
संस्कृत का प्रसिद्ध स्लोक है, “अति सर्वत्र वर्जयेत्” – अर्थात् किसी भी चीज की अधिकता हानिकारक है। आज स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, जो कामकाज से लेकर मनोरंजन तक सब कुछ आसान बनाता है। लेकिन बच्चों के संदर्भ में यह ‘बेस्ट फ्रेंड’ कभी-कभी दुश्मन साबित हो रहा है। घर में तो ठीक, पर स्कूलों में फोन की लत छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, एकाग्रता और सामाजिक व्यवहार को चुपचाप खोखला कर रही है। हालिया वैश्विक सर्वेक्षणों ने इस समस्या पर चिंताजनक आंकड़े पेश किए हैं, जो बताते हैं कि फोन बैन से बच्चों में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं, हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं।
हंगरी सर्वे के चौंकाने वाले नतीजे
हंगरी के शोधकर्ताओं का ताजा अध्ययन, जिसमें 1,198 माध्यमिक स्कूल शिक्षकों से सर्वे लिया गया, चौंकाने वाले नतीजे देता है। बैन से पहले 37 प्रतिशत छात्र क्लास के दौरान बार-बार फोन चेक करते थे, जो अब घटकर महज 4 प्रतिशत रह गया। शिक्षकों ने देखा कि बच्चे आमने-सामने बातचीत में ज्यादा रुचि लेने लगे, आउटडोर गतिविधियां बढ़ीं और शतरंज-कार्ड जैसे पारंपरिक खेलों की वापसी हुई। ध्यान केंद्रित करने, क्लास में भागीदारी और स्मृति शक्ति में भी सुधार नजर आया।
नॉर्वे की 1187 स्कूलों वाली 2020 स्टडी में साइकोलॉजिकल लक्षणों में कमी, बुलिंग में गिरावट और लड़कियों के गणित स्कोर में उछाल दर्ज किया गया। फ्लोरिडा (2025) और यूके के अध्ययनों ने भी पुष्टि की कि बैन से टेस्ट स्कोर 6.4 प्रतिशत ऊपर हुए, खासकर कमजोर छात्रों को फायदा पहुंचा। ऑस्ट्रेलिया में तनाव 2.4 प्रतिशत और नकारात्मक भावनाएं 5.2 प्रतिशत घटीं।
वैश्विक स्तर पर तेजी से फैलता ट्रेंड
वैश्विक पटल पर यह ट्रेंड तेजी से फैल रहा है। यूनेस्को GEM रिपोर्ट के अनुसार, जून 2023 में 24 प्रतिशत देशों में बैन था, जो मार्च 2026 तक 58 प्रतिशत (114 शिक्षा प्रणालियां) हो गया। फ्रांस, चीन, कनाडा, डेनमार्क, स्वीडन, इंग्लैंड और भारत के दिल्ली-कर्नाटक जैसे राज्यों में सख्ती बरती जा रही है। यूनेस्को warns कि फोन का नोटिफिकेशन मात्र देखने से फोकस दोबारा लौटने में 20 मिनट लगते हैं। व्हार्टन सर्वे (20,000 शिक्षकों पर) में निलंबन कम हुए, नींद की समस्या 60 प्रतिशत घटी और डिप्रेशन का खतरा 30 प्रतिशत कम हुआ।
विशेषज्ञों की चिंताएं और चुनौतियां
फिर भी, विशेषज्ञ पूर्ण बैन को पूर्ण समाधान नहीं मानते। 64 प्रतिशत शिक्षकों ने पढ़ाई में सीमित सुधार देखा, क्योंकि कुछ बच्चे घर पर देर रात फोन चला रहे। माता-पिता का 71 प्रतिशत हिस्सा बच्चे फोन के बिना नहीं रह पाते। डिजिटल लर्निंग, AI जैसे कौशल सीखने के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। कर्नाटक में चल रही चर्चा इसका उदाहरण है- सरकार फायदे-नुकसान तौल रही। साइबरबुलिंग, सामाजिक अलगाव और व्यक्तित्व विकारों से बचाव तो बैन जरूरी लगता है, पर संतुलित दृष्टिकोण चाहिए। स्क्रीन टाइम सीमित कर, जागरूकता अभियान चलाकर और माता-पिता-शिक्षकों का सहयोग लेते हुए आगे बढ़ना होगा।









