
आज दुबई दुनिया का सबसे आधुनिक शहर बन चुका है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इतिहास में इसका गहरा संबंध भारत से रहा है। अंग्रेजी शासन काल के दौरान दुबई भले ही आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा नहीं था, लेकिन उस पर दिल्ली का काफी प्रभाव था। ‘बीबीसी’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 20वीं सदी की शुरुआत में अरब का करीब एक तिहाई हिस्सा ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य (British Indian Empire) के प्रशासन के तहत आता था। यही कारण है कि उस दौर में दुबई के व्यापारिक और प्रशासनिक फैसलों में भारत की अहम भूमिका होती थी।
जब अदन से कुवैत तक अरब का शासन दिल्ली से चलता था
20वीं सदी की शुरुआत में अरब प्रायद्वीप का एक बड़ा हिस्सा (लगभग एक तिहाई) सीधे तौर पर ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के नियंत्रण में था। उस समय अदन से लेकर कुवैत तक, ब्रिटिश प्रभुत्व वाले सभी अरब देशों का प्रबंधन दिल्ली से ही किया जाता था। इन क्षेत्रों पर शासन करने की जिम्मेदारी ‘भारतीय राजनीतिक सेवा’ (Indian Political Service) के अधिकारियों की होती थी। यह तथ्य दर्शाता है कि आधुनिक अरब देशों और भारत के बीच केवल व्यापारिक ही नहीं, बल्कि एक समय गहरा प्रशासनिक संबंध भी रहा है।
गांधी जी और अदन का रोचक इतिहास
इतिहास के पन्नों में भारत और अरब के रिश्ते बेहद गहरे रहे हैं। ब्रिटिश शासन के दौरान ‘इंटरप्रटेशन एक्ट, 1889’ के तहत कई संरक्षित अरब देशों को कानूनी रूप से भारत का ही हिस्सा माना जाता था और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भारतीय सैनिकों पर थी। स्थिति यह थी कि यमन के अदन में भारतीय पासपोर्ट तक जारी किए जाते थे। इतना ही नहीं, लॉर्ड कर्जन तो ओमान को भी भारत की एक देसी रियासत बनाना चाहते थे। एक दिलचस्प वाकया 1931 का है, जब महात्मा गांधी अदन पहुँचे थे; वहां के अरबी युवाओं ने उनसे मिलकर खुद को ‘भारतीय राष्ट्रवादी’ बताया था, जो उस समय के अटूट सांस्कृतिक और राजनीतिक जुड़ाव को दर्शाता है।
जब भारत के नक्शे में शामिल था अरब का हिस्सा
यह एक हैरान करने वाला तथ्य है कि ब्रिटिश काल के दौरान भारत का प्रभाव अरब तक फैला हुआ था, लेकिन इस जानकारी को बहुत ही कम लोगों के साथ साझा किया गया। उस समय के आधिकारिक और असली नक्शों में अरब के इन क्षेत्रों को भारत के हिस्से के रूप में दिखाया जाता था, परंतु सुरक्षा और रणनीतिक कारणों से उन्हें आम जनता से छिपाकर ‘गुप्त’ रखा गया था। किसी भी सार्वजनिक दस्तावेज या मैप में अरब राज्यों को भारत के साथ नहीं दर्शाया जाता था, ताकि इस विशाल साम्राज्य की सीमाओं की जानकारी सार्वजनिक न हो सके।
1937 में हुआ था बंटवारा
1920 के दशक में भारत में राष्ट्रवाद की लहर तेज हो रही थी, जिससे अंग्रेजों को अपनी पकड़ कमजोर होने का डर सताने लगा। इसी राजनीतिक बदलाव का फायदा उठाते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने 1 अप्रैल 1937 को अदन (यमन) को भारत से अलग करने का बड़ा फैसला लिया। उस समय किंग जॉर्ज VI ने एक टेलीग्राम संदेश भेजा था, जिसमें स्वीकार किया गया था कि अदन पिछले 100 वर्षों से भारत का अभिन्न हिस्सा रहा है। यह बंटवारा उस विशाल साम्राज्य के अंत की शुरुआत थी, जिसे दिल्ली से नियंत्रित किया जाता था।









