
आज के डिजिटल दौर में QR कोड हर जगह दिखाई देता है। भारत में UPI पेमेंट्स से लेकर वेबसाइट लिंक खोलने, रेस्टोरेंट में मेन्यू देखने और आधार वेरिफिकेशन तक- फल बेचने वाले ठेले से महंगे शॉपिंग मॉल तक हर कोने पर ये काला-सफेद ग्रिड चिपका नजर आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस छोटे से कोड ने दुनिया को कितना आसान बना दिया? इसका श्रेय जाता है जापानी इंजीनियर मसाहिरो हारा को, जिन्होंने 1994 में इसे आविष्कार किया।
QR कोड की शुरुआत
एक पारंपरिक जापानी बोर्ड गेम ‘गो’ खेलते हुए हारा को यह आइडिया आया। गो गेम की 19×19 ग्रिड सतह पर काले-सफेद पत्थरों के अनोखे पैटर्न देखकर उन्हें लगा कि एक ऐसा 2D कोड बनाया जा सकता है जो पारंपरिक बारकोड से कहीं ज्यादा डेटा स्टोर कर सके। उस समय टोयोटा ग्रुप की सब्सिडियरी डेन्सो वेव में काम कर रहे हारा को ऑटोमोबाइल पार्ट्स ट्रैकिंग के लिए तेज कोड की जरूरत महसूस हुई। पारंपरिक बारकोड सिर्फ 20-30 अक्षर ही रख पाते थे और एक ही दिशा से स्कैन होते थे, जिससे फैक्ट्री में कामगारों को 1000 बारकोड रोज स्कैन करने पड़ते।
आविष्कार की कहानी
हारा का जन्म 1957 में टोक्यो में हुआ। होसेई यूनिवर्सिटी से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में ग्रेजुएट होने के बाद 1980 में वे डेन्सो में शामिल हुए। 1992 में उन्हें 2D कोड डेवलप करने का टास्क मिला। लंच टाइम में गो खेलते हुए उन्होंने ग्रिड पैटर्न को नोटिस किया- काले-सफेद स्क्वायर्स का अनोखा संयोजन। उन्होंने पोजीशन डिटेक्शन मार्कर्स (1:1:3:1:1 रेशियो) पर रिसर्च की, जो प्रिंटेड मैटिरियल पर सबसे कम इस्तेमाल होता था, ताकि स्कैनिंग आसान हो।
टीम ने मिलकर क्विक रिस्पॉन्स (QR) कोड तैयार किया, जो बारकोड से 10 गुना तेज स्कैन होता और 360 डिग्री से पढ़ा जा सकता था। 1994 में लॉन्च होने पर इसे पहले ऑटो पार्ट्स लेबलिंग के लिए इस्तेमाल किया गया। हारा और उनकी टीम- मोटोआकी वाटाबे, तादाओ नोजिरी आदि- ने इसे इतना एफिशिएंट बनाया कि छोटे साइज में भी कांजी, काना और बड़ी मात्रा में डेटा स्टोर हो सके।
भारत में QR क्रांति: UPI का साथी
भारत में QR कोड ने डिजिटल पेमेंट्स को घर-घर पहुंचाया। 2016 के डेमोनेटाइजेशन के बाद PhonePe, Paytm, Google Pay जैसे ऐप्स ने इसे मुख्य हथियार बनाया। आज फलाहारी से लेकर बड़े बिजनेस तक UPI QR से ट्रांजेक्शन होता है। आधार कार्ड वेरिफिकेशन, डिजिटल मेन्यू, इवेंट टिकटिंग- हर जगह ये है। कोविड-19 महामारी ने इसे और पॉपुलर किया, जब कॉन्टैक्टलेस पेमेंट जरूरी हो गया। NPCI के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 तक भारत में QR ट्रांजेक्शन 100 बिलियन को पार कर चुके हैं, जो ग्लोबल इकोनॉमी को बूस्ट दे रहे हैं।
QR कोड की खासियतें
QR कोड की सबसे बड़ी खासियत इसकी यूनिकनेस है। हर बार जेनरेट होने पर पैटर्न बदल जाता है, जिसमें पोजीशन, एलाइनमेंट और टाइमिंग मार्कर्स होते हैं। ये डेटा को एन्क्रिप्ट रखता है और फ्रॉड से बचाता है। पारंपरिक बारकोड से अलग, ये URL, टेक्स्ट, कॉन्टैक्ट डिटेल्स सब स्टोर कर सकता है। रेस्टोरेंट में स्कैन कर मेन्यू देखें या इवेंट की पूरी डिटेल लें- सब आसान।
डेन्सो वेव ने स्मार्ट डिसीजन लिया- पेटेंट रखा लेकिन टेक्नोलॉजी को फ्री में पब्लिक डोमेन में डाल दिया। स्कैनर बेचे, लेकिन कोड जेनरेशन सबको फ्री। इसी वजह ये ग्लोबल स्टैंडर्ड बना। हारा ने कभी पर्सनल फेम नहीं चाहा; 2014 में यूरोपियन पेटेंट ऑफिस ने उन्हें पॉपुलर प्राइज दिया, लेकिन वे बैकग्राउंड में ही रहे।
वैश्विक प्रभाव: ट्रिलियन डॉलर इंडस्ट्री
आज QR ट्रिलियन डॉलर इंडस्ट्री चलाता है- लॉजिस्टिक्स, मार्केटिंग, हेल्थकेयर। भारत जैसे देशों में ये डिजिटल इंडिया का चेहरा है। सुधा मूर्ति जैसे एक्सपर्ट्स इसे ग्लोबल डिजिटल ब्रिज मानते हैं। हारा आज भी डेन्सो वेव से जुड़े हैं, और कहते हैं, “ये सिर्फ शुरुआत है।” मसाहिरो हारा साबित करते हैं कि एक साधारण आइडिया दुनिया बदल सकता है। अगली बार QR स्कैन करें, तो इस अनसंग हीरो को याद कीजिए।









