
भारत का बासमती चावल निर्यात उद्योग, जो दुनिया के बाजार में 70 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है, आज पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक संकट की चपेट में फंस गया है। ईरान-इजरायल संघर्ष ने समुद्री मार्गों को जोखिम भरा बना दिया है, जिसके चलते शिपिंग कंपनियां ‘वार रिस्क सरचार्ज’ के नाम पर प्रति कंटेनर 800 से 6000 डॉलर तक का मनमाना शुल्क वसूल रही हैं।
बासमती चावल किसान एवं निर्यातक विकास मंच (बीआरएफईडीएफ) ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की गुहार लगाई है, क्योंकि ये शुल्क न केवल अपारदर्शी हैं, बल्कि व्यापार को व्यावहारिक रूप से ठप करने वाले साबित हो रहे हैं।
सरचार्ज की मनमानी और व्यापारियों की दुविधा
बीआरएफईडीएफ की चेयरपर्सन प्रियंका मित्तल ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “निर्यातकों से उन परिस्थितियों के लिए असीमित वित्तीय बोझ उठाने को कहा जा रहा है, जिन पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है।” पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, यह सरचार्ज अक्सर बिना पूर्व सूचना के लगाया जाता है या माल लोड होने के बाद ही संशोधित कर दिया जाता है।
कुछ मामलों में कुल शिपिंग लागत माल के मूल्य के 60-70 प्रतिशत तक पहुंच जाती है, जो सामान्य फ्रेट के मुकाबले कई गुना अधिक है। पहले खाड़ी देशों के लिए प्रति कंटेनर भाड़ा 100-150 डॉलर था, जो अब 2000-2500 डॉलर तक उछल चुका है, और सरचार्ज जोड़ने पर 5000 डॉलर से ऊपर चला जाता है।
शिपिंग कंपनियों की चालबाजी और माल की परेशानी
शिपिंग कंपनियों की मनमानी यहीं नहीं रुकती। पश्चिम एशिया संकट के कारण वे तय बंदरगाहों जैसे दुबई या ईरान के बजाय जेबेल अली (यूएई), सोहर या सलालाह (ओमान) पर माल डायवर्ट कर रही हैं। कई कंटेनर बीच रास्ते में ही रोक दिए जाते हैं या वापस लौटा दिए जाते हैं, और सारा अतिरिक्त खर्च निर्यातकों पर थोप दिया जाता है।
छोटे व्यापारियों के लिए यह स्थिति सबसे घातक है, जहां बड़े शिपिंग दिग्गजों के सामने सौदेबाजी की कोई ताकत नहीं बचती। कैथल, करनाल और संभल जैसे उत्तर भारत के चावल व्यापार केंद्रों पर 4 लाख टन से अधिक माल पोर्टों पर अटका पड़ा है, और 2000-25,000 करोड़ रुपये के पेमेंट लंबित हैं।
संकट की जड़ें और किसानों पर गहरा आघात
इस संकट की जड़ें मार्च 2026 से गहरी हैं, जब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंचा। ईरान भारत का सबसे बड़ा बासमती बाजार है, जहां रियाल की गिरावट और भुगतान जोखिम ने पहले ही निर्यात को प्रभावित किया। हर साल 60 लाख टन बासमती का आधा हिस्सा खाड़ी देशों (ईरान, सऊदी, इराक, यूएई) को जाता है, जो 50 हजार करोड़ रुपये का कारोबार है।
लेकिन अब शिपमेंट देरी से किसानों के मंडी भाव गिर रहे हैं- पहले न्यूनतम निर्यात मूल्य (MEP) 1200 डॉलर प्रति टन तय था, जो 950 पर आया और बाद हटा, मगर सरचार्ज ने फिर सब बर्बाद कर दिया। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के किसानों को प्रति एकड़ 25-30 हजार रुपये का नुकसान हो रहा है, कुल 2023-24 में 10,000 करोड़ और 2024-25 में 1,000 करोड़ का घाटा।
सरकार के कदम और निर्यातकों की मांगें
सरकार ने पहले गैर-बासमती चावल पर निर्यात प्रतिबंध लगाए और APEDA के जरिए राइस सर्टिफिकेट ऑथेंटिकेशन (RCAC) अनिवार्य किया, ताकि घरेलू उपलब्धता बनी रहे। लेकिन अब बीआरएफईडीएफ ने मांग की है कि शुल्क सेवाओं पर आधारित हों, विवादास्पद रोकथाम पर प्रतिबंध लगे, और भू-राजनीतिक संकट में स्पष्ट माल ढुलाई नियम बने। संबंधित विभाग शिकायतें दर्ज कर चुके हैं, मगर जमीनी बदलाव नदारद है। अगर जल्द हस्तक्षेप न हुआ, तो भारत का समुद्री व्यापार, खासकर बासमती जो GI टैग वाला अनोखा उत्पाद है, लंबे समय तक प्रभावित रहेगा।
भविष्य का खतरा और आजीविका पर संकट
यह संकट केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि लाखों किसानों-व्यापारियों की आजीविका का है। सरकार का अगला कदम तय करेगा कि क्या बासमती का राज फिर कायम रहेगा या वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत पिछड़ जाएगा।





