
शेयर बाजार में हाल की तेज गिरावट और NSE के ताजा डेटा ने साफ संकेत दे दिया है कि भारतीय इक्विटी मार्केट इस समय भरोसे के बड़े संकट से गुजर रहा है। नए निवेशकों की एंट्री में रिकॉर्ड गिरावट, बढ़ती वोलैटिलिटी और ग्लोबल अनिश्चितता ने मिलकर रिटेल निवेशकों के जोश को ठंडा कर दिया है। मौजूदा वित्त वर्ष FY26 में NSE पर नए निवेशकों के रजिस्ट्रेशन में करीब 30 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जो पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी कमी है।
NSE की मासिक रिपोर्ट ‘NSE Pulse’ के मुताबिक FY25 में जहां 2.12 करोड़ नए निवेशक जुड़े थे, वहीं FY26 में अब तक यह संख्या घटकर करीब 1.5 करोड़ रह गई है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि रिटेल इन्वेस्टर्स का उत्साह और रिस्क लेने की भूख दोनों कम हुए हैं।
भरोसा टूटा, पर बेस मजबूत
दिलचस्प बात यह है कि नए रजिस्ट्रेशन घटने के बावजूद कुल यूनिक निवेशक बेस बढ़कर 11.28 करोड़ से 12.78 करोड़ पर पहुंच गया है, यानी करीब 13.3 फीसदी की सालाना बढ़त। इसका मतलब यह है कि जो पुराने निवेशक पहले से बाजार में हैं, वे वोलैटिलिटी के दौर में भी टिके हुए हैं, लेकिन नए लोग सीधे इक्विटी में कदम रखने से बच रहे हैं। दूसरी तरफ, रेगुलेटर के डेटा बताते हैं कि करीब दो-तिहाई डीमैट अकाउंट डॉर्मेंट पड़े हैं, जो दिखाता है कि कई निवेशक फिलहाल ‘वेट एंड वॉच’ मोड में हैं।
वोलैटिलिटी, ग्लोबल तनाव और FII बिकवाली का तिहरा दबाव
FY26 के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी में 4-10 फीसदी तक की गिरावट और कई बार इंट्रा-डे में 1,000-1,600 अंक तक के क्रैश ने छोटे निवेशकों का भरोसा हिला दिया। मिडकैप में हल्की मजबूती जरूर दिखी, लेकिन स्मॉलकैप में करेक्शन ने रिटेल पोर्टफोलियो पर सीधा असर डाला।
इस गिरावट के पीछे सिर्फ घरेलू फैक्टर नहीं, बल्कि जियोपॉलिटिकल तनाव, अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध, ट्रेड प्रोटेक्शनिज्म और करेंसी में तेज उतार-चढ़ाव जैसे ग्लोबल कारण भी अहम रहे। इसी दौरान विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से लगातार पैसे निकालते रहे, जिससे सेंटीमेंट और कमजोर हुआ और नए निवेशक साइडलाइन पर चले गए।
कहां से आ रहे हैं सबसे ज्यादा नए निवेशक?
रीजनल डेटा बताता है कि नए निवेशकों की हिस्सेदारी में उत्तर भारत 39.8 फीसदी के साथ सबसे आगे है। इसके बाद दक्षिण भारत 25 फीसदी, पश्चिम भारत 21.5 फीसदी और पूर्व भारत 13.4 फीसदी हिस्सेदारी के साथ आते हैं, यानी नए निवेशकों का लगभग दो तिहाई हिस्सा उत्तर और दक्षिण भारत से आ रहा है। पिछले पांच वर्षों में उत्तर भारत की पकड़ और मजबूत हुई है, जबकि पारंपरिक रूप से एक्टिव पश्चिमी राज्यों की हिस्सेदारी में कमी आई है।
राज्यों की तस्वीर: यूपी चमका, गुजरात फिसला
स्टेट लेवल पर उत्तर प्रदेश 14.8 फीसदी हिस्सेदारी के साथ नए निवेशकों का सबसे बड़ा योगदानकर्ता बनकर उभरा है। इसके बाद महाराष्ट्र, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्य भी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। हालांकि मासिक आधार पर सभी बड़े राज्यों में नए रजिस्ट्रेशन की संख्या घटी है, जिसमें गुजरात में 50 फीसदी से अधिक की गिरावट और यूपी में करीब 22 फीसदी की कमी सबसे ज्यादा चौंकाती है। यानी तेजी के दौर में जो राज्य सबसे आक्रामक तरीके से बाजार में उतरे थे, अब वहीं सबसे तेज ब्रेक भी लगा रहे हैं।
आगे रास्ता क्या है?
डेटा साफ इशारा करता है कि निवेशक अब बाजार के उतार-चढ़ाव के प्रति पहले से ज्यादा सतर्क हो गए हैं और तुरंत रिटर्न की जगह पूंजी संरक्षण को प्राथमिकता दे रहे हैं। मार्केट एक्सपर्ट मानते हैं कि नए निवेशकों की वापसी तभी तेज होगी जब दो चीजें एक साथ दिखें – इंडेक्स में स्थिरता और ग्लोबल फ्रंट पर तनाव में नरमी।
इतिहास बताता है कि बड़ी गिरावटों के बाद भारतीय बाजार आम तौर पर 2- साल में रिकवर हो जाते हैं, लेकिन निवेशकों के भरोसे को वापस आने में इससे कहीं ज्यादा समय लगता है। ऐसे में, मौजूदा गिरावट सिर्फ कीमतों की नहीं, बल्कि कॉन्फिडेंस की भी है – जिसे दुरुस्त करने के लिए बाजार को समय, स्थिरता और पारदर्शी नीतियों की जरूरत होगी।









