
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भले ही पति-पत्नी का आधिकारिक तौर पर तलाक हो चुका हो, लेकिन इससे फैमिली कोर्ट के अधिकार खत्म नहीं होते। अदालत अब भी तलाकशुदा महिला के स्त्रीधन, शादी में मिले तोहफे और प्रॉपर्टी से जुड़े विवादों पर सुनवाई कर सकती है और उस पर अपना फैसला दे सकती है। इस फैसले से उन महिलाओं को बड़ी राहत मिलेगी जो तलाक के बाद अपने गहनों या संपत्तियों को वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं।
मुकदमों का बोझ कम करने के लिए फैमिली कोर्ट ही सुलझाए पति-पत्नी के संपत्ति विवाद
हिमाचल हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 का हवाला देते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस पुराने फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी की संपत्ति संबंधी अर्जी को यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि अब वे साथ नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी मुकदमों की लंबी प्रक्रिया को छोटा करने के लिए पति-पत्नी के बीच के प्रॉपर्टी विवादों का निपटारा फैमिली कोर्ट में ही होना चाहिए। कोर्ट का मानना है कि इससे विवाद जल्दी सुलझेंगे और महिलाओं को अपने हक की संपत्ति या स्त्रीधन पाने के लिए अलग-अलग अदालतों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
हिंदू विवाह अधिनियम से ऊपर है फैमिली कोर्ट एक्ट
हिमाचल हाईकोर्ट ने एक बड़ी कानूनी व्याख्या करते हुए कहा है कि फैमिली कोर्ट एक्ट (Family Court Act) का प्रभाव अन्य कानूनों, जैसे हिंदू विवाह अधिनियम, से कहीं अधिक व्यापक है। कोर्ट ने साफ किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 की किसी संकुचित या छोटी व्याख्या के आधार पर फैमिली कोर्ट की शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता।
सरल शब्दों में कहें तो, फैमिली कोर्ट को यह पूरा अधिकार है कि वह वैवाहिक विवादों और उससे जुड़ी संपत्तियों के मामलों पर खुलकर सुनवाई करे। इस फैसले का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि तकनीकी कानूनी बारीकियों की वजह से किसी भी पक्ष, विशेषकर महिलाओं को न्याय पाने में देरी न हो।
‘शादी की संपत्ति’ पर सुनवाई करना फैमिली कोर्ट की अपनी मर्जी
हिमाचल हाईकोर्ट ने कानून की बारीकियों को समझाते हुए कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 में “सकता है” (May) शब्द का प्रयोग किया गया है। इसका मतलब यह है कि यह फैसला पूरी तरह फैमिली कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही तलाक का फैसला पहले हो चुका हो, लेकिन यह नियम फैमिली कोर्ट को शादी से जुड़ी प्रॉपर्टी और स्त्रीधन के मामलों पर अलग से सुनवाई करने से नहीं रोकता। इस फैसले से साफ हो गया है कि तलाक के बाद भी अगर संपत्ति को लेकर कोई स्वतंत्र अर्जी दी जाती है, तो फैमिली कोर्ट उस पर विचार करने के लिए कानूनी रूप से सक्षम है।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक आदेश
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रमेश वर्मा की बेंच ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि फैमिली कोर्ट एक्ट के तहत अदालत के पास पति-पत्नी की संपत्ति से जुड़े विवादों को सुलझाने का व्यापक अधिकार है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही अन्य कानूनों में कुछ भी लिखा हो, लेकिन फैमिली कोर्ट को इन मामलों पर फैसला करने से रोका नहीं जा सकता।
यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा था, जिसने पहले ही एकतरफा तलाक हासिल कर लिया था। तलाक की कार्यवाही के दौरान ही उसने धारा 27 के तहत अपना स्त्रीधन, शादी के तोहफे और अन्य सामान वापस पाने की गुहार लगाई थी। हाईकोर्ट के इस रुख ने साफ कर दिया है कि तलाक के बाद भी महिला अपने कानूनी हक के लिए फैमिली कोर्ट में अपनी बात रख सकती है।
संपत्ति विवाद के लिए अलग कोर्ट जाने की ज़रूरत नहीं, फैमिली कोर्ट ही करेगा फैसला
हिमाचल हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस पुराने फैसले को पलट दिया है जिसमें तलाक के बाद संपत्ति विवाद पर सुनवाई से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि फैमिली कोर्ट अधिनियम की धारा 7(i) के तहत पति-पत्नी के बीच प्रॉपर्टी से जुड़े हर विवाद को सुलझाने का अधिकार फैमिली कोर्ट के पास ही है।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर तलाक के बाद छोटे-छोटे संपत्ति विवादों के लिए लोगों को सिविल कोर्ट के चक्कर काटने पड़े, तो फैमिली कोर्ट बनाने का मुख्य उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। इसी के साथ, हाईकोर्ट ने रद्द किए गए आवेदन को दोबारा बहाल करते हुए मामले को वापस फैमिली कोर्ट भेज दिया है ताकि महिला को उसके स्त्रीधन और संपत्ति का हक कानून के अनुसार मिल सके।









