
वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था को पटखनी दे दी है। अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता के बेनतीजा रहने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आ गया, जिससे रुपये पर भारी दबाव पड़ा। सोमवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 49 पैसे लुढ़ककर 93.32 के स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट न सिर्फ करेंसी मार्केट को हिला रही है, बल्कि आम आदमी की जेब और महंगाई पर भी गहरा असर डाल रही है।
शांति वार्ता फेल, तनाव बढ़ा
शुक्रवार को करेंसी मार्केट बंद होते समय सभी को उम्मीद थी कि शांति वार्ता से पश्चिम एशिया का संकट कम होगा। लेकिन वार्ता फेल होने के बाद अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी की घोषणा कर दी, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई की तैयारी शुरू कर ली। होर्मुज स्ट्रेट के माध्यम से तेल आपूर्ति पर अनिश्चितता छा गई, जिससे ब्रेंट क्रूड 7.28 प्रतिशत चढ़कर 102.13 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। डॉलर इंडेक्स भी 0.38 प्रतिशत मजबूत होकर 98.81 पर बंद हुआ।
फॉरेक्स ट्रेडर्स बताते हैं कि विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालने लगे हैं, जिसने रुपये को और कमजोर किया। दो दिनों में कुल 80 पैसे की गिरावट दर्ज की गई है- शुक्रवार को 92.83 पर बंद हुआ रुपया अब 93.32 पर कारोबार कर रहा है।
बाजारों पर भारी गिरावट
इस तनाव का असर घरेलू बाजारों पर साफ दिखा। सेंसेक्स 1600 अंक यानी 2.06 प्रतिशत लुढ़ककर 75,949 पर आ गया, जबकि निफ्टी 468 अंक गिरकर 23,581 पर पहुंचा। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने हालिया दिनों में इक्विटी से पूंजी खींची है, हालांकि शुक्रवार को 672 करोड़ की खरीदारी हुई।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने राहत दी है- 3 अप्रैल को समाप्त सप्ताह में विदेशी मुद्रा भंडार 9.063 अरब डॉलर बढ़कर 697.121 अरब डॉलर हो गया। लेकिन जानकार चेतावनी दे रहे हैं कि कच्चे तेल की कीमतें अगर ऊंची रहीं, तो चालू खाता घाटा (CAD) GDP के 2 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। भारत 80 प्रतिशत तेल आयात पर निर्भर है, इसलिए हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी CAD को 30-40 बेसिस पॉइंट्स बढ़ा देती है।
आम आदमी पर महंगाई का डर
आम आदमी पर असर सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से परिवहन खर्च बढ़ेगा, जो सब्जी से लेकर हर सामान की कीमतों को प्रभावित करेगा। इलेक्ट्रॉनिक्स, दवाइयां और विदेशी यात्रा का खर्च 5-10 प्रतिशत महंगा हो जाएगा। महंगाई का ग्राफ चढ़ेगा, खासकर आयातित वस्तुओं पर। विदेश पढ़ाई या लोन लेने वालों को बोझ बढ़ेगा, हालांकि रेमिटेंस भेजने वाले परिवारों को फायदा हो सकता है।
एशियाई विकास बैंक (ADB) की ‘एशियन डेवलपमेंट आउटलुक अप्रैल 2026’ रिपोर्ट में चेताया गया है कि मध्य पूर्व संकट ऊर्जा मूल्य वृद्धि, व्यापार रुकावट और रेमिटेंस में कमी लाएगा। फिर भी, ADB ने वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP ग्रोथ 6.9 प्रतिशत और अगले साल 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है, जो मजबूत घरेलू मांग पर टिका है।
भविष्य की चुनौतियां
मॉर्गन स्टेनली और क्रिसिल जैसी एजेंसियां चेतावनी दे रही हैं कि लंबे संघर्ष से औद्योगिक उत्पादन धीमा होगा, कॉर्पोरेट मार्जिन सिकुड़ेंगे और जीडीपी ग्रोथ 6.8 प्रतिशत तक गिर सकती है। RBI को हस्तक्षेप बढ़ाना पड़ सकता है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता बनी रहेगी तो रुपये पर दबाव जारी रहेगा। भारत को ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की जरूरत है, वरना यह दोहरी मार लंबे समय तक अर्थव्यवस्था को कमजोर करती रहेगी।









