
डायबिटीज के मरीजों के लिए HbA1c टेस्ट अब सिर्फ एक लैब रिपोर्ट नहीं, बल्कि इलाज की दिशा तय करने वाला अहम पैमाना बन चुका है। डॉक्टर साफ कह रहे हैं कि जो मरीज इसे समय पर नहीं करवाते, वे अक्सर देर से पता चलने वाली जटिलताओं का शिकार हो जाते हैं।
क्या है HbA1c टेस्ट और क्यों ज़रूरी?
दिल्ली के जीटीबी हॉस्पिटल के मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. अजीत कुमार बताते हैं कि HbA1c को मेडिकल भाषा में ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट कहा जाता है। यह टेस्ट एक-दो दिन की शुगर रिपोर्ट नहीं, बल्कि पिछले 2-3 महीनों के औसत ब्लड शुगर लेवल की जानकारी देता है। इससे डॉक्टर को यह समझने में मदद मिलती है कि मरीज की शुगर लंबे समय में कितनी कंट्रोल रही और भविष्य में किडनी, आंख, दिल या नसों पर क्या खतरा बन सकता है।
इसी वजह से इसे डायबिटीज मॉनिटर करने का सबसे भरोसेमंद तरीका माना जाता है और विशेषज्ञ केवल फास्टिंग व पोस्ट-प्रांडियल रिपोर्ट पर निर्भर रहने के बजाय HbA1c को जरूर शामिल करते हैं।
कितने समय में कराएं HbA1c टेस्ट?
डॉ. कुमार बताते हैं कि HbA1c की फ्रीक्वेंसी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन और डायबिटीज से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने स्पष्ट गाइडलाइन जारी की हैं। उनके मुताबिक, जिन मरीजों को डायबिटीज है, उन्हें हर 3 महीने में एक बार HbA1c टेस्ट कराना चाहिए, ताकि यह देखा जा सके कि दवाइयां और लाइफस्टाइल बदलाव वास्तव में असर कर रहे हैं या नहीं।
जिन मरीजों में शुगर लेवल अक्सर कंट्रोल में नहीं रहता, जो दवाएं छोड़ते-बदलते रहते हैं या जिनका खानपान और दिनचर्या बिगड़ी हुई है, उनके लिए तीन महीने का अंतराल और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। वहीं जिनका शुगर लेवल लंबे समय से स्थिर है और डॉक्टर संतुष्ट हैं, उन्हें 6 से 7 महीने में एक बार HbA1c कराने की सलाह दी जाती है, ताकि साल में कम से कम दो बार दीर्घकालिक कंट्रोल का आकलन हो सके।
क्या है HbA1c की नॉर्मल रेंज?
डायबिटीज विशेषज्ञों के अनुसार, 5.7 प्रतिशत से कम HbA1c को नॉर्मल माना जाता है, यानी इस स्तर पर व्यक्ति को डायबिटीज की श्रेणी में नहीं रखा जाता। 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच का स्तर प्रीडायबिटीज कहलाता है, जो चेतावनी का संकेत है और बताता है कि आगे चलकर मधुमेह का खतरा बढ़ सकता है। अगर HbA1c 6.5 प्रतिशत या उससे ऊपर पहुंच जाए, तो इसे डायबिटीज की श्रेणी में रखा जाता है और डॉक्टर आमतौर पर दोबारा टेस्ट या दूसरे शुगर परीक्षणों के साथ इसकी पुष्टि करते हैं।
किन बातों से कंट्रोल होगा HbA1c?
डॉक्टरों का जोर है कि केवल टेस्ट कराने से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की आदतों से HbA1c पर सीधा असर पड़ता है। वे सलाह देते हैं कि डायबिटीज के मरीज अपने खानपान पर सख्ती से ध्यान रखें, प्लेट में सब्जियों और फाइबर की मात्रा बढ़ाएं और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट व अधिक मीठे से बचें। रोजाना कम से कम 30 मिनट की वॉक या किसी भी रूप में नियमित एक्सरसाइज को रूटीन का हिस्सा बनाना जरूरी है, क्योंकि ये इंसुलिन सेंसिटिविटी को बेहतर बनाता है। मानसिक तनाव कम रखना, पर्याप्त नींद लेना और बढ़ते वजन को कंट्रोल में रखना भी उतना ही अहम है, क्योंकि स्ट्रेस हार्मोन और मोटापा दोनों ही शुगर को ऊपर ले जाने वाले बड़े कारक हैं।
डॉ. अजीत कुमार की स्पष्ट राय है कि डायबिटीज के हर मरीज को अपना HbA1c टाइम-टेबल डॉक्टर से लिखवा लेना चाहिए और हर रिपोर्ट को पिछले नतीजों से तुलना कर देखना चाहिए। समय पर टेस्ट और सही लाइफस्टाइल ही वह संयोजन है, जो आने वाले सालों में डायबिटीज को “बीमारी” नहीं, बल्कि मैनेज होने वाली कंडीशन में बदल सकता है।









