
भारत सालाना सौर ऊर्जा क्षमता स्थापित करने के मामले में 2026 तक विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सौर ऊर्जा बाजार बनने की राह की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया (NSEFI) ने बुधवार को यह बात कही कि देश की सौर ऊर्जा क्षमता की गति इतनी तेज़ है कि आगामी सालों में भारत चीन के बाद टॉप‑2 में शामिल होगा।
संगठन के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) सुब्रह्मण्यम पुलिपाका ने कहा कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख बाज़ारों में सोलर क्षमता वृद्धि में पिछले दो‑तीन सालों में कुछ धीमापन दिख रहा है, जबकि भारत लगातार निशाने पर चल रहा है और नए रिकॉर्ड बना रहा है।
नवीकरणीय ऊर्जा में तेज़ी से बढ़ती क्षमता
पुलिपाका ने बताया कि पहले 50 गीगावाट की सौर क्षमता तक पहुँचने में भारत को लगभग 11 साल लगे, लेकिन उसके बाद काम की गति इतनी तेज़ हो गई कि अगले 50 गीगावाट (यानी कुल 100 गीगावाट) बस तीन साल में ही जुड़ गए। यह संकेत है कि पॉलिसी, निवेश और तकनीकी ढांचा एक साथ काम कर रहा है। NSEFI के अनुसार, 2030 तक 500 गीगावाट की कुल स्वच्छ ऊर्जा क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य में सौर ऊर्जा का हिस्सा लगभग 280 से 300 गीगावाट तक पहुँचने की उम्मीद है। इसके लिए हर साल करीब 50 गीगावाट की वार्षिक वृद्धि की ज़रूरत है, जिसके करीब भारत अभी पहुँच रहा है।
नई सरकारी पहलों का बड़ा योगदान
NSEFI के अनुसार, भारत की यह तेज़ प्रगति कई नई पहलों और नीतियों से जुड़ी हुई है। PM‑KUSUM योजना के बाद अब KUSUM 2.0 की शुरुआत से किसानों के लिए सौर‑पंप और सौर‑खेत आधारित प्रोजेक्ट्स को और बढ़ावा मिलेगा। PM‑सूर्य घर योजना के ज़रिए रूफटॉप सोलर को घर‑घर तक पहुँचाने की कोशिश की जा रही है, जिससे घरेलू बिजली की लागत घटाने और ग्रिड पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, “फ्लोटिंग सोलर प्लांट” के लिए अलग‑अलग नीतियाँ और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन से जुड़ी बढ़ती मांग भी सौर क्षमता को और ऊपर धकेलने वाला केंद्रीय कारण हो सकता है।
क्यों दुनिया में भारत बढ़ता नज़र आ रहा है?
NSEFI का आकलन है कि अगले तीन सालों में ऊर्जा वितरण कंपनियों (DISCOMs) के स्तर पर वितरित नवीकरणीय ऊर्जा (DRE) और वाणिज्यिक‑औद्योगिक (C&I) उपयोगकर्ताओं द्वारा रूफटॉप सोलर और सौर पावर पर्चेज अग्रिमेंट (PPA) के ज़रिए सौर ऊर्जा को अपनाने की दर तेज़ होगी। उद्योगों के लिए सौर अब सिर्फ़ ‘ग्रीन’ विकल्प नहीं, बल्कि लागत‑कुशल और लंबी अवधि के लिए स्थिर ऊर्जा आपूर्ति का स्रोत बन रहा है। इससे न केवल बिजली बिल में कमी आएगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
वैश्विक स्तर पर भारत की रफ्तार
वैश्विक परिदृश्य में, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बाज़ारों में सौर ऊर्जा की वार्षिक स्थापित क्षमता में धीमापन दिखाई दे रहा है, क्योंकि नियमन‑जटिलता, बाज़ार‑संतुलन और अर्थ‑व्यवस्था के दबाव के कारण निवेश की गति समतल हुई है। इसके विपरीत, भारत में नीतिगत स्थिरता, बड़े‑स्तर पर सोलर पार्क योजनाएँ, रूफटॉप सब्सिडी और राज्य‑स्तर पर टैक्स और टैरिफ लाभ जैसे कारकों ने निवेशकों को आकर्षित किया है।
पुलिपाका ने स्पष्ट किया कि भारत की रफ्तार ऐसी है कि वह अगले वर्षों में न केवल वार्षिक स्थापित क्षमता के मामले में दुनिया के टॉप‑2 देशों में शामिल होगा, बल्कि अपने बाज़ार को औद्योगिक और घरेलू स्तर पर और गहरा भी करेगा। इस रफ्तार के साथ भारत नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में एक “ग्लोबल हब” बनने के लक्ष्य के बहुत करीब पहुँच रहा है।









