
घर खरीदने के लिए होम लोन लेना आज आम बात है, लेकिन जमीन यानी प्लॉट खरीदने को लेकर ज्यादातर उधारकर्ता उलझे रहते हैं। क्या सिर्फ जमीन खरीदने के लिए भी बैंक लोन देते हैं? जवाब है- हां, ऐसा संभव है, लेकिन इसके नियम होम लोन से अलग, थोड़े सख्त और काफी हद तक जोखिम‑केंद्रित होते हैं। इन्हें प्लॉट लोन या लैंड लोन के नाम से जाना जाता है, जो उस जमीन के लिए मिलता है जिस पर आगे चलकर रहने के लिए घर बनाया जाना हो, न कि सिर्फ निवेश के लिए खाली पड़ी रहे।
प्लॉट लोन क्या होता है?
प्लॉट लोन या लैंड लोन का मतलब है कि बैंक या हाउसिंग फाइनेंस कंपनी आपको जमीन खरीदने के लिए भागत‑सा रकम दे दे, और उस जमीन का टाइटल रजिस्टर में बैंक के नाम पर रख लिया जाए। बैंक यह मानकर लोन देता है कि यह जमीन रिहायशी प्रयोजन के लिए उपयोग की जाएगी और यहां घर बनेगा, न कि सिर्फ बाद में बेचकर मुनाफा कमाने के लिए रखी जाएगी। यही वजह है कि कई बैंक ऐसी शर्त लगाते हैं कि जमीन खरीदने के 2 से 5 साल के भीतर उस पर कंस्ट्रक्शन शुरू कर दी जाए, या पूरा घर तैयार हो जाए।
किन जमीनों पर लोन मिलता है?
हर तरह की जमीन पर बैंक लोन नहीं देते। आमतौर पर सिर्फ रिहायशी प्लॉट पर ही लोन मिलता है, जो नगर निगम, डेवलपमेंट ऑथोरिटी या रजिस्टर्ड बिल्डर‑सर्टिफाइड सोसाइटी से मंजूरशुदा हो, वैध लेआउट और ज़मीन की खसरा‑खतौनी में रिहायशी स्टेटस क्लियर हो और जहां घर बनाना कानूनी रूप से मुमकिना हो। इसके बाद बैंक जमीन का टाइटल‑वेरिफिकेशन, नो‑ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट (NOC), सर्वे नंबर, रजिस्ट्री और विकास प्राधिकरण की मंजूरी जैसे दस्तावेजों की जांच करते हैं।
वहीं, खेती वाली जमीन, गांव की गैर‑रिहायशी ज़मीन, अनमंजूरी वाली या ब्लैकमार्केट कॉलोनियां, विवादित जमीन या ऐसी रिकॉर्डी जमीन जहां बनावटी दस्तावेज की आशंका हो, उन पर बैंक लोन देने से बचते हैं। इसी तरह अगर आप सिर्फ निवेश के लिए जमीन खरीदना चाहते हैं और घर बनाने का कोई प्लान नहीं है, तो बैंक आमतौर पर प्लॉट लोन देने में हिचकिचाते हैं, क्योंकि उनकी नज़र में यह जोखिम भरा होता है।
प्लॉट लोन की पात्रता और डॉक्यूमेंट
लैंड लोन के लिए योग्यता मूल रूप से उसी तरह की होती है जैसी होम लोन की- आयु आमतौर पर 18-65 वर्ष के बीच, निवासी भारतीय स्टेटस, स्थिर आय साबित करना और क्रेडिट स्कोर 700+ (जितना ऊपर उतना बेहतर)। वेतनभोगी लोगों को 1-2 साल का नियमित नौकरी रिकॉर्ड, तीन–छह महीने की सैलरी स्लिप, बैंक स्टेटमेंट और फॉर्म‑16 चाहिए होता है, जबकि स्व‑रोज़गार वालों को दो–तीन साल का ITR, बैलेंस‑शीट, प्रॉफिट‑एंड‑लॉस और करंट अकाउंट स्टेटमेंट जैसे वित्तीय डॉक्यूमेंट देने पड़ते हैं।
कुछ बैंक अपने स्टेप्स में यह भी देखते हैं कि आपके पास कितना डाउन पेमेंट तैयार है, वर्तमान लोन और EMI कितनी है, घर वालों की पर्सनल गारंटी या किसी को‑बॉरोअर की ज़रूरत पड़ सकती है। इसके बाद जमीन के कागजों की फुल वेरिफिकेशन की जाती है- खसरा‑खतौनी, रजिस्ट्री डीड, अलोटमेंट/सेल लेटर, नक्शा, विकास प्राधिकरण की नो‑ओब्जेक्शन, और कोई विवादी केस या लाइन‑सीज़ुअर जैसी चीज़ें।
लोन की रकम, ब्याज दर और EMI का दबाव
होम लोन के मुकाबले प्लॉट लोन में बैंक आम तौर पर कम हिस्सा फाइनेंस करते हैं। सामान्य तौर पर जमीन की मार्केट वैल्यू का 60-70% ही लोन के तौर पर दिया जाता है, यानी अगर आप 50 लाख का प्लॉट खरीद रहे हैं तो बैंक करीब 25-35 लाख तक ही देगा और बाकी रकम आपको अपने पैसे या फैमिली हेल्प से जुटानी होगी। यही वजह है कि प्लॉट लोन में डाउन पेमेंट ज्यादातर मामलों में काफी ज्यादा होता है, जो कई युवा खरीदारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।
ब्याज के मामले में भी प्लॉट लोन थोड़ा महंगा होता है। जहां होम लोन आमतौर पर 8-9% के आस‑पास मिल सकता है, वहीं प्लॉट लोन अक्सर 8.5–10% या उससे थोड़ा ऊपर तक रह सकता है, यह आपके स्कोर, आय और जमीन की लोकेशन पर निर्भर करता है। इसके अलावा अवधि भी अलग है-होम लोन आमतौर पर 20–25 साल के लिए मिल जाता है, जबकि प्लॉट लोन की अवधि आमतौर पर 10–15 साल तक ही रहती है, क्योंकि बैंक चाहता है कि आप जल्दी‑से‑जल्दी घर बना लें। इसका सीधा असर यह होता है कि यहां भी ब्याज थोड़ा ज्यादा और समय कम होने की वजह से EMI उतने ही लोन पर भी होम लोन की तुलना में ज्यादा भारी लगती है।
घर बनाना जरूरी है या नहीं?
ज्यादातर बैंक और वित्तीय संस्थान यह मानकर ही प्लॉट लोन देते हैं कि आप उस पर घर बनाएंगे। SBI, LIC Housing, कई NBFC और सरकारी बैंक खुलकर शर्त लगाते हैं कि जमीन खरीदने के निर्धारित समय (आमतौर पर 2–5 साल) के भीतर कंस्ट्रक्शन शुरू हो जाए और बैंक को इसका प्रूफ भी चाहिए। अगर आप जमीन खरीदकर सिर्फ निवेश के लिए रखना चाहते हैं या बस “होल्ड” करना चाहते हैं, तो बैंक लोन देने में ज्यादा सख्ती बरत सकते हैं या फिर इनकार भी कर सकते हैं।





