
हांगकांग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत नया नियम लागू होते ही यात्रियों और आम लोगों में प्राइवेसी को लेकर हड़कंप मच गया है। अब पुलिस बिना कोर्ट के आदेश के किसी संदिग्ध से फोन या लैपटॉप का पासवर्ड मांग सकती है। इनकार करने पर एक साल तक की जेल और 1 लाख हांगकांग डॉलर (करीब 10.3 लाख रुपये) का जुर्माना लग सकता है। गलत जानकारी देने पर सजा और सख्त- तीन साल जेल व 5 लाख डॉलर तक जुर्माना।
पुलिस को बिना वारंट मिली खतरनाक ताकत
यह नियम 23 मार्च 2026 से प्रभावी है, जो 2020 के बीजिंग द्वारा थोपे नेशनल सिक्योरिटी लॉ (NSL) का हिस्सा है। पुलिस को शक हो कि डिवाइस में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे’ के सबूत हैं, तो तुरंत पासवर्ड, डिक्रिप्शन की या अन्य एक्सेस डिमांड कर सकती है। कस्टम अधिकारी भी ‘देश-विरोधी सामान’ जब्त कर सकते हैं, बिना गिरफ्तारी के। यूके की कानूनी विशेषज्ञ उरानिया चिउ इसे ‘असंतुलित और अतिरिक्त’ शक्ति बताती हैं, जो निष्पक्ष सुनवाई व प्राइवेसी अधिकारों का उल्लंघन करता है।
सरकार का बचाव, आलोचकों का विरोध
हांगकांग सरकार दावा करती है कि यह आम नागरिकों या व्यवसायों पर लागू नहीं होगा, बल्कि सुरक्षा मजबूत करने का कदम है। लेकिन सिविल राइट्स एक्टिविस्ट इसे स्वतंत्रता पर हमला मानते हैं। 2019 के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों के बाद लागू NSL ने अब तक 386 गिरफ्तारियां कीं, 176 को सजा। हालिया उदाहरण है मीडिया baron जिमी लाई को 20 साल की कैद। पश्चिमी देश व ह्यूमन राइट्स संगठन इसे लोकतंत्र विरोधी बता रहे हैं।
यात्रियों के लिए बड़ा खतरा
भारतीय पर्यटकों के लिए यह चेतावनी है। हांगकांग जाने वाले सतर्क रहें- डिवाइस लॉक रखें, संवेदनशील डेटा डिलीट करें। ऑस्ट्रेलियाई स्मार्टट्रैवलर जैसी एजेंसियां चेतावनी दे रही हैं कि कस्टम चेक में डिजिटल डिवाइस स्कैन बढ़ सकता है। भारत से सालाना लाखों यात्री जाते हैं; अब प्राइवेसी रिस्क बढ़ा। विशेषज्ञ सलाह देते हैं: ट्रैवल से पहले डेटा बैकअप लें, वीपीएन यूज करें, लेकिन कानून का पालन करें।
भारत से तुलना: उलट स्थिति
जबकि हांगकांग प्राइवेसी सिकोड़ रहा, भारत में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- आरोपी को फोन पासवर्ड जबरन नहीं मांग सकते (अनुच्छेद 20(3))। BNSS में जब्ती तो संभव, लेकिन अनिवार्य नहीं। हांगकांग का केस डिजिटल युग में वैश्विक बहस छेड़ रहा।









