
लोकतंत्र के पवित्र उत्सव में फर्जी वोटिंग और धांधली की आशंकाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं की बायोमेट्रिक और चेहरे की पहचान अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और सभी राज्यों को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब मांगा है। यह नोटिस आगामी विधानसभा चुनावों में रिश्वतखोरी, प्रॉक्सी वोटिंग और घोस्ट वोटिंग जैसी बुराइयों को जड़ से उखाड़ फेंकने की दिशा में एक बड़ा प्रयास है।
याचिका का आधार और मांग
याचिकाकर्ता वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी PIL में दावा किया है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के तमाम प्रयासों के बावजूद चुनावी प्रक्रिया में गंभीर खामियां बरकरार हैं। 20 मार्च 2026 को उन्हें इसकी जानकारी मिली, जब हालिया चुनावों में रिश्वत, अनुचित प्रभाव, डुप्लीकेट वोटिंग और भूतिया मतदाताओं की घटनाएं सामने आईं।
उपाध्याय का तर्क है कि फिंगरप्रिंट, आईरिस स्कैन और चेहरे की पहचान जैसी बायोमेट्रिक प्रणाली से ‘एक नागरिक, एक वोट’ का सिद्धांत साकार हो सकेगा। उन्होंने कहा कि यह निवारक तंत्र प्रॉक्सी वोटिंग और मतदाताओं को लालच देने की प्रथाओं पर पूर्ण रोक लगाएगा, जिससे जनता का चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास बढ़ेगा।
कोर्ट की सुनवाई और टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि बायोमेट्रिक सिस्टम लागू करने के लिए नियमों में व्यापक बदलाव और भारी वित्तीय बोझ जरूरी होगा। उन्होंने स्वीकार किया कि चुनाव आयोग के पास अनुच्छेद 324 के तहत पर्याप्त शक्तियां हैं, लेकिन राज्यों का सहयोग और वित्त मंत्रालय का बजट अनिवार्य है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट किया कि आगामी विधानसभा चुनावों के लिए तत्काल लागू करना संभव नहीं है, लेकिन भविष्य के संसदीय या राज्य चुनावों के लिए इसकी व्यवहार्यता जांचनी होगी। CJI ने याचिकाकर्ता से कहा, “यदि राज्य सहयोग न करें या बजट न मिले, तो फिर कोर्ट से संपर्क करें। चुनाव आयोग को जवाब देना होगा।”
याचिकाकर्ता का पक्ष और भविष्य की संभावनाएं
उपाध्याय ने कोर्ट में जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग के पास पूर्ण शक्तियां हैं, लेकिन नोटिस जारी कर राज्यों को बाध्य करना आवश्यक है। उन्होंने माना कि वर्तमान चुनाव चक्र में पूर्ण क्रियान्वयन कठिन हो सकता है, लेकिन लंबे समय में यह व्यवस्था चुनावी धोखाधड़ी को हमेशा के लिए खत्म कर देगी। याचिका में हालिया घटनाओं का हवाला देते हुए कहा गया कि ECI के उपाय अपर्याप्त साबित हो रहे हैं, जिससे लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही हैं।
यह मामला भारत के चुनावी इतिहास में मील का पत्थर साबित हो सकता है। पहले आधार को वोटर आईडी से लिंक करने के प्रयास गोपनीयता विवादों में अटक गए थे, लेकिन बायोमेट्रिक वोटिंग की यह नई मांग तकनीकी प्रगति के साथ संभव दिख रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लागू हुआ, तो यह न केवल धांधली रोकेगा, बल्कि वोटर टर्नआउट भी बढ़ाएगा। चार हफ्तों में आने वाले जवाब तय करेंगे कि क्या भारत का लोकतंत्र बायोमेट्रिक युग में प्रवेश करेगा। फिलहाल, कोर्ट की इस पहल से चुनावी पारदर्शिता की उम्मीदें प्रबल हो गई हैं।









