
शादी का बंधन जीवन का सबसे पवित्र रिश्ता माना जाता है, जहां दो अनजान लोग एक-दूसरे के हो जाते हैं। लेकिन कभी-कभी रिश्ते इतने उलझ जाते हैं कि तलाक ही एकमात्र रास्ता बचता है। तलाक की यह प्रक्रिया न सिर्फ भावनात्मक रूप से कष्टदायी होती है, बल्कि इसमें संपत्ति बंटवारे, गुजारा भत्ते और गहनों जैसे मुद्दे पर भी लंबी कानूनी लड़ाई छिड़ जाती है। खासकर महिलाओं के ‘स्त्रीधन’ यानी शादी में मिले जेवरों और उपहारों को लेकर ससुराल पक्ष अक्सर जबरन कब्जा बनाए रखता है।
क्या पति तलाक के समय पत्नी के गहने मांग सकता है? कानून साफ कहता है- नहीं! ये गहने पत्नी की निजी संपत्ति हैं, और पति केवल संरक्षक की भूमिका निभा सकता है।
स्त्रीधन की अवधारणा और कानूनी आधार
स्त्रीधन की अवधारणा प्राचीन हिंदू कानून से चली आ रही है, जो आज हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 से संरक्षित है। इसमें शादी के समय दुल्हन को माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदारों या दोस्तों से मिले सभी उपहार शामिल हैं- चाहे सोने-चांदी के जेवर हों, नकदी हो या कोई चल संपत्ति। यहां तक कि सास-ससुर या पति द्वारा मुंह दिखाई, करवा चौथ या अन्य रस्मों में दिए गए तोहफे भी स्त्रीधन ही माने जाते हैं। पत्नी की अपनी कमाई से खरीदे गहने तो निश्चित रूप से उसके पूर्ण स्वामित्व में होते हैं।
केरल हाईकोर्ट ने हाल के एक फैसले में स्पष्ट किया कि तलाक पर पत्नी इनकी वापसी का दावा कर सकती है, बशर्ते वह साबित करे कि इन्हें ससुराल पक्ष को सौंपा गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों ने यह भी कहा है कि शादी में पहने गहनों का फोटो या वीडियो ही पर्याप्त सबूत नहीं; विस्तृत प्रमाण जरूरी हैं।
पति का अधिकार: सीमित और शर्तबद्ध
तलाक के दौरान पति का कोई स्वाभाविक अधिकार इन गहनों पर नहीं बनता। हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 27 अदालत को संपत्ति बंटवारे का अधिकार तो देती है, लेकिन स्त्रीधन को स्पष्ट रूप से पत्नी की व्यक्तिगत संपत्ति घोषित किया गया है। यदि गहने साझा निवेश से खरीदे गए हों, जैसे दोनों ने मिलकर फाइनेंशियल कंट्रीब्यूशन किया हो, तो ही बंटवारा संभव है। अन्यथा, पति या उसके परिवार का दावा खारिज हो जाता है।
उदाहरण के तौर पर, यदि पत्नी को पति के दोस्तों से व्यक्तिगत उपहार मिले, तो वे ससुराल के हो सकते हैं, लेकिन मायके पक्ष के तोहफे पर पत्नी का अखंड हक रहता है। यह नियम मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होता है, जहां सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला दिया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला दहेज के सोने और नकदी की वापसी मांग सकती है।
ससुराल पक्ष का इनकार
ससुराल पक्ष द्वारा गहने लौटाने से इनकार करने पर कानून बहुत सख्त है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 के तहत ‘अमानत में ख्यानत’ का मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। पुलिस शिकायत पर गहनों की बरामदगी कर कोर्ट में पेश करती है, और तलाक की अंतिम डिक्री के साथ अदालत इन्हें लौटाने का आदेश देती है। कई मामलों में ससुराल वाले दबाव डालकर या छिपाकर रखते हैं, लेकिन अब अदालतें सख्त साबूतों की मांग नहीं कर रही।
केरल हाईकोर्ट ने 2025 में फैसला दिया कि शादी की परंपराओं को ध्यान में रखते हुए सामान्य सबूत पर्याप्त हैं। स्त्रीधन को पत्नी की आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, इसलिए इसे छीनना अपराध है।
महिलाओं के लिए व्यावहारिक सलाह
महिलाओं को सलाह है कि शादी के समय गहनों की लिस्ट, बिल, फोटो और वीडियो सुरक्षित रखें। तलाक केस में वकील से परामर्श लें और FIR दर्ज कराएं। संपत्ति बंटवारा गुजारा भत्ते से अलग होता है, इसलिए दोनों पर अलग दावा करें। समाज में अभी भी अज्ञानता के कारण विवाद बढ़ते हैं, लेकिन कानून महिलाओं के पक्ष में मजबूत हो रहा है। कुल मिलाकर, तलाक हो या अलगाव, स्त्रीधन पत्नी का अविभाज्य अधिकार है- पति की कोई मांग यहां नहीं चलेगी।









