
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के बैंकिंग सिस्टम को और ज्यादा सुरक्षित, पारदर्शी और रिस्क‑सेंसिटिव बनाने के लिए 27 अप्रैल 2026 को 14 नए सख्त नियम लागू कर दिए हैं। ये नियम खास तौर पर लोन की एसेट क्लासिफिकेशन और उसके प्रॉविजनिंग (नुकसान के लिए रखे जाने वाले रिज़र्व) से जुड़े हैं।
इन बदलावों का सीधा असर यह होगा कि बैंक अब “खराब लोन” की पहचान पहले से करेंगे, उनके लिए फंड जल्दी‑जल्दी अलग रखेंगे और भविष्य की आर्थिक मंदी या झटकों के दौर में बड़े स्तर पर क्रिसिस कम होने की संभावना बनती है।
पुरानी ‘Incurred Loss’ से नई ‘ECL’ अप्रोच
अब तक बैंक लोन को “Incurred Loss” मॉडल पर मैनेज करते थे, यानी जब लोन वास्तव में डूबने की साफ सबूत मिलते थे, तब बैंक उसके लिए फंड अलग जोड़ते थे। इससे अक्सर हालात बहुत बिगड़ जाने के बाद MCLR या NPAs की तस्वीर सामने आती थी। लेकिन अब आरबीआई ने बैंकों को ‘Expected Credit Loss (ECL)’ मॉडल की ओर धकेल दिया है।
सरल शब्दों में, ECL मॉडल का मतलब है- भविष्य की आंशिक संभावना के आधार पर जो लोन डूबने का जोखिम रखते हैं, उनके लिए पहले से ही पैसा रखा जाए, चाहे अभी तक कोई डिफॉल्ट न दिख रहा हो। यह पूरी तरह “फॉरवर्ड लुकिंग” अप्रोच है, जिसमें बैंक को लोन की गुणवत्ता, बोरोअर की पेमेंट हिस्ट्री, इंडस्ट्री‑रिस्क, मैक्रो इकोनॉमिक फैक्टर्स और डिजिटल डेटा‑पैटर्न को मिलाकर अपने लिए रिस्क‑स्कोर बनाना होगा।
तीन स्टेज में बंटेगा हर लोन
नए नियमों के तहत, हर क्रेडिट–एक्सपोज़र (होम लोन, कार लोन, बिज़नेस लोन, क्रेडिट कार्ड आदि) को रिस्क के आधार पर तीन स्टेज में बांटा जाएगा:
स्टेज 1 – Low Risk (कम‑जोखिम) वाले लोन
इन लोनों में माना जाएगा कि डिफॉल्ट की संभावना बहुत ही कम है। बैंकों को इनके लिए अगले 12 महीनों में डिफॉल्ट होने की संभावना के आधार पर प्रॉविज़न करना होगा। इन लोनों पर ब्याज रेट और फीस‑स्ट्रक्चर पर ज़्यादा ज़ोर नहीं होगा, लेकिन लगातार रिव्यू रखना होगा।
स्टेज 2 – Rising Risk (जोखिम बढ़ता हुआ)
जिन लोन में शुरुआती लक्षण दिखने लगें- जैसे EMI में देरी, थोड़ी गिरावट बोरोअर की इनकम में, या इंडस्ट्री में दबाव – वे इस स्टेज में शिफ्ट कर दिए जाएंगे। यहां बैंकों को पूरी लोन‑टेन्योर के आधार पर एक्सपेक्टेड लॉस कैलकुलेट करना होगा, चाहे अभी तक डिफॉल्ट पूरी तरह न दिख रहा हो। इसके नतीजे में बोरोअर पर ज्यादा दबाव आ सकता है, और बैंकों की तरफ से रिस्ट्रक्चरिंग, रेस्ट्रिक्शन या अतिरिक्त गारंटी की मांग जैसी कार्रवाई दिख सकती है।
स्टेज 3 – Credit‑Impaired (पूरी तरह खराब)
जब कोई लोन पूरी तरह डिफॉल्ट की सीमा पर पहुंच जाए, उसे स्टेज 3 में डाला जाएगा। यहां बैंकों को उस लोन के बचे‑खुचे फ्यूचर कैशफ्लो के आधार पर लगभग पूरी संभावित लॉस का प्रॉविज़न रखना होगा। इस तरह RBI चाहता है कि बैंक अपने बैलेंस‑शीट पर जोखिम को छुपाए नहीं, बल्कि उसे टाइम‑टु‑टाइम अपडेट करके रखें, ताकि शेयर‑मार्केट, रेगुलेटर और नियामक–संस्थाएं वास्तविक तस्वीर को देख सकें।
NPA की परिभाषा अब भी 90 दिन की
नए नियमों के साथ एक अहम स्पष्टीकरण यह है कि RBI ने NPA (नॉन‑परफॉर्मिंग एसेट) की परिभाषा में कोई बदलाव नहीं किया है। अगर किसी लोन की किश्त 90 दिनों तक नहीं चुकाई जाती है, तो वह लोन अब भी डिफॉल्ट या NPA ही माना जाएगा। यह नियम छोटे लोन और बड़े कॉरपोरेट‑क्रेडिट दोनों पर लागू होगा।
इसका मतलब है कि चाहे बैंक ने ECL मॉडल पर लोन को स्टेज‑1 या 2 में रखा हो, लेकिन जैसे‑ही 90‑दिन की सीमा पार होगी, उस लोन को आधिकारिक रूप से NPA की कैटेगरी में ट्रांसफर किया जाएगा। इससे बैंकों के लिए प्रॉविज़निंग रिक्वायरमेंट और ज्यादा कड़ी हो जाएगी, और उन्हें जल्दी रिकवरी‑प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
प्रभाव: बैंकों की पकड़ मजबूत, जोखिम कम
इन 14 नियमों से बैंकों पर भारी टेक्निकल और ऑपरेशनल दबाव बढ़ेगा, लेकिन लंबे समय में यह उनकी आर्थिक स्थिरता को मजबूत करेगा। बैंकों को अब एडवांस्ड डेटा‑एनालिटिक्स, स्ट्रेस‑टेस्टिंग, स्कोरिंग मॉडल और रीयल‑टाइम रिस्क‑मॉनिटरिंग सिस्टम बनाने पड़ेंगे, ताकि वे लोन को बिना देरी के तीनों स्टेज में सही तरह क्लासिफाई कर सकें।
जानकारों का मानना है कि यह ‘हंटर‑स्टाइल’ रिस्क‑मॉडल बैंकों को उन संदिग्ध लोन‑पोर्टफोलियो और फ्रेंड‑फैमिली लेंडिंग को पकड़ने में मदद करेगा, जिन्हें पहले छुपाया जाता रहा। इससे भविष्य में जैसे कोविड या ग्लोबल फाइनेंशियल शॉक तरह की स्थितियों में बैंक और नियामक दोनों तैयार रहेंगे, क्योंकि जोखिम पहले से ही बैलेंस‑शीट पर दिखाया हुआ होगा।
आम आदमी पर सीधा असर कैसा?
आम ग्राहक या छोटे‑मध्यम बोरोअर पर भी इन नियमों का सीधा असर पड़ेगा। बैंक अब लोन अप्रूव करते समय ज्यादा सावधान होंगे, और जोखिम वाले ग्राहकों को या तो ज्यादा ब्याज या ज्यादा गारंटी की शर्त देखाई जाएगी। साथ ही, जो लोग थोड़ी देर बाद‑बाद ईएमआई भरते हैं, उनके लोन की रेटिंग स्टेज‑2 में जा सकती है, जिससे बैंक उन पर ज्यादा रिव्यू और विशेष देखरेख रखेगा।





