
भारत सरकार अब केवल वैश्विक तेल की उथल‑पुथल तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को घरेलू जैव‑ईंधन के जरिए मजबूत करने के लिए एक के बाद एक बड़े कदम उठा रही है। 1 अप्रैल से पूरे देश में E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल + 80% पेट्रोल) अनिवार्य होने के साथ‑साथ सरकार E25 पेट्रोल, यानी 25% एथेनॉल मिश्रण पेट्रोल की ओर भी सोचने लगी है। भारी उद्योग और पेट्रोलियम मंत्रालय ने अब वाहन निर्माताओं के साथ बैठकें शुरू कर दी हैं ताकि यह तय किया जा सके कि क्या मौजूदा और आने वाले वाहन E25 के लिए तकनीकी रूप से तैयार हैं।
तेल आयात पर निर्भरता कम करने की रणनीति
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात से पूरा करता है, जिसकी वजह से पेट्रोल की कीमतें वैश्विक संघर्ष और भू‑राजनीति के बवंडर से सीधे प्रभावित होती हैं। इस स्थिति में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की मात्रा बढ़ाकर सरकार न सिर्फ आयात बिल में अरबों डॉलर की बचत का लक्ष्य रख रही है, बल्कि घरेलू जैव‑ईंधन को लंबी अवधि का विकल्प भी बनाना चाहती है।
किसानों और पर्यावरण के लिए ‘हरित’ राह
एथेनॉल का अधिकांश उत्पादन गन्ना और फसल अवशेषों से होता है, जिससे किसानों के लिए गन्ना और अनाज जैसे उत्पादों के लिए एक नया बाजार खुलता है। सरकार का मानना है कि E25 जैसे उच्च एथेनॉल ब्लेंड से न सिर्फ आयात घटेगा, बल्कि गाड़ियों से निकलने वाले कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आएगी, जो शहरी प्रदूषण और जलवायु लक्ष्यों के लिए एक सकारात्मक कदम होगा।
इंजन और फ्यूल‑सिस्टम पर नई चुनौतियाँ
E20 से E25 तक जाना केवल फ्यूल‑नोज़ल पर लिखी प्रतिशत की संख्या बदलना नहीं है; इससे इंजन ट्यूनिंग, फ्यूल‑लाइन, गैस्केट और सेंसर सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है। एथेनॉल पेट्रोल की तुलना में थोड़ा ज्यादा कॉरोसिव और नमी‑सोखने वाला होता है, जिसकी वजह से पुराने वाहनों में रबर होज़, फ्यूल‑टैंक लाइनर और इंजेक्शन‑सिस्टम में जल्दी डिग्रेडेशन की आशंका रहती है। इसी वजह से सरकार और ऑटो निर्माता मिलकर यह तय करने पर जुटे हैं कि किन मॉडल्स को E25‑रेडी घोषित किया जा सकता है और कितने समय में यह तकनीकी बदलाव लागू हो सकते हैं।
फ्लेक्स‑फ्यूल गाड़ियों की दिशा
सरकार का रोडमैप केवल E25 तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसी ‘फ्लेक्स‑फ्यूल’ वाहनों को बढ़ावा देने की बात चल रही है, जो E85 या कुछ हद तक तो 100% एथेनॉल पर भी दौड़ सकें। इन गाड़ियों की लागत अभी ज्यादा हो सकती है, लेकिन उद्देश्य एक ऐसा ईकोसिस्टम बनाना है, जहां ग्राहक सस्ता और घरेलू फ्यूल चुनने का विकल्प रखें।
आम उपभोक्ता के लिए क्या बदलेगा?
आम ग्राहकों के लिए सबसे बड़ा इश्यू माइलेज और मेंटेनेंस का है। एथेनॉल कीऊर्जा प्रति लीटर पेट्रोल से कम होने की वजह से E20 और E25 दोनों में माइलेज में हल्की सी गिरावट की संभावना है, खासकर पुराने और E20‑अनकंपेटिबल वाहनों में। इसलिए सरकार और ऑटो इंडस्ट्री दोनों ही इस बात पर जोर दे रहे हैं कि E25 जैसा बड़ा ट्रांजिशन केवल तभी लागू किया जाए जब नियमों में स्पष्टता और व्यापक टेस्टिंग हो चुकी हो, ताकि उपभोक्ता पर बोझ न पड़े।
सरकारी योजनाएं और ऑटो उद्योग की तैयारियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं, लेकिन आम चालकों के लिए सबसे समझदार कदम अपने वाहन के “मैक्स एथेनॉल ब्लेंड” लेबल को ध्यान से चेक करना और अभी‑अभी किसी उच्च ब्लेंड को बिना स्पष्ट गाइडलाइन के अपनाने से बचना होगा।









