोटा वासियों को क्या फायदा?
लाखों स्टूडेंट्स समय पर क्लास पहुंचते हैं, ईंधन बचता है, प्रदूषण कम। व्यापारी खुश- डिलीवरी तेज। ट्रैफिक पुलिस को राहत, सिर्फ सिक्योरिटी पर फोकस। शहरवासी इसे ‘विकास का विजन’ कहते हैं। हालांकि, कुछ जगहों पर चौड़ीकरण जारी है। कोटा की आबादी 12 लाख+, वाहन 8 लाख से ज्यादा, फिर भी फ्लो स्मूथ। यह साबित करता है- स्मार्ट प्लानिंग से बड़े शहरों में भी संभव।
अन्य शहरों के लिए सबक
कोटा मॉडल हर जगह कॉपी नहीं हो सकता। दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में जगह की कमी है। लेकिन सबक साफ- चौड़ी सड़कें, रिंग रोड, अनुशासन और रखरखाव। निरंतर मॉनिटरिंग जरूरी, वरना जाम लौट सकता है। देशभर में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।
कोटा अब न सिर्फ कोचिंग, बल्कि ट्रैफिक मैनेजमेंट का ग्लोबल एग्जांपल है। यह साबित करता है कि भारतीय शहर स्मार्ट हो सकते हैं- बस विजन और एक्शन चाहिए।









