
लोकतंत्र के महाकुंभ में वोट की ताकत को मजबूत करने की मांग सुप्रीम कोर्ट पहुंची, लेकिन शीर्ष अदालत ने इसे साफ तौर पर खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि किसी को वोट डालने के लिए कानूनी तौर पर मजबूर नहीं किया जा सकता। वोट न डालने वालों पर गिरफ्तारी, जुर्माना या सरकारी सुविधाओं से वंचित करने जैसे सख्त कदम लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ हैं। यह फैसला न सिर्फ याचिकाकर्ता के सपनों पर पानी फेर गया, बल्कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में मतदान की स्वैच्छिक प्रकृति को और मजबूत कर दिया।
याचिका की मुख्य मांग
याचिका में मांग की गई थी कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि जानबूझकर वोट न डालने वालों की पहचान कर उनकी सरकारी सुविधाएं- जैसे राशन कार्ड, सब्सिडी या पेंशन- सीमित कर दी जाएं। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि कई लोग आलस्य या उदासीनता से वोटिंग बूथ से दूर रहते हैं, जिससे लोकतंत्र कमजोर होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि एक कमेटी गठित हो, जो ऐसी ‘गैर-जिम्मेदार’ प्रवृत्ति पर नकेल कसे।
चीफ जस्टिस का व्यंग्यात्मक जवाब
लेकिन चीफ जस्टिस ने इसकी व्यवहारिकता पर सवाल ठोक दिए। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “अगर कोई गरीब मजदूर रोजगार के चक्कर में वोट डालने न जा पाए, तो क्या हम उसे गिरफ्तार कर लें? या उसके परिवार को भूखा मार दें?” CJI ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में वोट एक अधिकार है, मजबूरी नहीं। जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं, लेकिन कानूनी बंधन असंभव है।
जस्टिस बागची का उदाहरण
कोर्ट की बहस के दौरान एक दिलचस्प प्रसंग उभरा, जब CJI सूर्य कांत ने बेंच के साथी जस्टिस बागची का उदाहरण दिया। उन्होंने याचिकाकर्ता से पूछा, “अगर आपकी बात मानी गई, तो जस्टिस बागची को पश्चिम बंगाल जाकर वोट डालना पड़ेगा, जबकि उसी दिन सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई है। क्या न्यायिक कामकाज को वोटिंग के नीचे रख दें?” जस्टिस बागची ने हामी भरी कि न्याय का काम भी राष्ट्रहित में उतना ही जरूरी है।
यह उदाहरण न सिर्फ याचिका की अव्यवहारिकता को उजागर करता है, बल्कि उच्च न्यायपालिका के सदस्यों की अपनी व्यस्तताओं को रेखांकित करता है। वोटिंग को अनिवार्य बनाने से न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होगी, बल्कि प्रशासनिक बोझ भी बढ़ेगा- क्योंकि करोड़ों वोटरों की ‘जानबूझकर’ अनुपस्थिति साबित करना कैसे संभव होगा?
कोर्ट ने सुनवाई से इंकार क्यों किया
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को नीतिगत मामला करार देते हुए सुनवाई से इंकार कर दिया। CJI ने कहा कि ऐसे नियम विधायिका का दायरा हैं, न कि न्यायपालिका का। याचिकाकर्ता यदि चाहें, तो संसद या चुनाव आयोग के पास जा सकते हैं। फरवरी 2026 में NOTA से जुड़ी एक PIL पर कोर्ट ने गैर-दंडात्मक तंत्र बनाने का सुझाव जरूर दिया था, जहां अमीर और शिक्षित वर्ग की वोटिंग कम होने पर चिंता जताई गई। लेकिन वह सिफारिश थी, आदेश नहीं।
भारत vs दुनिया: अनिवार्य वोटिंग
अब यह साफ है कि भारत में वोटिंग स्वैच्छिक रहेगी। दुनिया के 30 से अधिक देशों- जैसे ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील या अर्जेंटीना- में अनिवार्य वोटिंग है, जहां जुर्माना या जेल तक की सजा मिलती है। लेकिन भारत का लोकतांत्रिक ढांचा व्यक्तिगत चुनाव को प्राथमिकता देता है।
जागरूकता पर नया जोर
यह फैसला वोटर जागरूकता पर नया जोर देता है। चुनाव आयोग पहले से ही ‘वोट फॉर श्योर’ जैसे अभियान चला रहा है, जो स्वेच्छा से भागीदारी बढ़ाने पर केंद्रित हैं। आंकड़े बताते हैं कि हाल के चुनावों में मतदान प्रतिशत 65-70% रहा, जो सुधार की गुंजाइश रखता है। लेकिन कोर्ट का संदेश साफ है: लोकतंत्र मजबूरी से नहीं, जागरण से मजबूत होता है। वोट न डालना महंगा नहीं पड़ेगा, लेकिन इसे छोड़ना लोकतंत्र के प्रति उदासीनता जरूर मानेगा। क्या अब सरकार जागरूकता पर ज्यादा निवेश करेगी? यह सवाल विधायिका के सामने है।









