
ठाणे जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने ओला इलेक्ट्रिक पर सख्त रुख दिखाते हुए कंपनी को स्पष्ट “डोज़ या डाई” तर्ज का आदेश दे दिया है। कोर्ट ने ओला इलेक्ट्रिक को निर्देश दिया है कि वह अपने एक ग्राहक को उसके खराब इलेक्ट्रिक स्कूटर के बदले उसी मॉडल और स्पेसिफिकेशन का बिल्कुल नया स्कूटर दे दे, वरना उसकी पूरी रकम 6% सालाना ब्याज के साथ वापस कर दे।
इस मामले को कोर्ट ने उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन, “सेवा में भारी कमी” और “गलत व्यापारिक व्यवहार” की श्रेणी में रखा है। यह फैसला न केवल एक व्यक्तिगत शिकायत का निपटारा है, बल्कि EV स्कूटर- सेक्टर में खराब क्वालिटी कंट्रोल और चालाकी भरी सर्विस प्रैक्टिसेज के खिलाफ एक स्पष्ट चेतावनी भी हो सकता है।
कुछ ही दिनों में चलते‑चलते बंद हुआ स्कूटर
नवी मुंबई के रहने वाले एक वकील ने जुलाई 2024 में ₹96,997 का भुगतान करके ओला इलेक्ट्रिक का एक नया इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदा था। डिलीवरी के महज दो दिन बाद ही जब उन्होंने पहली लंबी राइड की, तो चलते‑चलते स्कूटर की स्पीड और एक्सीलरेशन में गड़बड़ी आने लगी। भरे हुए ट्रैफिक के बीच वह कई बार अचानक रुक गया, जिससे न सिर्फ ग्राहक को फंसना पड़ा बल्कि रास्ते में हादसे का खतरा भी उत्पन्न हो गया। इस तरह की खराबी बताती है कि जिस उपकरण को “सुरक्षित और आधुनिक” इलेक्ट्रिक ट्रांसपोर्ट बताकर बाजार में धकेला जा रहा है, वह असली रोड कंडीशन में खराब होने लगा है।
परेशानी 29 अगस्त 2024 को और भी गंभीर हो गई। राइड के दौरान सिर्फ 500 मीटर की दूरी में ही स्कूटर की बैटरी लेवल 21% से सीधे 3% पर आ गया और वाहन बीच सड़क पर ही अचानक बंद हो गया। ग्राहक का कहना है कि भरे ट्रैफिक के बीच इस तरह अचानक रुकने से कोई बड़ा जानलेवा हादसा भी हो सकता था। ऐसी घटना न केवल उपभोक्ता की जान के लिए खतरा बनती है, बल्कि यह भी सवाल खड़े करती है कि EV स्कूटरों की बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम और सुरक्षा‑प्रोटोकॉल कितने विश्वसनीय हैं।
सोशल मीडिया पर उठाई बात
ग्राहक ने अपनी समस्या लेकर ओला को कई ईमेल और व्हाट्सएप मैसेजेस भी किए, लेकिन लंबे समय तक कंपनी की तरफ से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया। हार मानकर जब उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर स्कूटर की खराबी और ओला की लापरवाही को उठाया, तब जाकर कंपनी ने इस मुद्दे पर ध्यान दिया। स्कूटर को लोकल सर्विस सेंटर में लिया जाने का दावा किया गया, लेकिन बाद में इंश्योरेंस कंपनी की जांच से पता चला कि वाहन का सर्विस‑रिकॉर्ड ही दर्ज नहीं किया गया था। यानी, ग्राहक को झूठी जानकारी देकर आश्वासन दिया गया था।
महीनों बाद, जब स्कूटर ग्राहक को वापस मिला तो वह न केवल बेहद गंदा था बल्कि उस पर ऊबड़‑खाबड़ सड़क पर घिसे होने के निशान और नई खरोंचें भी दिख रही थीं। यह ओला की सर्विस सेंटर की पेशेवराना व्यवस्था और जिम्मेदारी के उच्च मानकों पर सीधा सवाल खड़ा करता है, खासकर जब वही कंपनी अपने विज्ञापनों में पैन‑इंडिया सर्विस‑नेटवर्क और “24×7 सपोर्ट” के वादे कर चुकी है।
नया स्कूटर या पूरे पैसे ब्याज समेत वापस
ठाणे कंज्यूमर कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई में ओला इलेक्ट्रिक की तरफ से कोई प्रतिनिधि पेश नहीं होने का भी नोट किया। इसके बाद आयोग ने एकतरफा फैसला सुनाते हुए कंपनी को दो विकल्प दिए: या तो ग्राहक को उसी मॉडल और स्पेसिफिकेशन का बिल्कुल नया स्कूटर दें, या फिर ₹96,997 पूरी रकम 6% सालाना ब्याज के साथ वापस कर दें। इसके साथ ही, कोर्ट ने ग्राहक को हुई मानसिक परेशानी और ध्यानपूर्वक लड़ाई के लिए ₹20,000 की क्षतिपूर्ति और ₹15,000 कानूनी खर्च के रूप में अलग से देने का आदेश दिया। इस तरह, ओला को कुल लगभग ₹1,32,000 के आसपास अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है, जो एक इलेक्ट्रिक स्कूटर की दाम के आसपास ही आ जाता है।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि डिलीवरी के पहले ही दिन से बैटरी का अचानक खत्म होना और स्कूटर का बीच रास्ते बंद हो जाना यह साबित करता है कि गाड़ी निर्माण या टेस्टिंग के दौरान ही खराबी लेकर बाजार में छोड़ी गई थी। इसके साथ‑साथ लंबे समय तक स्कूटर को सर्विस के नाम पर अपने चैन में रखना और ग्राहक को सही जानकारी न देना, ओला की “भरी लापरवाही” के रूप में दर्ज किया गया।
इस फैसले से उभरते संकेत
इस मामले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि उपभोक्ता आयोग इलेक्ट्रिक वाहन-निर्माताओं के प्रति अब पहले से ज्यादा निगरानी और सख्ती बरतने लगे हैं। खासकर तब जब खराबी सीधे जान के लिए खतरा बन जाए, जैसा कि भरे ट्रैफिक में चलते‑चलते स्कूटर का बंद हो जाना साबित करता है। इस तरह के फैसले अन्य ग्राहकों को भी हिम्मत दे सकते हैं कि वे अपनी शिकायतों को सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित न रखें, बल्कि जिला उपभोक्ता फोरम या राज्य स्तर के कमीशन में आधिकारिक रूप से उठाएं।
इस मामले से साफ है कि EV स्कूटर की बिक्री‑जोश और मार्केटिंग‑क्लेम के बीच अगर रियल टेस्टिंग, क्वालिटी कंट्रोल और सर्विस नेटवर्क फेल हो जाए, तो कानूनी जवाबदेही से बच पाना आसान नहीं होगा।









