
कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के लाखों पेंशनर्स के लिए राहत की उम्मीदें फिर जगी हैं। पिछले कई महीनों से सुर्खियों में छाई खबरों के मुताबिक, एम्प्लॉयी पेंशन स्कीम-1995 (ईपीएस-95) के तहत न्यूनतम पेंशन को मौजूदा ₹1000 से बढ़ाकर ₹7500 करने की योजना पर विचार चल रहा है। हाल ही में देहरादून और जंतर-मंतर पर पेंशनर्स संघर्ष समितियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन भेजकर यह मांग दोहराई, लेकिन सरकार की ओर से ठोस आश्वासन नहीं मिला।
संसद में उठे सवाल
शीतकालीन सत्र के दौरान 1 दिसंबर 2025 को लोकसभा में सांसद बलया मामा सुरेश गोपीनाथ म्हात्रे ने श्रम राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे से छह सवाल किए। उन्होंने पूछा कि क्या न्यूनतम पेंशन बढ़ेगी, क्यों नहीं बढ़ रही, महंगाई भत्ता (डीए) क्यों नहीं दिया जाता, पेंशनर्स की मांगों का अध्ययन हुआ है या नहीं, और योजना को ‘जीने लायक’ बनाने के कदम क्या उठाए जा रहे हैं। पेंशनर्स का कहना है कि आज की महंगाई में ₹1000 की पेंशन दवा-दारू के लिए भी अपर्याप्त है।
ईपीएस-95 का ढांचा
ईपीएस-95 देश का सबसे बड़ा पेंशन सिस्टम है, जो 80 लाख से अधिक रिटायर्ड निजी कर्मचारियों को कवर करता है। यह नियोक्ता के 8.33% योगदान और केंद्र सरकार के 1.16% योगदान (₹15,000 वेतन सीमा तक) से चलता है। 2014 से लागू न्यूनतम ₹1000 पेंशन बजटीय सहायता से सुनिश्चित होती है। सरकार ने 2019 की वैल्यूएशन में एक्चुरियल डेफिसिट का हवाला देकर वृद्धि से इनकार किया। मंत्री ने स्पष्ट कहा कि फंड में भविष्य की देनदारियों के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं, इसलिए बढ़ोतरी संभव नहीं।
पेंशनर्स की मुख्य मांगें
पेंशनर्स की प्रमुख मांगें लंबे समय से अनसुनी हैं। वे ₹7500-₹9000 न्यूनतम पेंशन, नियमित डीए, हायर पेंशन बहाली और चिकित्सा सुविधा चाहते हैं। ईपीएस एक ‘डिफाइंड कंट्रीब्यूशन’ स्कीम होने से डीए इसका हिस्सा नहीं, जो सरकारी कर्मचारियों से असमानता पैदा करता है। अधिकतर पेंशनर्स कम वेतन वाली निजी नौकरियों से रिटायर हुए हैं, जहां पेंशन उनकी एकमात्र आय है। बढ़ती मेडिकल लागत और जीवनयापन खर्च ने उनकी परेशानी दोगुनी कर दी है।
भविष्य की संभावनाएं
राष्ट्रीय संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि मांगें न मानी गईं तो राष्ट्रीय आंदोलन तेज होगा। अक्टूबर 2025 में ईपीएफओ की सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (सीबीटी) बैठक में चर्चा की उम्मीद थी, लेकिन आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि फंडिंग मॉडल बदलाव- जैसे नियोक्ता योगदान बढ़ाना या अतिरिक्त सरकारी सहायता- बिना पेंशन वृद्धि मुश्किल है। संसदीय समिति ने समीक्षा की सिफारिश की, लेकिन 2026 में भी फैसला लंबित है।
पेंशनर्स की यह लड़ाई महंगाई के दौर में न्याय की मांग है। क्या सरकार फंड डेफिसिट दूर कर राहत देगी, या पुरानी प्रतीक्षा जारी रहेगी? आने वाले महीनों में इसका जवाब मिलेगा।









