
भारत में सोना न सिर्फ धन का प्रतीक है, बल्कि भावनाओं और पारिवारिक विरासत का भी अटूट हिस्सा। लाखों परिवारों के लॉकर या तिजोरी में पड़ा पुराना सोना अब बेकार नहीं पड़ा रह सकता। केंद्र सरकार की स्वर्ण मुद्रीकरण योजना (Gold Monetization Scheme – GMS) इसे कमाई का साधन बना सकती है। 2015 में शुरू हुई यह स्कीम सोने के भंडार को उत्पादक बनाकर देश के आयात बिल को कम करने का लक्ष्य रखती है।
लेकिन क्या यह हर व्यक्ति के लिए फायदेमंद है? घर के गहनों को पिघलाने का डर, मेकिंग चार्ज का नुकसान और लॉक-इन पीरियड जैसी चुनौतियां कईयों को रोकती हैं। आइए, इस योजना की गहराई में उतरें और जानें कि बैंक में सोना जमा करने से पहले किन नियमों का पालन जरूरी है, वरना बाद में पछतावा हो सकता है।
GMS क्या है और कैसे काम करती है
GMS सरल शब्दों में एक डिपॉजिट स्कीम है, जहां आप कच्चा सोना – चाहे गहने, सिक्के या बार हों – बैंक में जमा करते हैं। बैंक इसे रिफाइनरी को भेजता है और बदले में आपको ब्याज देता है। वर्तमान में ब्याज दर 2.25 से 2.50 प्रतिशत सालाना तक है, जो जमा के समय सोने की बाजार कीमत पर तय होती है। मैच्योरिटी पर आपको मूल सोना प्लस ब्याज कैश, गोल्ड या दोनों रूप में वापस मिलता है। न्यूनतम जमा मात्रा 10 ग्राम है, कोई अधिकतम सीमा नहीं।
लेकिन शुद्धता का टेस्ट अनिवार्य है, जो अधिकृत कलेक्शन एंड प्योरिटी टेस्टिंग सेंटर्स (CPTC) पर आपकी मौजूदगी में होता है। न्यूनतम शुद्धता 995 फाइनेंस होनी चाहिए। प्रक्रिया में पहले बैंक में GMS खाता खोलें, KYC पूरा करें, फिर सोना लेकर CPTC जाएं। परीक्षण के बाद डिपॉजिट सर्टिफिकेट जारी होता है।
हालिया बदलाव और नए विकल्प
हाल ही में मार्च 2025 के बाद स्कीम में बड़ा बदलाव आया। अब निवेशक मुख्य रूप से शॉर्ट टर्म बैंक डिपॉजिट (STBD) विकल्प ही चुन सकते हैं, जिसका लॉक-इन पीरियड 1 वर्ष है। पहले मीडियम टर्म (2.5 वर्ष) और लॉन्ग टर्म (5 वर्ष) भी उपलब्ध थे, लेकिन नए ढांचे में फोकस STBD पर है। इससे लचीलापन बढ़ा है, लेकिन ब्याज दरें कम हैं। बैंक जैसे बैंक ऑफ बड़ौदा इसे सक्रिय रूप से प्रमोट कर रहे हैं। गोल्ड लीजिंग का विकल्प भी जुड़ा है, जहां SafeGold जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म ज्वेलर्स को सोना लीज पर देते हैं और 1 से 7 प्रतिशत तक रिटर्न देते हैं। यह पैसिव इनकम का अच्छा जरिया है, बिना सोना बेचे।
प्रमुख फायदे
फायदे स्पष्ट हैं: चोरी का खतरा खत्म, टैक्स लाभ (ब्याज पर कोई TDS नहीं), और अर्थव्यवस्था में योगदान। लाखों टन सोना घरों में पड़ा है, जो अगर सक्रिय हो जाए तो विदेशी आयात 30 प्रतिशत तक कम हो सकता है।
संभावित नुकसान और चुनौतियां
लेकिन नुकसान भी कम नहीं। पहला, फायर असेसिंग टेस्ट में सोना पिघलाया जाता है। अशुद्धियां निकलने से वजन घट सकता है, जिससे मूल्यहानि। दूसरा, भारतीय परिवारों का सोने से भावनात्मक लगाव। दादाजी के दिए ब्रेसलेट या शादी के गहने पिघलवाना कईयों के लिए अस्वीकार्य है। तीसरा, मेकिंग चार्ज का सीधा नुकसान। अगर गहनों पर 15-20 प्रतिशत मेकिंग खर्च किया, तो जमा पर केवल प्योर गोल्ड वैल्यू ही मान्य होती है। चौथा, प्रीमैच्योर विदड्रॉल पर पेनल्टी – कोई ब्याज नहीं और मूल सोना भी कम वजन पर। लॉन्ग टर्म में तो 5 साल लॉक रहता था।
विशेषज्ञ सलाह और अंतिम विचार
विशेषज्ञ सलाह देते हैं: हमेशा RBI की लेटेस्ट गाइडलाइंस चेक करें। जमा से पहले शुद्धता सर्टिफिकेट लें, बाजार भाव देखें। अगर भावनात्मक मूल्य ज्यादा है, तो Sovereign Gold Bonds चुनें, जो 2.5 प्रतिशत ब्याज और 8 वर्ष बाद टैक्स-फ्री कैपिटल गेन देते हैं। GMS उन लोगों के लिए बेहतर है, जिनके पास पुराने बार या सिक्के हैं। 2026 में सोने की कीमतें ऊंची हैं, ऐसे में यह स्कीम आकर्षक लगती है, लेकिन जल्दबाजी न करें। बैंक शाखा जाकर काउंसलर से बात करें। क्या आपका सोना कमाई का स्रोत बनेगा या लॉकर में सुरक्षित रहेगा? फैसला आपका, लेकिन सूझबूझ से।









